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असली नाम विश्वनाथ पाटेकर, पैसे के लिए चिपकाए पोस्टर, 750 रुपये में की शादी, एक बेटे की मौत दूसरा क्या करता, अलविदा नाना

नाना पाटेकर की जिंदगी जितनी संघर्षों से भरी रही, उनका परिवार भी उतना ही दिलचस्प रहा है. अभिनेता के दो भाइयों अशोक और दिलीप का जिक्र मिलता है, वहीं उनके भाई-बहनों को लेकर कई अलग-अलग जानकारियां सामने आती रही हैं. ऐसे में आइए जानते हैं नाना पाटेकर की फुल लाइफ स्टोरी और उनकी कहानी क्या है.

असली नाम विश्वनाथ पाटेकर, पैसे के लिए चिपकाए पोस्टर, 750 रुपये में की शादी, एक बेटे की मौत दूसरा क्या करता, अलविदा नाना
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नाना पाटेकर फिल्म इंडस्ट्री का वो नाम जिसने अपने काम के साथ-साथ अपने व्यवहार से भी लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी. सालों तक लोगों के दिलों दिमाग पर राज करते वाले नाना आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उन्होंने 8 अक्टूबर 2026 को हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया. आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें, उनका स्वभाव, हमेशा सबकी मदद करने को तत्पर और भी बहुत बातें जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है.

नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था. उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था. उनका परिवार मराठी था. उनके पिता का नाम दिनकर गजानन पाटेकर और मां का नाम संजना निर्मला पाटेकर था. परिवार में उनके दो भाई अशोक और दिलीप भी थे. अशोक पाटेकर नाना के बड़े भाइयों में से एक हैं. नाना ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि वह अपने दोनों भाइयों के साथ मुरुड में रहते हुए बड़े हुए. दिलीप पाटेकर नाना के दूसरे भाई हैं. उनके पिता मुंबई में रहते थे और बच्चे साल में एक बार उनसे मिलने मुंबई जाते थे. बाद में परिवार मुंबई आ गया.

जब नाना किशोरावस्था में थे, तब उनके पिता के बिजनेस पार्टनर ने उन्हें धोखा दिया, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. इसके बाद नाना को नौवीं कक्षा में पढ़ाई के साथ काम करना पड़ा. वह फिल्मों के पोस्टर पेंट करके परिवार की आर्थिक मदद करते थे.

कहां से की पढ़ाई, फिल्मों के पोस्टर करते थे पेंट, कितनी होती थी कमाई?

नाना ने सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट, मुंबई से पढ़ाई की. पढ़ाई के साथ ही उनका रुझान थिएटर की तरफ बढ़ता गया. उनके पिता को भी नाटक और तमाशा देखने का शौक था और उन्होंने नाना की अभिनय में रुचि को प्रोत्साहित किया. हालांकि बचपन में उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक थी, लेकिन बाद में एक करीबी व्यक्ति के धोखे से परिवार की संपत्ति और कारोबार को बड़ा नुकसान हुआ. नाना उस समय करीब 13 साल के थे. इसके बाद परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा.

नौवीं कक्षा में पढ़ते हुए नाना ने परिवार की मदद के लिए काम करना शुरू कर दिया. वह मुंबई में फिल्मों के पोस्टर पेंट करते थे. इसके लिए उन्हें करीब 35 रुपये महीने और एक वक्त का खाना मिलता था. काम की जगह तक पहुंचने के लिए वह कई किलोमीटर पैदल जाते थे. बाद में उन्होंने बताया था कि भूख और संघर्ष ने उन्हें जिंदगी का ऐसा अनुभव दिया, जिसे कोई एक्टिंग स्कूल नहीं सिखा सकता था.

थिएटर से फिल्मों तक कैसे पहुंचे?

पढ़ाई पूरी करने के बाद नाना ने एक एड एजेंसी में कमर्शियल आर्टिस्ट और विजुअलाइजर के तौर पर काम किया. लेकिन उनका मन थिएटर में ज्यादा लगता था. उन्होंने नौकरी छोड़कर रंगमंच को अपना करियर बनाने का फैसला किया.

