Ghooskhor Pandat Controversy: पोंगा पंडित से लेकर घूसखोर पंडित तक, कब-कब और क्यों हुआ बवाल?
‘घूसखोर पंडित’ को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर फिल्मी टाइटल और धार्मिक भावनाओं की बहस को जिंदा कर दिया है. 1975 के ‘पोंगा पंडित’ से पीके और अब घूसखोर पंडत 2026 के इस प्रोजेक्ट तक कब-कब और क्यों मचा बवाल?;
फिल्म का नाम, सिर्फ एक टाइटल नहीं, बल्कि कई बार पूरा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बन जाता है. ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर उठा ताजा विवाद इसी बहस को फिर सुर्खियों में ले आया है. आरोप है कि धार्मिक पहचान से जुड़े शब्द को नकारात्मक विशेषण के साथ जोड़ना आस्था पर चोट है. जबकि फिल्मकार इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यंग्य की परंपरा बताते हैं. सोशल मीडिया से लेकर कानूनी नोटिस तक, मामला सिर्फ एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सवाल खड़ा कर रहा है कि मनोरंजन और धार्मिक संवेदनशीलता की सीमा आखिर कहां तय होती है?
दरअसल, यह पहली बार नहीं है, जब किसी फिल्म के शीर्षक ने विवाद को जन्म दिया हो. 1975 की ‘पोंगा पंडित’ से लेकर ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘OMG’, ‘PK’, ‘सेक्सी दुर्गा’ और ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ तक - भारतीय सिनेमा में कई बार टाइटल ही बहस की वजह बना है. हर दौर में तर्क अलग रहे, लेकिन केंद्र में एक ही सवाल रहा. रचनात्मक आजादी बनाम धार्मिक भावनाएं. ‘घूसखोर पंडित’ विवाद ने एक बार फिर इस पुरानी बहस को नए दौर में खड़ा कर दिया है.
Ghooskhor Pandat Controversy: क्या है पूरा मामला?
‘घूसखोर पंडित’ शीर्षक को लेकर हाल में सोशल मीडिया और कुछ संगठनों के बीच विवाद खड़ा हुआ है. आरोप है कि धार्मिक पहचान से जुड़े शब्द को नकारात्मक विशेषण के साथ जोड़ना अपमानजनक है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट से अभिनेता मनोज बाजपेयी और निर्देशक नीरज पांडे का नाम जोड़ने के बाद बहस और तेज हो गई. FIR और कानूनी नोटिस की खबरों ने इसे राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बना दिया.
1. ‘हवस का पुजारी’
हवस का पुजारी' (विशेषकर 2008 या अन्य संस्करण) मुख्य रूप से एक थ्रिलर या रोमांटिक फिल्म है. इसमें वासना, धोखे और रिश्तों में उलझनों को दिखाया गया है. 80-90 के दशक में बी-ग्रेड या एक्सप्लोइटेशन सिनेमा में इस तरह 'हवस' शब्द का इस्तेमाल खूब हुआ. ऐसे शीर्षक अक्सर सनसनी फैलाने, धार्मिक या नैतिक प्रतीकों के साथ उत्तेजक शब्द जोड़कर ध्यान खींचने के लिए रखे जाते थे. कई बार ये नाम पोस्टर या पब्लिसिटी मटेरियल में उछलते हैं, पर औपचारिक रिलीज का ठोस रिकॉर्ड नहीं मिलता.
2. ‘पोंगा पंडित’ (1975)
रणधीर कपूर और नीतू सिंह अभिनीत यह फिल्म 70 के दशक की हल्की-फुल्की कॉमेडी थी. शीर्षक भले आज के संदर्भ में व्यंग्यात्मक लगे, लेकिन उस दौर में यह किसी खास धार्मिक समुदाय पर हमला नहीं माना गया. यह मुख्यतः पारिवारिक-रोमांटिक मनोरंजन फिल्म थी और विवादों में खास नहीं रही.
3. ‘गुनाहों का देवता’ 1969
यह मूल रूप से धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास (1949) का नाम है, जिस पर आधारित 1969 में एक फिल्म बनी थी. फिल्म में प्रेम, त्याग और नैतिक द्वंद्व की कहानी दिखाई गई थी. शीर्षक भले ही उत्तेजक लगता हो, लेकिन इसका आशय धार्मिक विवाद नहीं बल्कि मानवीय कमजोरियों और आदर्शवाद के संघर्ष से था. यह क्लासिक साहित्यिक कृति के फिल्म रूपांतरण के रूप में जानी जाती है, न कि किसी धार्मिक विवाद के रूप में.
4. ‘राम तेरी गंगा मैली’ (1985)
राज कपूर निर्देशित इस फिल्म ने रिलीज के समय खूब सुर्खियां बटोरीं थीं. शीर्षक में 'राम' शब्द होने के कारण कुछ समूहों ने आपत्ति जताई, जबकि असली विवाद फिल्म के बोल्ड दृश्यों को लेकर ज्यादा था. मंदाकिनी के झरने वाले दृश्य पर काफी चर्चा हुई. हालांकि, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और इसे सामाजिक-रोमांटिक ड्रामा के रूप में याद किया जाता है, न कि किसी धार्मिक अपमान के इरादे से बनी फिल्म के तौर पर.
