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ट्रंप, बाइडेन, ओबामा... सब आए-गए, लेकिन नेतन्याहू नहीं बदले, आखिर वो किसके वश में!

ओबामा, ट्रंप और बाइडेन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दौर में भी नेतन्याहू अपनी लाइन पर कायम रहे. आखिर इजरायली प्रधानमंत्री किसके प्रभाव में फैसले लेते हैं?

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( Image Source:  ChatGpt )

मिडिल ईस्ट वॉर को लेकर अमेरिका समझौता कर ले, संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पास कर दे, यूरोप अपीलें करता रहे और अरब देश शांति की दुहाई दें, लेकिन अगर बेंजामिन नेतन्याहू राजी नहीं हैं तो मिडिल ईस्ट में शांति की गारंटी कोई नहीं दे सकता. यह बात आज की नहीं है. नेतन्याहू हमेशा से यही करते आए हैं. उन्होंने ओबामा से लेकर बाइडेन व ट्रंप तक के दौर में अपनी बात पर अड़े रहते हैं. इसलिए, सवाल यह नहीं है कि नेतन्याहू किसके वश में हैं. असली सवाल यह है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका भी नेतन्याहू को अपनी बात मनवा पाती है? इतिहास का जवाब है- बहुत कम. ऐसे में अहम सवाल यह है कि नेतन्याहू किसके वश में? ऐसे समझें पूरी बात.

जब ओबामा को ही चुनौती दे दी

साल 2015 की बात है. उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा थे. उस समय भी अमेरिका और ईरान के बीच हुए परमाणु समझौते (JCPOA) का नेतन्याहू ने खुलकर विरोध किया था. इतना ही नहीं, उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में जाकर तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की नीति के खिलाफ भाषण दिया. अमेरिकी इतिहास में यह बेहद असामान्य घटना मानी गई. इससे साबित होता है कि नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपति की लाइन पर चलने वाले नेता नहीं हैं.

जब बाइडेन की सलाह भी नहीं मानी

7 अक्टूबर 2023 के बाद शुरू हुए गाजा युद्ध के दौरान अमेरिका ने इजरायल का खुलकर समर्थन किया. लेकिन जैसे-जैसे नागरिक हताहत बढ़े, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कई बार सार्वजनिक रूप से संयम बरतने और राफा में बड़े सैन्य अभियान से बचने की सलाह दी. इसके बावजूद मई 2024 में इजरायली सेना ने राफा ऑपरेशन शुरू किया. इससे साफ हुआ कि नेतन्याहू जरूरत पड़ने पर अपने सबसे बड़े सहयोगी की सलाह भी नजरअंदाज कर सकते हैं.

नेतन्याहू को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव भी नहीं रोक पाए

गाजा युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में कई प्रस्ताव पारित हुए, जिनमें युद्धविराम की मांग की गई. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने भी मानवीय सहायता बढ़ाने और कार्रवाई में सावधानी बरतने की बात कही. लेकिन इजरायल ने अपनी सैन्य रणनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया. यह दर्शाता है कि नेतन्याहू अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकने के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं.

असली दबाव अमेरिका नहीं, घरेलू राजनीति है

नेतन्याहू की सरकार दक्षिणपंथी दलों के समर्थन पर टिकी है. उनके गठबंधन में ऐसे नेता शामिल हैं जो गाजा और वेस्ट बैंक पर और अधिक आक्रामक नीति चाहते हैं. यदि नेतन्याहू अचानक नरम रुख अपनाते हैं, तो उनकी सरकार गिर सकती है. इसलिए कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू पर सबसे बड़ा प्रभाव किसी विदेशी नेता का नहीं, बल्कि इजरायल की गठबंधन राजनीति का है, और वो उसी के वश में हैं.

युद्ध उनके लिए सिर्फ सुरक्षा नहीं, अस्तित्व का सवाल भी

नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार से जुड़े कई मुकदमे चल रहे हैं. 2023 में न्यायपालिका सुधार को लेकर देशभर में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे. 7 अक्टूबर के हमले के बाद सुरक्षा चूक को लेकर भी उनकी आलोचना हुई. ऐसे माहौल में युद्ध ने राजनीतिक बहस का केंद्र बदल दिया. आलोचक मानते हैं कि लंबा संघर्ष नेतन्याहू को राजनीतिक रूप से समय देता है, जबकि समर्थक इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत बताते हैं.

ट्रंप भी हमेशा उनकी नहीं मनवा पाए

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump को नेतन्याहू का करीबी माना जाता है. लेकिन 2020 में जब ट्रंप प्रशासन ने कुछ क्षेत्रीय समझौतों और राजनीतिक व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की, तब भी नेतन्याहू ने कई मुद्दों पर अपने घरेलू राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी. इससे यह धारणा मजबूत होती है कि वे रिश्तों से ज्यादा अपनी राजनीतिक जरूरतों को महत्व देते हैं.

