Nana Patekar Funeral: पुणे की उस शाम माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी. जिस आवाज ने पर्दे पर कभी गुस्से को शब्द दिए, कभी दर्द को चेहरा और कभी कॉमेडी को नया अंदाज, वही आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थी. दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार पुणे के डोंजे गांव स्थित उनके फार्महाउस के पास किया गया. पत्नी नीलकांति पाटेकर और बेटे मल्हार पाटेकर ने उन्हें मुखाग्नि दी. अंतिम विदाई के दौरान ‘नाना साहेब अमर रहें’ के नारों से माहौल गूंज उठा.

नाना के पार्थिव शरीर को उनके फार्महाउस ‘नानाची वाड़ी’ में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. परिवार, करीबी दोस्तों, फिल्म जगत से जुड़े लोगों और राजनीतिक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. नाना के बेटे मल्हार ने भारी मन से अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं. मंत्रोच्चार के बीच जब अंतिम संस्कार हुआ तो ऐसा लगा जैसे भारतीय सिनेमा का एक खास अध्याय अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया हो.

गोवा से पुणे तक नाना का आखिरी सफर

8 अक्टूबर को 75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर का निधन गोवा में हुआ. उनके बेटे मल्हार के मुताबिक, गोवा स्थित घर में नाना को सीने में तेज दर्द हुआ था. मेडिकल टीम ने उन्हें बेहोशी की हालत में पाया और उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में करीब 45 मिनट तक उन्हें CPR देकर बचाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. डॉक्टरों ने सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित किया.

मौत के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत उनके पार्थिव शरीर को गोवा मेडिकल कॉलेज के शवगृह में रखा गया। पोस्टमार्टम और जरूरी औपचारिकताओं के बाद पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया और फिर एयर एंबुलेंस के जरिए पुणे लाया गया। इसके बाद उनके फार्महाउस पर अंतिम विदाई की तैयारियां पूरी की गईं. महाराष्ट्र सरकार की ओर से भी उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान के साथ किए जाने की घोषणा की गई थी.

परिवार और करीबी लोगों ने दी आखिरी विदाई

नाना के अंतिम संस्कार में परिवार के साथ फिल्म और राजनीति की दुनिया से जुड़े कई लोग पहुंचे. उनके करीबी मित्र और अभिनेता प्रवीण तरड़े, निर्देशक मेहुल कुमार, लेखक किरण, केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले, रूपाली चाकणकर, मेधा मांजरेकर, चंद्रकांत पाटिल समेत कई लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे.  नाना के बेटे मल्हार पूरे समय पिता के पार्थिव शरीर के पास नजर आए. अंतिम संस्कार की रस्मों के दौरान उनकी आंखों में पिता को खोने का दर्द साफ दिखाई दिया. नाना के चाहने वाले भी बड़ी संख्या में पहुंचे और उनके पैर छूकर आखिरी विदाई दी. 

1978 में ‘गमन’ से शुरू हुई कहानी

नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था. महाराष्ट्र में जन्मे नाना ने फिल्मों से पहले थिएटर की दुनिया में अपनी पहचान बनाई. 1978 में ‘गमन’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ. इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे ऐसे किरदारों को अपनी पहचान बनाया जो पारंपरिक हीरो की छवि से बिल्कुल अलग थे.  उनकी अदाकारी में सबसे अलग चीज थी- संवाद बोलने का अंदाज. वे संवाद सिर्फ बोलते नहीं थे, उन्हें अपने हावभाव, आवाज और आंखों के जरिए किरदार का हिस्सा बना देते थे. यही वजह रही कि उनका नाम किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं रहा.

‘परिंदा’ का अन्ना- जिससे खलनायक की परिभाषा बदल गई

1989 की ‘परिंदा’ नाना के करियर का बड़ा मोड़ बनी. विदु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में उन्होंने अन्ना सेठ का किरदार निभाया. यह किरदार इतना प्रभावशाली था कि नाना को Best Supporting Actor का National Film Award मिला. अन्ना सिर्फ एक सामान्य फिल्मी विलेन नहीं था। उसकी हिंसक प्रवृत्ति, अचानक बदलता मिजाज और भीतर छिपा डर नाना ने जिस तरह पर्दे पर उतारा, उसने उन्हें गंभीर और प्रभावशाली अभिनेता के तौर पर स्थापित कर दिया.

