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Iran-Israel War : अमेरिका, ईरान और इजराइल युद्ध से भारत को क्या लेना चाहिए सबक?

अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव से वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. इस संघर्ष से भारत को रक्षा रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन के कई अहम सबक मिलते हैं.

US Iran Israel war lessons for India
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( Image Source:  Sora AI )

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की स्थिति ने दुनिया की रणनीतिक सोच को फिर से झकझोर दिया है. एक तरफ ईरान है, जिसकी सैन्य रणनीति असीमित युद्ध और मिसाइल नेटवर्क पर आधारित है, तो दूसरी ओर इजरायल और अमेरिका जैसी तकनीकी रूप से बेहद शक्तिशाली सेनाएं हैं. आज दोनों गुट के बीच युद्ध का छठा दिन है. इन शक्तियों के बीच बड़ा सैन्य संघर्ष होता है, तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा. ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम से भारत को क्या रणनीतिक और आर्थिक सबक लेना चाहिए.

1. लॉन्ग वार रणनीति की बढ़ती अहमियत

आधुनिक युद्ध अब केवल पारंपरिक टैंक, विमान और बड़े सैन्य अड्डों तक सीमित नहीं रह गया है. ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति को छोटे-छोटे नेटवर्क, मोबाइल मिसाइल सिस्टम और छिपे हुए ठिकानों पर आधारित किया है. इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य के युद्धों में “असममित युद्ध” यानी ऐसी रणनीति, जिसमें कमजोर पक्ष भी मजबूत दुश्मन को लंबे समय तक चुनौती दे सके, बेहद अहम होती जा रही है. भारत को भी अपनी सैन्य रणनीति में ऐसी लचीली और बहुस्तरीय संरचना पर ध्यान देना होगा.

2. मिसाइल और ड्रोन तकनीक में निवेश जरूरी

ईरान ने कम संसाधनों के बावजूद मिसाइल और ड्रोन तकनीक में काफी निवेश किया है. इन हथियारों ने युद्ध की प्रकृति को बदल दिया है क्योंकि कम लागत में भी बड़े नुकसान पहुंचाए जा सकते हैं. भारत पहले से ही मिसाइल तकनीक में मजबूत है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए स्वदेशी ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम और लंबी दूरी की सटीक मिसाइलों पर निवेश और बढ़ाना होगा.

3. ऊर्जा सुरक्षा का महत्व

मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला क्षेत्र है और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है. अगर अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच युद्ध होता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा. इसलिए भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने और वैकल्पिक ऊर्जा पर तेजी से काम करने की जरूरत है.

4. कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की नीति

भारत की विदेश नीति लंबे समय से “रणनीतिक संतुलन” पर आधारित रही है. भारत के अच्छे संबंध ईरान, इजरायल और अमेरिका के साथ हैं. ऐसे में किसी बड़े संघर्ष के दौरान भारत को बेहद सावधानी से कूटनीतिक कदम उठाने होंगे ताकि उसके हित प्रभावित न हों. यह स्थिति दिखाती है कि बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलित विदेश नीति कितनी महत्वपूर्ण होती है.

5. साइबर और सूचना युद्ध के खतरे

आज के युद्ध केवल मैदान में नहीं लड़े जाते, बल्कि साइबर स्पेस और सूचना के क्षेत्र में भी बड़ी लड़ाई होती है. ईरान, इजरायल और अमेरिका साइबर क्षमताओं में मजबूत माने जाते हैं. साइबर हमले बिजली, बैंकिंग, संचार और रक्षा तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए भारत को साइबर सुरक्षा और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की रक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बनाना होगा.

6. रक्षा आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

किसी भी बड़े युद्ध के दौरान हथियारों और तकनीक की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसलिए भारत के लिए “आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन” बेहद महत्वपूर्ण है. स्वदेशी हथियार, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और रक्षा तकनीक विकसित करना केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी जरूरी है. इससे आपात स्थिति में सेना को बाहरी निर्भरता से बचाया जा सकता है.

7. समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की रक्षा

मध्य पूर्व के पास स्थित महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य, वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है. यदि इस क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है तो समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी नौसेना की ताकत बढ़ाए और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करे.

अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच संभावित संघर्ष केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक चुनौती है. इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध बहुआयामी हो चुके हैं, जहां सैन्य ताकत के साथ तकनीक, साइबर क्षमता, कूटनीति और आर्थिक मजबूती भी बराबर महत्व रखती है. भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि बदलते वैश्विक माहौल में उसे अपनी सैन्य तैयारी, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और तकनीकी क्षमता को लगातार मजबूत करना होगा. तभी वह भविष्य की किसी भी वैश्विक संकट की स्थिति में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकेगा.