नेतन्याहू किसी के वश में नहीं, हालात के कैदी जरूर

नेतन्याहू का राजनीतिक रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने ओबामा, बाइडेन, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देशों के दबाव को कई बार नजरअंदाज किया है. इसलिए यह कहना मुश्किल है कि वे अमेरिका, ट्रंप या किसी अन्य नेता के वश में हैं. हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि वे अपनी राजनीतिक विरासत, गठबंधन की मजबूरियों और सुरक्षा की उस सोच के कैदी हैं, जिसे उन्होंने खुद दशकों में गढ़ा है. इसलिए मिडिल ईस्ट में शांति का सवाल आज ईरान या अमेरिका से ज्यादा नेतन्याहू की राजनीतिक गणित से जुड़ा हुआ दिखाई देता है.

नेतन्याहू की नाराजगी की वजह क्या है?

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान को अपने देश के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा बताते रहे हैं. उनका राजनीतिक और रणनीतिक तर्क हमेशा यह रहा है कि ईरान को किसी भी तरह की राहत देना भविष्य में इजरायल के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति को स्वीकार करना उनके लिए केवल कूटनीतिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक जोखिम भी है. यदि वे इस समझौते का समर्थन करते हैं तो उनकी वर्षों पुरानी राजनीतिक लाइन कमजोर पड़ सकती है.

सत्ता बचाने की मजबूरी कितनी बड़ी है?

नेतन्याहू की सरकार ऐसे दलों के समर्थन पर टिकी हुई है जो ईरान के खिलाफ बेहद सख्त रुख रखते हैं. गठबंधन में शामिल दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी पार्टियां किसी भी तरह की नरमी को इजरायल की सुरक्षा के साथ समझौता मानती हैं. ऐसे में यदि प्रधानमंत्री अमेरिकी पहल के साथ खड़े होते हैं तो उनके सहयोगी दलों की नाराजगी सरकार के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर सकती है. इसलिए नेतन्याहू के लिए यह केवल विदेश नीति का नहीं, बल्कि सत्ता बचाने का भी सवाल है.

युद्ध खत्म होने से क्यों बढ़ सकती हैं नेतन्याहू की मुश्किलें?

युद्ध की स्थिति अक्सर सरकारों को राजनीतिक राहत देती है. राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा विपक्षी हमलों को सीमित कर देता है और जनता का ध्यान भी अन्य विवादों से हट जाता है. नेतन्याहू पहले से ही कई राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं. ऐसे में युद्ध समाप्त होने के बाद घरेलू राजनीति फिर से उनके लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. यही कारण है कि कुछ विश्लेषक मानते हैं कि वर्तमान तनाव उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह नहीं है.

अमेरिका और इजरायल के हितों में अंतर क्यों दिख रहा है?

अमेरिका की प्राथमिकता फिलहाल क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना है. होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से वैश्विक बाजार को राहत मिली है और वाशिंगटन नहीं चाहता कि हालात दोबारा बिगड़ें. दूसरी ओर इजरायल की चिंता सुरक्षा और ईरान की सैन्य क्षमताओं को लेकर है. यही वजह है कि दोनों सहयोगी देशों के लक्ष्य इस समय पूरी तरह एक जैसे दिखाई नहीं दे रहे.

क्या युद्धविराम के बावजूद टला नहीं है खतरा?

अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति तब तक पूरी तरह सफल नहीं मानी जा सकती, जब तक क्षेत्र के अन्य प्रमुख खिलाड़ी भी उसे स्वीकार न करें. यदि इजरायल समझौते के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखता है या ईरान समर्थित समूहों के खिलाफ नए सैन्य अभियान शुरू करता है, तो तनाव फिर बढ़ सकता है. यही वजह है कि युद्धविराम के बावजूद मिडिल ईस्ट में अनिश्चितता बनी हुई है.

अगले 60 दिन क्यों होंगे निर्णायक?

समझौते के तहत अगले 60 दिनों में कई संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत होनी है. यदि इन वार्ताओं में प्रगति होती है और इजरायल भी किसी साझा ढांचे पर सहमत होता है, तो क्षेत्र में स्थायी शांति की संभावना बन सकती है. लेकिन अगर मतभेद बढ़ते हैं तो मौजूदा युद्धविराम केवल एक अस्थायी विराम साबित हो सकता है.

शांति की चाबी अब तेल अवीव के पास?

मिडिल ईस्ट की राजनीति में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा कि अमेरिका और इजरायल के दृष्टिकोण में अंतर दिखाई दे रहा हो. लेकिन मौजूदा संकट में यह अंतर निर्णायक साबित हो सकता है. अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर लौट चुके हैं, मगर असली सवाल यह है कि क्या नेतन्याहू भी उसी रास्ते पर चलेंगे. जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक मिडिल ईस्ट में शांति की घोषणा अधूरी ही मानी जाएगी.

ईरान इजरायल युद्धडोनाल्ड ट्रंप
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