‘प्रहार’ में सैनिक, ‘तिरंगा’ में अलग तेवर

‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में नाना ने मेजर चौहान का किरदार निभाया. खास बात यह रही कि इस फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली. सैन्य अनुशासन और देशभक्ति के बीच खड़े इस किरदार में उनकी वही तीखी ऊर्जा दिखाई दी, जो आगे उनके कई किरदारों की पहचान बनी.

इसके बाद ‘तिरंगा’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया. नाना का सिनेमा लगातार यह दिखाता रहा कि वे सिर्फ एक भूमिका नहीं निभा रहे हैं, बल्कि हर किरदार की अपनी भाषा और अपनी देहभाषा बना रहे हैं.

‘क्रांतिवीर’ का प्रताप- जब आवाज आंदोलन बन गई

1994 की ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे निर्णायक फिल्मों में गिनी जाती है. उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया—एक ऐसा व्यक्ति जो व्यवस्था, भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है. इस भूमिका के लिए नाना को Best Actor का National Film Award मिला. राष्ट्रीय पुरस्कार की आधिकारिक प्रशस्ति में भी उनके अभिनय की विशेषता को रेखांकित किया गया था.

‘क्रांतिवीर’ ने नाना को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक ऐसी सिनेमाई आवाज बना दिया जिसके संवाद दर्शकों के बीच फिल्म से बाहर भी चर्चा का हिस्सा बनने लगे. उनके संवादों में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के पीछे व्यवस्था से सवाल करने की बेचैनी भी थी.

‘अग्निसाक्षी’ में तीसरा National Award

1996 में आई ‘अग्निसाक्षी’ में नाना ने एक जुनूनी और हिंसक पति का किरदार निभाया. यह भूमिका उनके पिछले किरदारों से बिल्कुल अलग थी, लेकिन उनकी अदाकारी की तीव्रता यहां भी उतनी ही प्रभावी रही. इस भूमिका के लिए उन्हें 1996 के प्रदर्शन पर 1997 में Best Supporting Actor का National Film Award मिला. National Film Awards की आधिकारिक प्रशस्ति में उनके किरदार को एक ‘obsessed husband’ के रूप में निभाए गए प्रभावशाली प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया था.

इस तरह नौ साल के भीतर नाना तीन National Film Awards जीतने वाले अभिनेताओं की खास श्रेणी में शामिल हो गए, ‘परिंदा’ के लिए Best Supporting Actor, ‘क्रांतिवीर’ के लिए Best Actor और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए फिर Best Supporting Actor. 

‘खामोशी’ और ‘अब तक छप्पन’ में अभिनय की दूसरी परत

‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में नाना ने एक अलग तरह की संवेदनशीलता दिखाई. वहीं ‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अधिकारी साधु अगाशे का किरदार उनकी गंभीर और सख्त स्क्रीन इमेज का एक और मजबूत उदाहरण बना.  इन भूमिकाओं में उनका अभिनय सिर्फ संवादों पर निर्भर नहीं था. चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और कई बार संवाद के बीच की खामोशी भी कहानी कहती थी। यही नाना की अभिनय शैली की सबसे बड़ी ताकत थी.

‘नटसम्राट’ में अभिनेता ने खुद को फिर खोजा

2016 की मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे भावुक और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में शामिल हुई. उन्होंने गणपतराव बेलवलकर का किरदार निभाया- एक ऐसा रंगमंच कलाकार जो जीवन भर तालियों के बीच रहा, लेकिन रिटायरमेंट के बाद अकेलेपन और बदलते पारिवारिक रिश्तों से जूझने लगता है. यह भूमिका नाना के थिएटर से गहरे रिश्ते को भी सामने लाती है. रंगमंच की भाषा, बड़े संवाद और फिर अचानक बेहद निजी दर्द- नाना ने गणपतराव के जरिए उम्र, सम्मान, परिवार और अकेलेपन की कहानी को बेहद प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारा. 

‘राजनीति’ में पर्दे के पीछे का रणनीतिकार

प्रकाश झा की ‘राजनीति’ में नाना पाटेकर ने ब्रिज गोपाल का किरदार निभाया. यह भूमिका बाकी फिल्मों से इसलिए अलग थी क्योंकि यहां उनका हथियार गुस्सा या हिंसा नहीं, बल्कि राजनीतिक समझ और रणनीति थी. किरदार को महाभारत के कृष्ण से प्रेरित माना गया और नाना ने इसे किसी ऊंची आवाज वाले नेता की तरह नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे से घटनाओं को प्रभावित करने वाले अनुभवी रणनीतिकार की तरह निभाया.

