आजादी के लिए लड़े पिता, फिर एक साथ ऐसे खत्म कर दिया था पूरा परिवार, बहन के साथ दिल्ली में ली थी शरण, कहानी Sheikh Hasina और उनके परिवार की
शेख हसीना ने अब फिर से बांग्लादेश लौटने का फैसला किया है. बांग्लादेश की आजादी में उनके परिवार खासकर पिता शेख मुजीब उर रहमान का अहम योगदान रहा है लेकिन उनके परिवार का अंत बेहद दुखद था.
Sheikh Hasina
बांग्लादेश के इतिहास में शेख हसीना के परिवार का अहम योगदान रहा है खासकर उनके पिता शेख मुजीब उर रहमान ने जिस तरह से स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्र निर्माण और लोकतांत्रिक संघर्ष में जो भूमिका निभाई थी उसको आज भी याद किया जाता है. लेकिन शेख हसीने के परिवार उनके पिता का अंत बेहद ही दर्दनाक था. उनके पिता को प्यार से ‘बंगबंधु’ यानी बंगाल का मित्र कहा जाता था. 1947 में भारत के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान एक ही देश का हिस्सा बने, लेकिन दोनों क्षेत्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भेदभाव लगातार बढ़ता गया.
पाकिस्तान सरकार ने बंगाली बहुल पूर्वी पाकिस्तान पर उर्दू को जबरन थोपने की कोशिश की. इसी विरोध में शेख मुजीब उर रहमान ने युवाओं को संगठित किया और ‘ऑल ईस्ट पाकिस्तान मुस्लिम स्टूडेंट्स लीग’ की स्थापना की. बंगाली भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग को लेकर हुए आंदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया. यही संघर्ष आगे चलकर पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के अधिकारों की बड़ी लड़ाई में बदल गया.
कैसे बने थे पूर्वी पाकिस्तान के सबसे बड़े नेता?
साल 1966 में शेख मुजीब उर रहमान ने लाहौर में ऐतिहासिक ‘6-सूत्रीय फार्मूला’ पेश किया. इसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान को अधिक राजनीतिक और आर्थिक स्वायत्तता देना था. इसमें स्थानीय प्रशासन, अलग मुद्रा व्यवस्था, व्यापारिक अधिकार और कर वसूलने की स्वतंत्रता जैसी प्रमुख मांगें शामिल थीं. इस आंदोलन ने शेख मुजीब को पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली समाज का सबसे बड़ा नेता बना दिया. इसी दौर में उन्हें सम्मान के साथ ‘बंगबंधु’ की उपाधि मिली.
क्यों चला था देशद्रोह का मुकदमा?
शेख मुजीब की बढ़ती लोकप्रियता से घबराए पाकिस्तानी सैन्य शासक अयूब खान ने उनके खिलाफ ‘अगरतला साजिश केस’ के तहत देशद्रोह का मुकदमा चलाया. हालांकि, यह कार्रवाई भी उनकी लोकप्रियता को रोक नहीं सकी. वे पूर्वी पाकिस्तान में जनता की आवाज बन चुके थे. दिसंबर 1970 में पाकिस्तान में हुए पहले आम चुनाव में शेख मुजीब की पार्टी अवामी लीग ने जबरदस्त जीत दर्ज की. अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटों पर जीत हासिल की और पूरे पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया. लेकिन सत्ता देने के बजाय पाकिस्तानी सेना ने 25 मार्च 1971 की रात ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू कर दिया. जिसके तहक शेख मुजीब उर रहमान को पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार कर लिया था.
कैसे की थी आजादी की घोषणा?
25 मार्च की आधी रात के बाद, यानी तकनीकी रूप से 26 मार्च 1971 की सुबह, पाकिस्तानी सेना द्वारा गिरफ्तार किए जाने से ठीक पहले शेख मुजीब उर रहमान ने वायरलेस संदेश के जरिए बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की. इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध हुआ. 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और दुनिया के नक्शे पर स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ.
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान को शेख मुजीब को जेल से रिहा करना पड़ा. 10 जनवरी 1972 को वे लंदन और नई दिल्ली होते हुए ढाका पहुंचे, जहां उनका ऐतिहासिक स्वागत हुआ. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला.
कैसे खत्म हुआ था पूरा परिवार?
15 अगस्त 1975 की सुबह बांग्लादेश के इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में से एक हुई. ढाका के धनमंडी स्थित शेख मुजीब उर रहमान के घर पर सेना के विद्रोही अधिकारियों ने हमला कर दिया. इस हमले में शेख मुजीब, उनकी पत्नी फजिलातुन्नेसा, उनके तीन बेटे कमल, जमाल और 10 वर्षीय शेख रसेल दोनों बहुओं समेत परिवार के 18 सदस्यों की हत्या कर दी गई.
कैसे बचीं शेख हसीना और उनकी बहन?
शेख मुजीब की दो बेटियां शेख हसीना और शेख रेहाना इस हत्याकांड में इसलिए बच गईं क्योंकि वे उस समय बांग्लादेश में मौजूद नहीं थीं. 30 जुलाई 1975 को शेख हसीना अपने पति परमाणु वैज्ञानिक डॉ. एम. ए. वाजिद मियां के पास पश्चिमी जर्मनी जा रही थीं. एयरपोर्ट पर उन्हें विदा करने के लिए उनके माता-पिता और भाई-बहन पहुंचे थे. शेख हसीना को नहीं पता था कि यह उनके परिवार के साथ उनकी आखिरी मुलाकात होगी. जब जर्मनी में 28 वर्षीय हसीना को परिवार की हत्या की खबर मिली, तो उनकी दुनिया पूरी तरह बदल गई. वे और उनकी बहन रेहाना रातों-रात परिवारविहीन और बेघर हो गईं.
कब भारत ने दी थी शरण?
उस कठिन समय में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शेख हसीना और शेख रेहाना को सुरक्षा और आश्रय देने का फैसला किया. 24 अगस्त 1975 को शेख हसीना अपने पति, बच्चों और बहन रेहाना के साथ दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पहुंचीं. सुरक्षा कारणों से उन्हें सीधे भारतीय खुफिया एजेंसी RAW के सेफ हाउस में ले जाया गया. शुरुआती समय लाजपत नगर में बिताने के बाद परिवार को लुटियंस दिल्ली के पंडारा रोड स्थित सरकारी आवास में रखा गया. सुरक्षा कारणों से उन्होंने अपनी पहचान बदलकर बेहद गोपनीय तरीके से जीवन बिताया.
कैसे शेख हसीना की हुई थी राजनीति में वापसी?
1981 में जब शेख हसीना भारत में ही थीं, तब उन्हें उनके पिता की पार्टी अवामी लीग का अध्यक्ष चुना गया. करीब छह साल के देश से बाहर रहने के बाद 17 मई 1981 को शेख हसीना बांग्लादेश लौटीं. उन्होंने सैन्य शासन के खिलाफ लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू किया और आगे चलकर कई बार देश की प्रधानमंत्री बनीं. इतिहास की विडंबना यह रही कि जिस भारत ने 1975 में शेख हसीना और उनके परिवार को सुरक्षा दी थी, लगभग 49 साल बाद 2024 में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद उन्हें फिर भारत आना पड़ा.




