EXCLUSIVE: लाखों करोड़ के ‘रक्षा-बजट’ के इस्तेमाल में इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA रोड़ा, जिससे सरहदें-सेना सब ‘असुरक्षित’!
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल का दावा है कि समस्या बजट की नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में रोड़ा बनी IFA व्यवस्था की है. अगर यही प्रणाली नहीं बदली तो रक्षा बजट बढ़ाना भी बेअसर रहेगा.;
1 फरवरी 2026 को वित्तीय वर्ष 2026-2027 का सालाना बजट पेश होने वाला है. विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारत की सरहदें अपने ही आसपास मौजूद दुश्मनों से चौतरफा घिरी हुई हैं. अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश अपनी-अपनी दीवारों और हमारी सरहदों के मुहाने पर बैठकर हमें चिढ़ाकर हंस और खिलखिला रहे हैं. वह भी तब जब भारतीय फौजों का अपने ऊपर टूटा कहर भुगते हुए पाकिस्तान को अभी चंद महीने भी नहीं गुजरे हैं.
ऐसे में 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले देश के बजट में सरहदों की सुरक्षा के लिए क्या ‘रक्षा बजट’ में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए और किस अनुपात में यह बढ़ोत्तरी होनी चाहिए? क्या रक्षा बजट को बढ़ाए जाने से ही देश की सरहदें और हमारी सेना सुरक्षित हो सकती है..? आदि-आदि सवालों के बेबाक दो टूक जवाब पाने के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन ने भारत के एक्सक्लूसिव बात की भारतीय फौज के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी (ले. कर्नल जे एस सोढ़ी) से. लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी ने जो सच बयान किया है उसे सुनकर देश की हुकूमत-हुक्मरानों और भारतीय सेनाओं के भीतर मौजूद ‘दीमक’ के बारे में सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएंगे.
समस्या कम या ज्यादा बजट की नहीं
भारत की सरहदों की सुरक्षा के लिए क्या लाखों करोड़ का बजट कम है? पूछे जाने पर पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है. सेना के रक्षा बजट पर बाकी देशों की तुलना में हम कहीं खड़े नहीं होते हैं. हां, भारत के हिसाब से हमारी फौजों के लिए जो सालाना रक्षा बजट मिलता है, वह पूर्ण रूपेण संतुष्ट करने वाला कभी नहीं हो सकता है. देश की सरहदों की सुरक्षा दरअसल मोटे बजट के साथ-साथ, इस बजट के सही समय पर सही जगह सही और जरूरत के सैन्य साज-ओ-सामान के निर्माण-उत्पादन और खरीद पर निर्भर करती है. समस्या हमारे देश में सैन्य रक्षा बजट की उतनी बड़ी नहीं है. बड़ी समस्या है सालाना मंजूर होने वाले इस भारतीय रक्षा-बजट के इस्तेमाल न हो पाने की.
मंजूर बजट का ही सही इस्तेमाल कर लो
जो रक्षा-बजट आज की तारीख में हिंदुस्तानी हुकूमत ने फौज के लिए मंजूर किया है वह भी लाखों करोड़ में होता है. इस बजट का भी तो हम हर साल सही से और पूरे-पूरे बजट का इस्तेमाल खर्च करके नहीं कर पाते हैं. अमूमन हर साल ही जारी होने वाले बजट का कुछ न कुछ हिस्सा या तो हुकूमत के खजाने में साल गुजरने के बाद वापस होता होगा या फिर उसे अगले वित्तीय वर्ष में सरका दिया जाता होगा. क्योंकि स्वीकृत बजट का सही समय पर सही तरीके से खुलकर सेना और सैन्य रक्षा में इस्तेमाल ही नहीं होता है. जरूरी नहीं है कि मेरे मत से सभी सहमत हों. मगर पूर्व भारतीय फौजी अफसर होने के नाते मैंने जो महसूस किया है वह यह है कि, भारतीय फौज के बजट इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा कहूं या फिर रोड़ा अथवा अड़ंगा, यह सेना के भीतर ही मौजूद है. इसका नाम है इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA.”
