टैरिफ को लेकर क्यों घुटनों पर आया अमेरिका, किसी के सामने न झुकने वाले ट्रंप से भारत ने कैसे कराया सरेंडर?
भारत पर 50% तक टैरिफ लगाने की अमेरिकी धमकी आखिर 18% पर क्यों आकर रुकी? EU, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ समझौतों ने अमेरिका की मोलभाव की ताकत कैसे तोड़ी. पूरी कहानी.;
अमेरिका ने जब भारत पर 50% तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी, तब माना जा रहा था कि भारतीय निर्यातकों पर भारी दबाव पड़ेगा, लेकिन कहानी ने अचानक ऐसा मोड़ लिया कि वही टैरिफ सीधे 18% पर आकर रुक गया. सवाल यही है कि क्या भारत ने अमेरिका को डरा दिया या फिर चुपचाप ऐसा जाल बुना कि वॉशिंगटन को पीछे हटना पड़ा?
EU और ब्रिटेन से तेजी से बढ़ती ट्रेड डील, न्यूजीलैंड के साथ FTA और एशिया–अफ्रीका में वैकल्पिक बाजारों की तलाश ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया. भारत अब किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं है. यही वजह है कि भारत को टैरिफ की तलवार दिखाने वाला अमेरिका आखिरकार बातचीत की मेज पर झुकने को मजबूर हुआ और खुद ही डर गया.
50% टैरिफ की धमकी से 18% पर कैसे आया अमेरिका?
अमेरिका ने भारत पर कुछ सेक्टर्स में 50% तक टैरिफ लगाने का संकेत दिया था, लेकिन भारत ने सीधी टकराव की बजाय रणनीतिक चुप्पी और वैकल्पिक बाजारों की राह अपनाई. इसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका को पीछे हटना पड़ा और टैरिफ 18% के स्तर पर आ गया.
भारत के सामने अमेरिका क्यों झुका?
अमेरिकी कंपनियों की भारत पर निर्भरता पिछले कुछ वर्षों के दौरान बढ़ी है. वहां की कंपनियों को सप्लाई चेन शिफ्ट होने का डर सता रहा है. भारत का बड़ा कंज्यूमर मार्केट है. अमेरिका को चीन के विकल्प के तौर पर भारत की जरूरत है. इन सभी कारणों ने अमेरिका को भारत के साथ टकराव से समझौते की राह पर आने के लिए मजबूर किया.
भारत की ट्रेड डिप्लोमेसी की जीत है?
एक्सपर्ट के अनुसार यह भारत की शांत लेकिन सख्त ट्रेड रणनीति की जीत है, जहां न धमकी दी गई, न झुकाव दिखाया गया. सिर्फ विकल्प खड़े किए गए.
EU और ब्रिटेन से ट्रेड डील: भारत की सबसे बड़ी ताकत
भारत ने यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की दिशा में तेजी दिखाई. इससे अमेरिका को यह संदेश गया कि भारत के पास निर्यात के लिए सिर्फ अमेरिकी बाजार ही नहीं, बल्कि मजबूत विकल्प मौजूद हैं.
UK-India FTA का असर
ब्रिटेन के साथ डील ने यह साफ कर दिया कि भारत अब ट्रेड में ‘डिपेंडेंट इकॉनमी’ नहीं, बल्कि ‘चवॉइस बेस्ड इकॉनमी’ बन चुका है. इससे अमेरिकी कंपनियों पर भी दबाव पड़ा कि वे भारत के साथ संबंध बिगाड़ने का जोखिम न लें.
न्यूजीलैंड FTA: छोटा देश, बड़ा संकेत
न्यूजीलैंड के साथ FTA भले ही वॉल्यूम में छोटा हो, लेकिन इसका संकेत बड़ा था. भारत एशिया-पैसिफिक में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. यह अमेरिका के लिए चेतावनी थी कि भारत ग्लोबल सप्लाई चेन में नए पार्टनर बना रहा है.
वैकल्पिक बाजारों की तलाश: असली गेमचेंजर
भारत ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मिडिल ईस्ट में नए बाजारों पर फोकस बढ़ाया. इससे अमेरिका की ‘टैरिफ धमकी’ की धार कुंद हो गई, क्योंकि भारत के निर्यात के रास्ते बंद नहीं हो रहे थे.