"ईरान की सुपरपावर को चुनौती चौंकाने वाली" - योगेंद्र नारायण

ईरान इजरायल युद्ध से हमारी सरकार क्या सीख ले, के जवाब में देश के पूर्व रक्षा सचिव योगेंद्र नारायण का कहना है कि सबसे भी सीख तो यह है कि सरकार ये कोशिश करे भारत को ज्यादा से ज्यादा मजबूत करे. केवल रक्षा साजो समान के मामले में नहीं, बल्कि हर मामले हैं. देश केा आर्थिक विकास, कारोबार, नई नई खोज, तकनीकी, एआई, स्पेश साइंस, सहित हर क्षेत्र में आत्म निर्भर बनने की जरूरत है. ये आत्मनिर्भरता स्थानी होनी चाहिए ना कि तात्कालिक.

उन्होंने ईरान की सरकार और वहां की सेना की हौसला आफजाई करते हुए कहा, 'ईरान दिलेरी से युद्ध लड़ रहा है. उसे पता है कि इजरायल और अमेरिका के पास जितनी मिसाइलें, वो उनके पास भी है. मिसाइलों और ड्रोन के स्तर पर ईरान ने सुपर पावर को मुंहतोड़ जवाब देकर, अपनी अलग पहचान बनाई है. हार-जीत अलग बात है, लेकिन ईरान ने सुपरपावर से लड़ने का माद्दा दिखाया है. भारत सरकार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हालिस करे. इसमें डीआरडीओ की मदद ले.'

"सस्ते हथियारों पर जोर दे भारत" - अलूने

विदेश मामलों के जानकार ब्रह्दीप अलूने का कहना है कि वैश्विक मंच पर भारत जिस स्थिति में अभी है, उसमें उसे अपनी फॉरेन पॉलिसी को संतुलित रखने की जरूरत है. ऐसा इसलिए कि ईरान इजरायल युद्ध लंबे समय के लिए आगे बढ़ता है तो केवल पेट्रोलियम पदार्थ और गैस के लिए ही नहीं, बल्कि हवाई यात्रा का खर्चा भी लोगों का बढ़ेगा. आपको दुबई के बदले रूसे होकर जाना होगा. अगर यूरोपीय देशों की ही बात करें तो अभी आप वहां के देश में सिंगापुर या फिर दुबई होते हुए जाते हैं. युद्ध की स्थिति में आप दुबई से होकर नहीं जा सकते. तेल कहीं और से आयात कर भी लेंगे तो आपके जहाज को लंबी दूरी तय कर आगे आना होगा. अगर आप रूस से तेल आयात करेंगे तो अमेरिका बुरा लगेगा.

यानी देश की आर्थिक विकास को प्रभावित होने से रोकने के लिए विदेश नीति संतुलित होना जरूरी है. इस मामले में सरकार को नियंत्रण और संतुलन की नीति पर चलने की जरूरत है. अगर इजरायल के साथ रहना तो कम से कम इस स्थिति को बनाए रखना होगा कि ईरान व अन्य मिडिल ईस्ट के देशों को यह न लगे कि उनकी पूरी तरह से उपेक्षा हो रही है. ऐसे में तटस्थ नीति बेहतर विकल्प है.

उन्होंने कहा, 'दक्षिणपंथी पार्टी नेता के लिए मध्यमार्ग पर चलना मुश्किल होता है. तालमेल नहीं रहा तो बीजेपी से शिया वोट भी देश के अंदर दूर हो सकता है. उसे डिप्लेमैटिक ही नहीं, आंतरिक मोर्चे पर राजनीतिक दांव भी संभलकर खेलने होंगे. भारत में तीन से करोड़ से ज्यादा शिया मुसलमान रहते हैं. भातर को लॉन्ग रेंज की मिसाइल और ड्रोन तकनीक पर तेजी से काम करने की जरूरत है. ईरान से सीखने की जरूरत यह है कि वो कम पैसे वाला हथियार तैयार करे. ताकि चीन, पाकिस्तान और तुर्की को सबक सिखाना संभव हो सके.'

"चीन-PAK के लिहाज से हो तैयारी" - राजेश भारती

इंटरनेशनल रिलेशंस के एक्सपर्ट राजेश भारती का कहना है, 'भारत को अर्थव्यवस्था के साइज के हिसाब से डिफेंस तैयारी रखने की जरूरत है. तीसरी दुनिया के देशों से संबंधों को मजबूत करने की भी आवश्यकता है. भारत की गुटनिरपेक्षता यानी तटस्थ रहने की नीति ऐसे वक्त में काम आती है. शीत युद्ध के दौर में भारत को नुकसान न होने की वजह यही थी. भारत अभी अमेरिका को आंख दिखाने की स्थिति में नहीं है. उसे आंख दिखाने में लिए 14 हजार किलोमीटर वाला मिसाइल तैयार करना होगा.'

भारत के अनुसार भारत के लिए बेहतरी इसी में है कि वो चीन और पाकिस्तान की मद्देनजर अपनी रक्षा तैयारियों को धार दे. भारत को अमेरिका से मुकाबला करने की जरूरत नहीं है. तटस्थता की नीति त्यागने से आज अमेरिका के साथ अब रूस भी आंख दिखाने लगा है. वर्तमान में देश की विदेश नीति बहुत नाजुक स्थिति में है.

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