मराठी थिएटर में उन्होंने कई नाटकों में काम किया. निर्देशक विजया मेहता उनके शुरुआती थिएटर करियर की महत्वपूर्ण शख्सियतों में थीं. 1979 में विजया मेहता के निर्देशन में 'हमीदाबाई की कोठी' उनके करियर के अहम नाटकों में शामिल रहा.

फिल्मों में आने का रास्ता भी सीधे तौर पर एक बड़ी एक्ट्रेस ने खोला. यह और कोई नहीं ये एक्ट्रेस थी स्मिता पाटिल, वो नाना को जानती थीं और उन्होंने नाना को फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया. नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि स्मिता पाटिल उन्हें फिल्मकार रवि चोपड़ा के पास लेकर गई थीं. नाना की पहली फिल्म 'गमन' (1978) मानी जाती है.

शुरुआती दौर में उन्हें छोटे और सहायक किरदार मिले. इस फिल्म में नाना ने'वासु' नाम का एक छोटा सा सहायक रोल निभाया था. फिल्म के निर्देशक मुजफ्फर अली थे. इसके बाद 'अंकुश' (1986) ने उन्हें पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई, जबकि 'सलाम बॉम्बे!' (1988) ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नोटिस करवाया. मीरा नायर की 1988 में आई फिल्म 'सलाम बॉम्बे!' में नाना पाटेकर ने बाबा (Baba Gulab) नाम का किरदार निभाया था. वे फिल्म में एक कड़क और खतरनाक स्वभाव वाले व्यक्ति (पेंसर / दलाल टाइप का किरदार) के रूप में नजर आते हैं जो वेश्यावृत्ति के धंधे और स्थानीय अवैध कामों से जुड़े होते हैं.

इसके बाद 'परिंदा', 'प्रहार', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण', 'वेलकम' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों ने उनकी अलग पहचान बनाई.खास बात यह रही कि नाना ने सिर्फ गंभीर भूमिकाएं ही नहीं कीं. उन्होंने विलेन, पुलिस अधिकारी, सामाजिक किरदार और कॉमेडी किरदार भी किए. 'वेलकम' के उदय शेट्टी ने उनकी लोकप्रियता को एक अलग दर्शक वर्ग तक पहुंचाया.

शादी, पत्नी और बच्चों की कहानी

नाना पाटेकर ने 1978 में नीलकांति पाटेकर से शादी की थी. नीलकांति भी थिएटर और मराठी फिल्म जगत से जुड़ी रही हैं. वह बैंक में नौकरी भी कर चुकी थीं. दोनों बाद में अलग-अलग रहने लगे, उनका रिश्ता कानूनी रूप से खत्म नहीं हुआ था.

नाना और नीलकांति के दो बेटे हुए थे, दुर्वासा और मल्हार. दुर्वासा की बचपन में करीब ढाई साल की उम्र में बीमारी के कारण मौत हो गई थी. यह घटना नाना के जीवन की सबसे बड़ी पर्सनल ट्रैजेडी में से एक रही. उनके दूसरे बेटे मल्हार पाटेकर हैं. उनकी निजी जिंदगी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही. उन्होंने मराठी थिएटर से जुड़ीं नीलकांति पाटेकर से पलव मैरिज की थी. दोनों ने जिंदगी की शुरुआत आर्थिक संघर्षों के बीच की. हालांकि, शादी के कुछ साल बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे. दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय तक अलग रहने के बावजूद उन्होंने तलाक नहीं लिया. नाना कई इंटरव्यू में अपनी पत्नी के योगदान और उनके प्रति सम्मान की बात कर चुके हैं.

नीलकांति पाटेकर मराठी मनोरंजन जगत से जुड़ी रही हैं. अभिनय के अलावा उन्होंने नौकरी भी की थी. वह बैंक में अधिकारी के पद पर काम करती थीं. नीलकांति को बचपन से ही अभिनय में दिलचस्पी थी और उन्होंने थिएटर तथा फिल्मों में काम किया. नाना और नीलकांति की मुलाकात थिएटर के दिनों में हुई थी. दोनों के बीच दोस्ती हुई और धीरे-धीरे यह रिश्ता प्यार में बदल गया. उस समय नाना फिल्म इंडस्ट्री में आज जैसी पहचान नहीं बना पाए थे. वह थिएटर में काम करते थे और फिल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे.