क्या बला है इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी (IFA)
भारतीय फौजों में दो स्तर पर आंतरिक वित्तीय नियंत्रण होता है. सरकार से मंजूर सालाना वित्तीय वर्ष के बजट का इस्तेमाल (खर्च) करने के लिए इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA की अनुमति-लिखित संस्तुति लेना अनिवार्य है. जब तक आईएफए की लिखित अनुमति नहीं मिलेगी तब तक भारतीय फौज का कोई भी हिस्सा हिंदुस्तानी हुकूमत से मंजूर हुए रक्षा-बजट का इस्तेमाल नहीं कर सकता है. मतलब, भारतीय फौजों को तोप-गोला-बम-बारूद, फाइटर जेट आदि-आदि जो भी कुछ लेना खरीदना या बनाने पर खर्च करना है. तो इसके लिए भी सेना के इस्तेमाल को ही मंजूर रक्षा बजट खरचने की भी अनुमति भारतीय फौज में हाथी का पांव सी मौजूद इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA से लिखित अनुमति लेनी होगी.
इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी (IFA) “अड़ंगा”
इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA आखिर भारतीय फौज को मजबूत करने और देश की सरहदों की सुरक्षा को कमजोर कैसे कर रही है? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय फौज के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी (Lieutenant Colonel Jasinder Singh Sodhi, Indian Army) कहते हैं, “दरअसल आईएफए यह तो भली-भांति जानता ही है कि उसकी बिना लिखित मंजूरी के भारतीय फौज या भारतीय फौजें हुकूमत से हासिल लाखों करोड़ के रक्षा बजट में से एक रुपया भी खर्च करने की कुव्वत या कानूनी ह़क नहीं रखती हैं. इसी का नाजायाज फायदा आईएफए खूब नहीं उस हद तक गिरकर उठाती है कि जिससे न केवल भारतीय फौज के पांव कमजोर होते हैं. अपितु देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा भी दांव पर लगी रहती है.
सैंक्शन-अथॉरिटी नहीं सेना में ‘दीमक’ है IFA
सेना की कमजोरी और अपनी ताकत को आईएफए जानती है. मगर चूंकि आईएफए सीधे तौर पर न तो युद्ध या हमले के वक्त देश की सरहदों पर जाकर दुश्मन से जूझती है. न ही उसकी सीधे-सीधे कानूनी जिम्मेदारी ही है दुश्मन से देश की हिफाजत करने की. आईएफए को तो बस सेना मुख्यालय-सेना के चुनिंदा बड़े दफ्तरों में बैठकर खर्च में इस्तेमाल होने वाले बजट की मंजूरी भर देनी होती है. ऐसे में जिस आईएफए को देश की सीमाओं पर जूझने वाली सेना और फौजियों की समस्या उनके दर्द का भी भला क्या पता होगा? मैं दावे के साथ कहता हूं कि IFA जैसी भारतीय फौज में मौजूद आंतरिक-वित्तीय मामलों को मंजूरी देने वाली बेकाबू संस्था को अगर नियंत्रित करने के लिए उसके ऊपर अंकुश लगा दिया जाए. तो हमारी फौज के पास आज भी जो बजट है वह पर्याप्त साबित हो सकता है. हमारी सेना मौजूदा बजट को भी युद्ध स्तर पर तीव्र गति से खर्च करके अपनी सरहदों की सुरक्षा के लिए सैन्य-साज-ओ-सामान खरीद सकती है. हालांकि, आईएफए ऐसा नहीं होने देती है.”
क्या वाकई IFA सेना को कमजोर कर रही!
इस कदर की भारतीय फौज के भीतर बैठकर ही फौज को दीमक की तरह चुंग कर कमजोर करने वाली इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA के बारे में क्या भारत की हुकूमत और भारतीय फौजों के अध्यक्षों को नहीं पता है? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय फौज के पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल, विदेश नीति, सैन्य रक्षा व अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ जे एस सोढ़ी (Lt. Colonel J S Sodhi, Indian Army) कहते हैं, “सबको पता है कि किस तरह घुन और दीमक की तरह भारतीय फौज को उत्पादन, खरीद के नजरिए से तमाम अड़ंगे लगाकर इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA कमजोर कर रही है.
सबको पता है कि निरंकुश IFA के बारे में
सवाल यह है कि सेना के भीतर सरकार द्वारा ही जबरन लाद दी गई इस निरंकुश वित्तीय मंजूरी प्राधिकरण या अथॉरिटी की देश और सेना विरोधी हरकतों के बारे में मुंह खोलकर या बोलकर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? भारतीय सेना या सेनाओं की इस कमजोरी को यह बेकाबू आईएफए भी भली भांति जानती-समझती है कि वह जो भी देश और सेना के अहित में करेगी, उसकी लगाम कोई नहीं खींच सकता है. इसी का नाजायज फायदा यह संस्था उठा कर सेना की मजबूती और सरहदों की सुरक्षा से खेलकर रही है. चूंकि यह संस्था परदे के पीछे सेना के कार्यालयों-मुख्यालयों में बैठकर इस तरह की देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त है. इसलिए भी कोई इसके खिलाफ बोलकर अपने गले में मुसीबत लटकाने के राजी नहीं होता है. सब फौजी अफसर अपनी अपनी नौकरी करके रिटायर होकर चले जाते हैं. और यह निरंकुश आंतरिक सैन्य वित्तीय नियंत्रक संस्था जस की तस हाथी का पांव बनी वहीं की वहीं बनी रहती है.”