और फिर आया ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी

नाना पाटेकर की विरासत को सिर्फ गंभीर भूमिकाओं में देखना अधूरा होगा. ‘वेलकम’ ने उनके अभिनय का ऐसा रंग सामने रखा जिसने नई पीढ़ी को भी उनका प्रशंसक बना दिया. उदय शेट्टी एक गैंगस्टर था, लेकिन नाना ने उसमें गुस्सा, डर, भाई के प्रति चिंता, हास्य और अजीबोगरीब परिस्थितियों में फंसने की बेचैनी सब कुछ मिला दिया. अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी जोड़ी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन गई. बाद में उन्होंने ‘वेलकम बैक’ में भी उदय शेट्टी की भूमिका निभाई.  यही वह किरदार था जिसने साबित किया कि जिस अभिनेता को लोग ‘क्रांतिवीर’ और ‘परिंदा’ जैसे गंभीर किरदारों के लिए जानते हैं, वही कॉमेडी में भी उतना ही असर छोड़ सकता है. 

नाना की खासियत क्या थी?

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खूबी शायद यही थी कि उन्होंने खुद को किसी एक इमेज में कैद नहीं होने दिया. कभी वे खतरनाक गैंगस्टर बने, कभी सैनिक, कभी पुलिस अधिकारी, कभी राजनीतिक रणनीतिकार, कभी बूढ़े रंगमंच कलाकार और कभी ऐसा गैंगस्टर जिसे देखकर दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो गए. उनकी आवाज उनकी पहचान थी, लेकिन सिर्फ आवाज ही उनकी ताकत नहीं थी. संवाद बोलते समय चेहरे का तनाव, आंखों का इस्तेमाल, शरीर की गति और अचानक पैदा होने वाली खामोशी, इन सबने मिलकर नाना की अपनी अभिनय शैली बनाई.

तीन National Awards और Padma Shri

नाना पाटेकर को तीन National Film Awards मिले- ‘परिंदा’ के लिए Best Supporting Actor, ‘क्रांतिवीर’ के लिए Best Actor और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए Best Supporting Actor. 2013 में भारत सरकार ने उन्हें कला के क्षेत्र में Padma Shri से सम्मानित किया. भारत सरकार के 2013 के पद्म पुरस्कार राजपत्र में ‘Nana Gajanan Patekar’ का नाम कला श्रेणी में दर्ज है.  लेकिन नाना की पहचान सिर्फ पुरस्कारों से नहीं बनी। उनके लिए असली सम्मान शायद वह था जो उनके किरदारों को दर्शकों ने दिया, ऐसा सम्मान जिसमें अभिनेता और किरदार के बीच की दूरी खत्म हो जाती है. 

पर्दे से विदाई, किरदारों से नहीं

नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका सिनेमा उन्हें लंबे समय तक जिंदा रखेगा. ‘परिंदा’ का अन्ना, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप, ‘प्रहार’ का मेजर चौहान, ‘अब तक छप्पन’ का साधु अगाशे, ‘राजनीति’ का ब्रिज गोपाल, ‘नटसम्राट’ का गणपतराव और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी, ये सिर्फ किरदार नहीं, नाना की अभिनय यात्रा के अलग-अलग चेहरे हैं. 

पांच दशक के इस सफर में नाना ने साबित किया कि स्टार बनने के लिए हमेशा चमकदार पर्दे की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी एक आवाज, एक नजर, एक संवाद और किरदार में पूरी तरह उतर जाने की क्षमता ही अभिनेता को यादगार बनाने के लिए काफी होती है.

नाना पाटेकर पंचतत्व में विलीन हो गए... लेकिन जिस अभिनेता ने पर्दे पर इतने किरदारों में जान फूंकी, उसकी अपनी पहचान किसी एक फिल्म, एक संवाद या एक दौर तक सीमित नहीं हो सकती. नाना चले गए, मगर ‘नाना साहेब’ के किरदार और उनकी आवाज भारतीय सिनेमा की स्मृति में लंबे समय तक गूंजती रहेगी.