नीलकांति ने उनके संघर्ष के दिनों में उनका साथ दिया. नाना ने खुद भी कई मौकों पर माना कि उनके करियर को बनाने में पत्नी का बड़ा योगदान रहा है. नाना पाटेकर और नीलकांति ने साल 1978 में शादी की थी. उनकी शादी से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा अक्सर चर्चा में आता है. दोनों की शादी का खर्च करीब 750 रुपये था. उस समय नाना के पास ज्यादा पैसे नहीं थे. वह थिएटर में काम करके कमाई करते थे, जबकि नीलकांति बैंक की नौकरी करती थीं. नीलकांति की मासिक सैलरी करीब 2,500 रुपये थी, जबकि नाना को थिएटर के एक शो के लिए लगभग 50 रुपये मिलते थे. ऐसे में परिवार चलाने में नीलकांति की कमाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

पत्नी ने नाना के करियर में कैसे निभाई अहम भूमिका?

नाना पाटेकर ने एक इंटरव्यू में अपनी पत्नी के योगदान का जिक्र करते हुए उनके प्रति आभार जताया था. उन्होंने बताया था कि जब वह अभिनय की दुनिया में संघर्ष कर रहे थे, तब नीलकांति नौकरी करती थीं और घर की जिम्मेदारियां संभालती थीं.

नाना के अनुसार, पत्नी की नौकरी के कारण उन्हें अभिनय में अपना करियर बनाने का मौका मिला. जब वह थिएटर और फिल्मों में काम कर रहे थे, तब नीलकांति की नियमित कमाई परिवार के लिए सहारा बनी हुई थी.

नाना ने यह भी बताया था कि परिवार की जिम्मेदारियों के कारण नीलकांति ने अपने करियर को पीछे रखा. उनके बेटे मल्हार और नाना की मां भी नीलकांति के साथ रहते थे. नाना ने अलग रहने की व्यवस्था के बारे में बात करते हुए पत्नी के योगदान को स्वीकार किया था.

शादी के बाद क्यों अलग रहने लगे नाना और नीलकांति?

नाना पाटेकर और नीलकांति की शादी के कुछ साल बाद उनके रिश्ते में दूरियां आ गईं. दोनों ने अलग-अलग रहना शुरू कर दिया. हालांकि, उनके अलग रहने की परिस्थितियों को लेकर मीडिया में अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं.

नाना ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि उनके और नीलकांति के बीच कुछ ऐसे मतभेद पैदा हो गए थे, जिन्हें दूर करना मुश्किल हो गया था. इसके बाद दोनों ने अलग रहने का फैसला किया.उन्होंने यह भी बताया था कि उनकी मां और बेटा मल्हार नीलकांति के साथ रहते थे, जबकि वह खुद अलग रहते थे. यानी दोनों के बीच दूरी होने के बावजूद परिवार के सदस्य आपस में जुड़े रहे. नाना और नीलकांति ने कानूनी रूप से तलाक नहीं लिया था. इसलिए अलग रहने के बावजूद दोनों पति-पत्नी बने रहे.

बेटे की मौत ने परिवार को दिया गहरा दुख

नाना और नीलकांति के दो बेटे हुए थे. उनके बड़े बेटे का नाम दुर्वासा था, जबकि छोटे बेटे का नाम मल्हार है.दुर्वासा की करीब ढाई साल की उम्र में बीमारी के कारण मौत हो गई थी. यह परिवार के लिए बेहद दुखद घटना थी.

कुछ रिपोर्टों में नाना ने स्वीकार किया था कि इस घटना के बाद वह भावनात्मक रूप से काफी प्रभावित हुए थे. उन्होंने अपने पुराने इंटरव्यू में बेटे की बीमारी और उसके निधन के समय परिवार पर पड़े असर का जिक्र भी किया था. हालांकि, इस निजी घटना को उनके वैवाहिक रिश्ते में आई दूरी का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा.उनके छोटे बेटे मल्हार ने फिल्म इंडस्ट्री में काम किया है. वह फिल्मों के निर्माण और निर्देशन से जुड़े रहे हैं. उन्होंने अपने पिता की तरह लाइमलाइट से दूरी बनाए रखी है.