5. ‘Sins’ 2005
विनोद पांडे निर्देशित यह फिल्म केरल के एक पादरी और यौन शोषण के वास्तविक मामले से प्रेरित थी. फिल्म में चर्च पृष्ठभूमि होने के कारण कुछ ईसाई संगठनों ने विरोध दर्ज कराया. हालांकि, फिल्म का फोकस धार्मिक संस्था से ज्यादा व्यक्तिगत अपराध और नैतिक पतन पर था. रिलीज के समय इसे लेकर बहस हुई, पर यह मुख्यधारा की बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं बन सकी.
6. OMG - Oh My God! 2012
उमेश शुक्ला निर्देशित और परेश रावल-अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म OMG यानी Oh My God! 2012 में रिलीज हुई और रिलीज के साथ ही चर्चा और विवाद दोनों का केंद्र बन गई. कहानी एक ऐसे आम आदमी (कांजी लालजी मेहता) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भूकंप में अपनी दुकान नष्ट होने के बाद बीमा कंपनी के एक्ट ऑफ गॉड तर्क को अदालत में चुनौती देता है और सीधे भगवान के खिलाफ केस ठोक देता है. फिल्म में धर्म के नाम पर पाखंड, अंधविश्वास और तथाकथित ‘गॉडमैन’ संस्कृति पर व्यंग्य किया गया था. कुछ धार्मिक संगठनों ने इसे आस्था पर चोट बताया, लेकिन बड़ी संख्या में दर्शकों ने इसे सामाजिक व्यंग्य के रूप में सराहा. फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही और बाद में इसे भारतीय सिनेमा में ‘रिलिजियस सटायर’ की मजबूत मिसाल माना गया.
7. PK 2014
राजकुमार हिरानी निर्देशित और आमिर खान अभिनीत PK 2014 में रिलीज हुई और साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल रही. कहानी एक एलियन (PK) की है, जो पृथ्वी पर आकर मानव समाज की धार्मिक संरचनाओं, कर्मकांडों और तथाकथित ‘गॉडमैन’ संस्कृति पर सवाल उठाता है. फिल्म ने आस्था और अंधविश्वास के बीच की रेखा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी. कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, पोस्टर जलाए गए और निर्माताओं पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे. बावजूद इसके, फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई की और सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही. PK को भारतीय सिनेमा में साहसिक विषयवस्तु और व्यंग्यात्मक प्रस्तुति के लिए याद किया जाता है.
8. ‘सेक्सी दुर्गा’ (‘S. Durga’) 2017
मलयालम फिल्ममेकर संजीव शिवन की फिल्म 'सेक्सी दुर्गा' अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई गई, लेकिन भारत में शीर्षक को लेकर विवाद हुआ. सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जताई कि देवी 'दुर्गा' के साथ 'सेक्सी' शब्द जोड़ना धार्मिक भावनाएं आहत कर सकता है. बाद में शीर्षक बदलकर 'S. Durga' किया गया. फिल्म सामाजिक-राजनीतिक थ्रिलर थी, धार्मिक विषय पर नहीं.
9. ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ या ‘लक्ष्मी’ 2020
अक्षय कुमार अभिनीत इस फिल्म का मूल नाम 'लक्ष्मी बॉम्ब' था, जिसे 2020 में OTT रिलीज से पहले बदलकर सिर्फ 'लक्ष्मी' कर दिया गया. कुछ संगठनों ने तर्क दिया कि 'लक्ष्मी' जैसे देवी नाम को 'बॉम्ब' शब्द के साथ जोड़ना आपत्तिजनक है. विवाद बढ़ने के बाद निर्माताओं ने शीर्षक बदला. फिल्म तमिल फिल्म 'कंचना' का रीमेक थी और इसकी कहानी एक ट्रांसजेंडर आत्मा के इर्द-गिर्द घूमती है.
10. ‘घूसखोर पंडित’ 2026
इस नाम से किसी बड़े बैनर की रिलीज फिल्म का प्रमाणित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में सोशल मीडिया या छोटे प्रोडक्शन के स्तर पर ऐसे शीर्षकों को लेकर विवाद की खबरें सामने आईं. यह इमेजिंग/विवादित प्रोजेक्ट है जिसमें मनोज बाजपेयी प्रमुख भूमिका में हैं. इस फिल्म के शीर्षक के कारण विवाद उत्पन्न हुआ है और कई समूहों ने इसे अपमानजनक बताया है. शीर्षक को लेकर FIR और कानूनी नोटिस भी दर्ज हुए हैं. केंद्र तथा भाजपा नेतृत्व ने नेटफ्लिक्स से प्रचार सामग्री हटाने का निर्देश दिया है. इस फिल्म के डायरेक्टर नीरज पांडे हैं.
अभिव्यक्ति बनाम आस्था
भारतीय सिनेमा में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल नया नहीं है. फर्क इतना है कि अब सोशल मीडिया के दौर में प्रतिक्रिया तेज और संगठित होती है. सवाल यह है - क्या विवाद फिल्म को प्रमोशन देता है या सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाता है?