सैन्य-बजट बढ़ाने से कोई लाभ नहीं
स्टेट मिरर हिंदी से विशेष बातचीत के दौरान भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और सैन्य व विदेश मामलों के जानकार जसिंदर सिंह सोढ़ी आगे कहते हैं, “अगर भारतीय फौज के लिए दीमक और घुन की तरह चाट रही IFA को काबू कर लिया जाए. तो जो बजट हिंदुस्तानी हुकूमत आजकल भी सेनाओं के लिए दे रही हैं. वह भी देश की सरहदों की सुरक्षा और भारतीय फौज को मजबूती देने के लिए काफी है. मुश्किल सैन्य बजट की कमी नहीं है. समस्या तो यह सेना के भीतर घुसा पड़ा सुस्त चाल वाला प्राधिकरण इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA है. जो हर साल मंजूर होने वाले सैन्य बजट को भी साल के साल यानी हर साल के अंदर ही इस्तेमाल करने में सबसे बड़ी बाधा है.
मंजूर बजट तक का इस्तेमाल नहीं...
जब मंजूर बजट को ही सेना द्वारा इस्तेमाल करने में आईएफए सौ सौ बाधाएं, लेट-लतीफी खड़ी कर देगा. तो फिर बजट बढ़ाकर दोगुना भी कर दो. आईएफए उसे भी कौन से साल के अंदर ही इस्तेमाल कर लेने देगा. समस्या कम या ज्यादा सैन्य बजट की कतई नहीं है. समस्या तो सरकार द्वारा जारी बजट का भी सेना द्वारा इस्तेमाल करने में बाधाएं अड़ंगेबाजी डालने वाला प्राधिकरण इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA है. जो मंजूर बजट के इस्तेमाल में ही तमाम मीन-मेख निकालते रहन के लिए ही मानो सेना के भीतर घुसाया बैठाया गया हो.”
असली समस्या की जड़ तो यह है
क्या आपके पास ऐसा कोई अचूक नुस्खा या तोड़ है जिससे हर साल भारतीय हुकूमत द्वारा सेना के लिए जारी सैन्य-बजट का साल के अंदर ही इस्तेमाल कर लिया जाए? पूछने पर भारतीय फौज के पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी बोले, “हां, है. बस इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA को दी गईं रोड़ा लगाने की उसकी ताकतों को छीन लिया जाए. भारतीय फौज के सीनियर-मोस्ट अफसरों को सैन्य बजट का खरीददारी में सीधे इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी जाए. इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA को कहा जाए कि सेना की जरूरत के हिसाब से वह खरीदने की मंजूरी 3-4 दिन के भीतर देगी. अगर इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA ऐसा करने में अक्षम रहती है तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी. फिर देखिए कैसे यही इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA पढ़े हुए तोते की तरह भारतीय फौज को मजबूत और देश की सीमाओं को सुरक्षित करने की दौड़ में कितनी तीव्र गति से खुद ही दौड़-भाग में लग जाएगी. अभी तो इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA को पता है कि वह निरंकुश है.
होना यह चाहिए...
उसके ऊपर किसी की नजर या चाबुक नहीं है. तो वह (इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA) जैसे कछुआ चाल से जब जैसे चाहता है, सेना को उसी का बजट सैन्य साज-ओ-सामान बनाने, खरीदने में तमाम बाधाएं लगाकर लेट करवाता रहता है. उस हद तक का लेट कि वित्तीय वर्ष का मंजूर बजट या तो लैप्स हो जाता है या फिर उस बजट का इस्तेमाल ही सेना नहीं कर पाती है. ऐसे में मैं फिर दोहराता हूं कि हमारे पर सैन्य बजट की कमी नहीं है. मुश्किल या कहिए मुसीबत अथवा असली समस्या है इंटीग्रेटिड फाइनेंशियल अथॉरिटी यानी IFA की जाने-अनजाने धूर्तता के चलते, मंजूर सैन्य बजट को भी हर साल देश और सेना के हित में वक्त रहते इस्तेमाल न करने देने की.”