उनके बेटे मल्हार ने फिल्म इंडस्ट्री में काम किया है और निर्देशन से भी जुड़े रहे हैं. नाना ने उन्हें अपने स्टारडम के सहारे लॉन्च कराने की कोशिश नहीं की. उनका मानना था कि बेटे को अपना रास्ता खुद बनाना चाहिए. मल्हार ने लाइमलाइट से दूरी बनाए रखी है.

जिस घर में रहते थे, वहां भी दिखी सादगी

करोड़ों की कमाई और दशकों की लोकप्रियता के बावजूद नाना की निजी जिंदगी बेहद सादगी वाली रही. मुंबई में वह लंबे समय तक एक छोटे 1BHK घर में रहे. उन्होंने यह घर कई दशक पहले करीब 1.1 लाख रुपये में खरीदा था और अपनी मां के साथ भी यहां रहे.नाना को खेती का भी शौक था. महाराष्ट्र में उन्होंने जमीन और किसानों से जुड़े कामों में दिलचस्पी ली. उनकी छवि ऐसे कलाकार की रही जो ग्लैमर से दूर रहकर सामान्य जिंदगी जीना पसंद करता था.

कौन-कौन से बड़े अवॉर्ड मिले?

नाना पाटेकर को अपने करियर में कई बड़े सम्मान मिले. उनके नाम तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दर्ज हैं.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता: 'परिंदा'

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ अभिनेता: 'क्रांतिवीर'

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता: 'अग्निसाक्षी'

फिल्मफेयर अवॉर्ड: 'परिंदा', 'अंगार', 'क्रांतिवीर' और 'अपहरण' समेत अलग-अलग श्रेणियों में

फिल्मफेयर मराठी अवॉर्ड: 'डॉ. प्रकाश बाबा आमटे: द रियल हीरो' और अन्य काम

2013 में पद्मश्री: कला और सिनेमा के क्षेत्र में योगदान के लिए

उनकी अवॉर्ड सूची में तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड और चार फिल्मफेयर अवॉर्ड प्रमुख हैं.

'क्रांतिवीर' उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है. इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर दोनों मिले. 'परिंदा' के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

कौन सा फाउंडेशन चलाते थे?

नाना पाटेकर और मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने सितंबर 2015 में NAAM Foundation की शुरुआत की थी. इसका मुख्य फोकस महाराष्ट्र के किसानों और सूखे से प्रभावित गांवों की मदद करना है.फाउंडेशन किसानों की मदद, जल संरक्षण, पुराने जलस्रोतों और नहरों को पुनर्जीवित करने तथा ग्रामीण इलाकों के विकास से जुड़े काम करता है. इसका उद्देश्य किसानों को संकट से बाहर निकालना और गांवों में बेहतर जीवन की परिस्थितियां तैयार करना है. नाना ने अपनी लोकप्रियता को केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रखा. वह किसानों की समस्याओं पर सार्वजनिक रूप से बोलते रहे और सामाजिक कामों से जुड़े रहे.

एक साधारण शुरुआत से 'नटसम्राट' तक

नाना पाटेकर की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनका सफर सीधे स्टारडम से शुरू नहीं हुआ. 13 साल की उम्र में परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद फिल्म पोस्टर पेंट करने वाले इस लड़के ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में अपनी जगह बनाई.

'गमन' से शुरू हुआ फिल्मी सफर 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी', 'अब तक छप्पन', 'वेलकम' और 'नटसम्राट' तक पहुंचा. उन्होंने अभिनय के अलावा निर्देशन और लेखन में भी काम किया. उनकी फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' उनके निर्देशन करियर की महत्वपूर्ण फिल्म रही.

नाना की जिंदगी में गरीबी, पिता की मौत, बेटे की असमय मौत, पत्नी से अलग रहना और संघर्ष जैसे कई निजी अध्याय आए. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पहचान एक ऐसे कलाकार के तौर पर बनाई, जिसकी आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और अभिनय की तीव्रता अलग थी.

क्या थे नाना पाटेकर के शौक?

खाना पकाना और लोगों को खिलाना

नाना पाटेकर को खुद खाना बनाना पसंद था. वह शूटिंग के दौरान फिल्म की पूरी यूनिट के लिए भी खाना बनाते थे. उनके लिए दूसरों को अपने हाथों से खाना खिलाना खुशी की बात थी. उन्होंने एक इंटरव्यू में मजाकिया अंदाज में कहा था कि वह खुद को अभिनेता से बेहतर कुक मानते हैं.

