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क्‍या ईरान पर जल्‍द हमला करने वाला है अमेरिका? ट्रंप के हाथ में अंतिम फैसला, 23 साल बाद इलाके में सबसे बड़ी सैन्‍य तैनाती

23 साल बाद अमेरिका ने ईरान के नजदीक अपनी सबसे बड़ी नौसैनिक और वायु ताकत तैनात की. ट्रंप अंतिम फैसला लेंगे, लेकिन फिलहाल कूटनीति प्राथमिकता में है.

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( Image Source:  X/@USNavy )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Updated on: 19 Feb 2026 9:14 AM IST

क्‍या अमेरिका ईरान पर जल्‍द ही हमला करने वाला है. ये सवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ है कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में 2003 के इराक़ हमले के बाद अपनी सबसे बड़ी सैन्य ताकत तैनात की है. इस कदम ने ईरान के खिलाफ संभावित हमलों की चिंता बढ़ा दी है. सीएनएन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना एक हफ्ते के भीतर हमले के लिए तैयार हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और सलाहकारों तथा विदेशी नेताओं से बातचीत कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने अभी तक किसी हवाई या जमीन पर हमले का अंतिम निर्णय नहीं लिया है.

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने बुधवार को कहा कि कूटनीति अभी भी ट्रंप का “पहला विकल्प” है, लेकिन सैन्य कार्रवाई पूरी तरह से टेबल पर है. उन्होंने कहा, “ईरान पर हमला करने के लिए कई कारण और तर्क मौजूद हैं. राष्ट्रपति अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से गहरी सलाह लेते हैं.”

इतनी बड़ी सैन्‍य तैनाती के क्‍या हैं मायने?

अमेरिका ने इस बार अपनी नौसैनिक और वायु ताकत को बढ़ा दिया है. पहले से ही मध्य पूर्व में 13 अमेरिकी युद्धपोत तैनात हैं, जिनमें USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर शामिल है. इसके अलावा नौ विध्वंसक जहाज और तीन लिटोरल कॉम्बैट शिप्स भी मौजूद हैं. दुनिया के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R. Ford को कैरिबियाई सागर से भेजा गया है. इसके साथ तीन और विध्वंसक जहाज भी आने वाले हैं. इस तैनाती से अमेरिका की नौसैनिक ताकत और बढ़ गई है और यह ईरान के लिए खतरे का संकेत है.

हवाई ताकत भी बढ़ा दी गई है. F-22 और F-35 जैसे एडवांस लड़ाकू विमानों के साथ-साथ F-15 और F-16 और KC-135 रिफ़्यूलिंग विमान को ईरान के नजदीक तैनात किया गया है. कमांड और कंट्रोल विमान भी पहुंच चुके हैं ताकि लंबे समय तक चलने वाले हवाई अभियान को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके. विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी ताकत का होना अपने आप में एक संदेश है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.

क्‍या अपनी सुरक्षा कर पाएगा ईरान?

ईरान ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है. सैटेलाइट इमेज और रिसर्च के मुताबिक, ईरान ने संवेदनशील स्थलों पर कंक्रीट की ढाल बनाना शुरू कर दी है. इसमे Taleghan 2 साइट, Isfahan न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स की सुरंगें और Natanz साइट्स शामिल हैं. ईरानी मिसाइल बेस Shiraz South और Qom को भी पिछले साल के इजरायल हमलों के बाद फिर से मजबूत किया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुरक्षात्मक उपायों के कारण अमेरिका के हवाई अभियान को और मुश्किल हो सकती है. सुरंगों को मिट्टी से ढकने से संभावित हमलों का असर कम हो जाएगा और जमीन पर पहुंचना भी कठिन हो जाएगा.

Image Credit: X/@USNavy

क्‍या होर्मुज स्‍ट्रेट को फिर इस्‍तेमाल करेगा ईरान?

अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप को विकल्पों के बारे में ब्रीफ किया गया है. इसमें सीमित हमले, जैसे कि न्यूक्लियर और मिसाइल सुविधाओं पर निशाना, या व्यापक अभियान जिसमें ईरानी नेतृत्व और क्षेत्रीय सहयोगी शामिल हों, पर विचार किया जा रहा है. लंबी दूरी के बमबारी करने वाले विमान, जैसे B-2 बॉम्बर, अमेरिका या हिंद महासागर के डिएगो गार्सिया से तैनात किए जा सकते हैं.

ईरान अपनी मिसाइल शक्ति पर निर्भर है और उसकी एयर फोर्स सीमित है. किसी भी अमेरिकी हमले का जवाब ईरान अपने हवाई ठिकानों और सहयोगियों पर हमला करके या होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करके दे सकता है. विश्लेषकों का कहना है कि इतनी बड़ी तैनाती ही ईरान को समझौते के लिए दबाव में डाल सकती है.

क्या अमेरिका हमला करेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं लिया है. उन्होंने सलाहकारों और विदेशी नेताओं से बातचीत कर रहे हैं. व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि अभी डिप्लोमेसी यानी कूटनीति प्राथमिकता है, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई की पूरी संभावना बनी हुई है. साथ ही, अमेरिका की वायु और नौसैनिक ताकत इतनी व्यापक है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में तेज प्रतिक्रिया दी जा सकती है. इस कदम से न केवल ईरान बल्कि पूरे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ सकता है.

अगर जंग हुई तो दुनिया पर क्‍या होगा असर?

मध्य पूर्व में अमेरिका की इतनी बड़ी तैनाती का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा. अगर हमले होते हैं, तो तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, ईरान के साथ तनाव बढ़ने से पड़ोसी देशों में सुरक्षा और आर्थिक चिंता भी बढ़ेगी. विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के बजाय कूटनीति ही बेहतर विकल्प है, क्योंकि युद्ध की स्थिति में जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है. साथ ही, हवाई हमलों का असर तुरंत नहीं, बल्कि लंबे समय तक महसूस होगा.

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब चरम पर है. अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सबसे बड़ी ताकत तैनात कर दी है, जबकि ईरान ने भी अपनी सुरक्षा बढ़ा दी है. राष्ट्रपति ट्रंप अभी अंतिम निर्णय लेने की स्थिति में हैं. इस पूरे घटनाक्रम का असर न सिर्फ अमेरिका और ईरान पर, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक स्तर पर महसूस होगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीति और समझौता सबसे सुरक्षित रास्ता होगा, लेकिन सैन्य ताकत की बढ़ी हुई तैनाती से ईरान पर दबाव भी बढ़ सकता है. इस समय पूरे विश्व की निगाहें इस तनावपूर्ण स्थिति पर हैं और आने वाले हफ्तों में कोई भी कदम क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है.

वर्ल्‍ड न्‍यूजडोनाल्ड ट्रंप
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