पाक-अफगान वॉर में क्यों गूंजा 'दमा दम मस्त कलंदर'? जानिए सूफी गीत का सरहदी सच

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच 'दमा दम मस्त कलंदर' का जिक्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. यह गीत सिर्फ धुन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सूफी विरासत और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

( Image Source:  ANI )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 27 Feb 2026 1:30 PM IST

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच इन दिनों तनाव चरम पर पहुंच गया है. सीमा पार से होने वाली झड़पों और हमलों के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान के तालिबान शासन के खिलाफ 'खुले युद्ध' की घोषणा कर दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा कि हमारा सब्र अब टूट चुका है. अब हमारी और तुम्हारी बीच खुला युद्ध छिड़ गया है. अब 'दमा दम मस्त कलंदर' होगा.' अब लोगों को इस पोस्ट में दमा दम मस्त कलंदर सूफी गाने की याद आ गई है. जो महज एक गाना भर नहीं है बल्कि ऐसा छुपा हुआ इतहास है इस गाने में जो दो सरहदों को एक करता है. वो सरहदें हिंदुस्तान और पकिस्तान की है. 

दमा दम मस्त कलंदर की रहस्यमयी यात्रा

13वीं शताब्दी में सूफी संतों की आवाज में गाया यह गाना सदियों से लोगों के जुबां पर है. यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जो ईश्वर के प्रति प्रेम में डूबे नशे और एकता की बात करता है. इस कहानी की जड़ें सिंध प्रांत में हैं, जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है. यहां, 1177 ईस्वी में जन्मे एक सूफी संत थे हजरत लाल शाहबाज़ कलंदर. उनका असली नाम सैयद मुहम्मद उस्मान मरवानदी था, लेकिन लोग उन्हें 'लाल' कहते थे, क्योंकि वे लाल रंग की कपड़ें पहनते थे. 'शाहबाज़' का मतलब था राजा बाज़, जो उनकी आध्यात्मिक ऊंचाई को दर्शाता था, और 'कलंदर' सूफी परंपरा में एक ऐसे संत को कहते हैं जो दुनिया की मोह-माया से मुक्त होकर ईश्वर के नशे में डूबा रहता है.

हिंदुओं के झूलेलाल 

कलंदर साहब अफगानिस्तान से सिंध आए थे और सेहवान शरीफ में उनकी दरगाह बनी. कहा जाता है है कि वे जादुई शक्तियों वाले थे कभी आग में बैठते, कभी हवा में उड़ते. लेकिन सबसे खास बात? वे हिंदू और मुसलमानों के बीच पुल थे. सिंधी हिंदू उन्हें 'झूलेलाल' मानते थे, जो जल देवता वरुण का अवतार थे. इसीलिए गाने में 'झूले लालन' का जिक्र आता है. जैसे कोई बच्चे को झूला झुला रहा हो, वैसे ही कलंदर साहब दुनिया की रक्षा करते हैं. यह संत इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी दरगाह पर धमाल और क़व्वाली का सिलसिला शुरू हो गया.

गाना कैसे बना?

अमीर खुसरो की कलम और बुल्ले शाह की धुन की कहानी अब दिल्ली पहुंचती है. 13वीं शताब्दी में सूफी कवि अमीर खुसरो, जो दिल्ली सल्तनत के दरबारी कवि थे, ने इस कलाम (कविता) की नींव रखी. उन्होंने तुर्की, फारस और भारतीय संगीत को मिलाकर क़व्वाली का रूप दिया. माना जाता है कि मूल कलाम खुसरो ने कलंदर साहब की तारीफ में लिखा, जिसमें 'दमा दम' जैसे शब्द थे मतलब हर सांस (दम) में ईश्वर का नाम. 

कैसे मॉडिफाइड हुआ गाना?

फिर, 18वीं शताब्दी में पंजाब के सूफी कवि बाबा बुल्ले शाह ने इसे मॉडिफाइड किया. उन्होंने पंजाबी और सिंधी तत्व जोड़े, जैसे 'ओ लाल मेरी पत रखियो भला झूले लालन' मतलब, हे लाल, मेरी इज्जत की रक्षा करो, हे झूले वाले लालन. बुल्ले शाह ने इसे और गहरी भावनाओं के साथ बनाया. जहां 'मस्त कलंदर' का मतलब है 'ईश्वरीय नशे में डूबा कलंदर' यह गाना दरगाह पर गाया जाने लगा. लेकिन लिखित रूप में 1950s तक कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता. लोककथाओं के मुताबिक, यह सदियों से मौखिक रूप में जीवित रहा.


क्या है लिरिक्स का गहरा मतलब 

अब आते हैं लिरिक्स पर यह गाना सूफी दर्शन के लिरिक्स को डी कोड करता है:

  • ओ लाल मेरी पत रखियो भला झूले लालन: हे लाल (कलंदर), मेरी इज्जत बचाओ
  • सिंधड़ी दा, सेहवान दा, सखी शाहबाज कलंदर: सिंध का, सेहवान का, दोस्त शाहबाज कलंदर
  • दमा दम मस्त कलंदर: हर सांस में नशा कलंदर का यानी हर सांस में ईश्वर 
  • अली दम दम दे अंदर: हजरत अली, सूफी आदर्श हर सांस में बसे है
  • अली दा पहला नंबर: अली पहले नंबर पर हैं – सूफी परंपरा में हजरत अली को गुरु माना जाता है

कुल मिलाकर, यह गाना ईश्वर के प्रेम में डूबने, संप्रदायों की एकता और आध्यात्मिक मुक्ति की बात करता है. यह हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का गान है, जहां झूलेलाल और कलंदर एक हो जाते हैं.

फ़िल्मी दुनिया में कैसे आया यह गाना 

1950s में यह गाना पाकिस्तानी फिल्म 'जबरो' में आया, जहां मास्टर अशिक हुसैन ने कंपोज किया और फकीर सैयद सलाहुद्दीन ने गाया.  लेकिन असली धमाका 1960s-70s में हुआ, जब नूर जहां, सबरी ब्रदर्स और रुणा लैला ने इसे गाया. रुणा लैला की आवाज ने इसे इंटरनेशनल बनाया उनकी 'धरती की आवाज' ने गाने को नया जीवन दिया. फिर, नुसरत फतेह अली खान ने इसे ग्लोबल स्टेज पर पहुंचाया. उनकी क़व्वाली वर्जन में इतनी एनर्जी थी कि दुनिया भर में यह पॉप और फोक का मिक्सचर बन गया. भारत में यह बॉलीवुड फिल्मों में आया, जैसे 'डेविड', 'धनक', 'कोड नेम तिरंगा' और 'देव.डी' जैसे फिल्मों में दमा दम मस्त कलंदर का रिमिक्स वर्जन देखने को मिला है. 

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