खेती करना और गांव में समय बिताना

नाना को खेती से गहरा लगाव था. पुणे के पास सिंहगढ़ किले के नजदीक उनकी करीब 10 एकड़ जमीन होने की रिपोर्ट है. यहां वह चावल, मूंगफली, लहसुन और प्याज जैसी फसलें उगाते थे. खेती उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि सुकून पाने का एक तरीका भी थी.

किताबें पढ़ना

नाना को किताबें पढ़ने का शौक था. वह उन चीजों को पसंद करते थे, जो उन्हें सोचने और जिंदगी को समझने का मौका देती हैं. उनकी रुचियों में पढ़ना भी शामिल रहा है.

संगीत सुनना

अभिनय के अलावा नाना को संगीत में भी दिलचस्पी थी. किताबें पढ़ना, संगीत सुनना और अच्छी फिल्में देखना उनकी पसंदीदा गतिविधियों में शामिल रहा है.

जानवरों की देखभाल करना

गांव में रहने के दौरान नाना पाटेकर गायों और बैल की देखभाल भी करते थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास दो गायें और एक बैल थे. वह अपने फार्म पर समय बिताना और रोजमर्रा के काम खुद करना पसंद करते थे.

थिएटर और अभिनय की बारीकियां सीखना

नाना का थिएटर से पुराना रिश्ता रहा. फिल्मों में आने से पहले उन्होंने रंगमंच पर काम किया था. थिएटर ने उनके अभिनय को गहराई दी. फिल्मी करियर बनाने के बाद भी उनका जुड़ाव अभिनय और रंगमंच से बना रहा.

किसानों की मदद करना भी रहा खास लगाव

नाना पाटेकर की दिलचस्पी सिर्फ निजी शौक तक सीमित नहीं थी. उन्हें किसानों की समस्याओं से भी गहरा लगाव था. अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने NAAM Foundation शुरू किया, जो किसानों और सूखे से प्रभावित ग्रामीण परिवारों की मदद के लिए काम करता है. अपनी खेती से मिलने वाली उपज से जरूरतमंद किसानों की मदद करने की बात भी उनसे जुड़ी रिपोर्टों में सामने आई है.

आइए जानते हैं नाना के 5 डायलॉग जो हमेशा लोगों के दिलों में रहेंगे

क्रांतिवीर (1994) का डायलॉग: "आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने... ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून... बता इसमे मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा, बता!"

क्यों याद रहेगा: यह भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे दमदार और प्रभावशाली दृश्यों में से एक है, जहां वे समाज में फैले धार्मिक भेदभाव पर तीखा प्रहार करते हैं।

फिल्म: वेलकम (2007) डायलॉग: "भगवान का दिया हुआ सब कुछ है... दौलत है, शोहरत है, इज़्ज़त है..."• क्यों याद रहेगा: 'उदय भाई' के किरदार में बोला गया यह डायलॉग आज के समय में सोशल मीडिया पर मीम्स (Memes) और रोजमर्रा की बातचीत में बेहद लोकप्रिय है.

फिल्म: तिरंगा (1993) डायलॉग: "अपना तो उसूल है... पहले लात, फिर बात, उसके बाद मुलाकात।" क्यों याद रहेगा: ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के किरदार में उनका यह बेबाक और कड़क अंदाज दर्शकों को बेहद पसंद आया था.

फिल्म: यशवंत (1997) डायलॉग: "एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!" क्यों याद रहेगा: इस एक साधारण से वाक्य को नाना पाटेकर ने जिस कॉमिक और गंभीर लहजे के मिश्रण के साथ बोला, उसने इसे हमेशा के लिए अमर बना दिया

फिल्म: परिंदा (1989)डायलॉग: "धंधे में कोई किसी का भाई नहीं, कोई किसी का बेटा नहीं।" क्यों याद रहेगा: 'अन्ना' के नकारात्मक किरदार में इस डायलॉग को बोलते हुए नाना पाटेकर के चेहरे के हाव-भाव ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे. इसके लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला था.

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