Begin typing your search...

Iran War: बिन खाड़ी सब सूना! मिडिल ईस्ट संकट से हिली दुनिया की सप्लाई चेन, तेल से लेकर प्लास्टिक तक, किन इंडस्ट्रीज़ पर पड़ा प्रभाव

मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर दिखने लगा है. कच्चे तेल से लेकर प्लास्टिक, एल्युमिनियम और मोबाइल फोन निर्यात तक कई सेक्टर्स इस जंग की वजह से दबाव में आ गए हैं.

Iran War: बिन खाड़ी सब सूना! मिडिल ईस्ट संकट से हिली दुनिया की सप्लाई चेन, तेल से लेकर प्लास्टिक तक, किन इंडस्ट्रीज़ पर पड़ा प्रभाव
X
( Image Source:  X-@ANI )
समी सिद्दीकी
Edited By: समी सिद्दीकी8 Mins Read

Updated on: 14 March 2026 9:31 AM IST

Middle East War Effects: ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते युद्ध ने दुनिया की सप्लाई चेन को गहरा झटका दिया है. इस संघर्ष का असर केवल कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उससे बनने वाले कई अहम उत्पादों की आपूर्ति भी प्रभावित हो गई है. पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उद्योग, एल्युमिनियम स्मेल्टर्स, प्लास्टिक निर्माता, ऑलेफिन क्रैकर्स और स्टाइरीन उत्पादक कई देशों में सप्लाई बाधित होने की स्थिति का सामना कर रहे हैं.

पिछले 15 दिनों के दौरान कई देशों में कुल 13 बार अप्रत्याशित आपदा यानी फोर्स मेज्योर की घोषणा की जा चुकी है. फोर्स मेज्योर वह स्थिति होती है जब कंपनियां किसी असाधारण परिस्थिति के कारण तय समय पर आपूर्ति करने में असमर्थ हो जाती हैं. इस स्थिति ने वैश्विक स्तर पर उद्योगों की पूरी श्रृंखला को प्रभावित कर दिया है.

मिडिल ईस्ट वॉर का किन-किन सेक्टर्स पर पड़ रहा है असर?

ऊर्जा कंपनियों के स्तर पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है. QatarEnergy ने एलएनजी पर फोर्स मेज्योर घोषित कर दी है, जिससे दुनिया की कुल गैस सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है. इसी तरह Saudi Aramco ने अपने दो तेल क्षेत्रों में उत्पादन कम कर दिया और Ras Tanura Refinery को बंद कर दिया. Kuwait Petroleum Corporation ने कच्चे तेल की बिक्री पर फोर्स मेज्योर लागू किया है.

इसी क्रम में Bapco ने अपनी एकमात्र रिफाइनरी की आपूर्ति रोक दी, जबकि Aluminium Bahrain ने अपने बड़े स्मेल्टर से शिपमेंट रोक दिया है.

स्वतंत्र विश्लेषक Shanaka Anselm Perera ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस संकट के प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण किया है. उनके अनुसार कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से उससे जुड़ी कई इंडस्ट्रीज़ पर सीधा असर पड़ा है.

ऊर्जा कंपनियों के ऐलान का असर दूसरी कंपनियों पर कैसे पड़ा?

ऊर्जा कंपनियों की इन घोषणाओं का असर तुरंत आगे की इंडस्ट्रीज पर भी पड़ा. सिंगापुर की कंपनी PCS Singapore ने 5 मार्च को अपने ऑलेफिन क्रैकिंग प्लांट के लिए फोर्स मेज्योर घोषित किया, क्योंकि उसे जरूरी फीडस्टॉक नहीं मिल पा रहा था. इसके बाद TPC Singapore ने भी यही घोषणा की.

दक्षिण कोरिया की Yeochun NCC, ताइवान की Formosa Petrochemical, इंडोनेशिया की Chandra Asri और TPIA, थाईलैंड की SCC Rayong Olefins और कुवैत की TKSC जैसी कंपनियां भी इस संकट से प्रभावित हुई हैं.

पैकेजिंग कंपनियां और उससे जुड़े सैक्टर्स कैसे हुईं प्रभावित?

दरअसल हर फोर्स मेज्योर की घोषणा आगे की इंडस्ट्री को प्रभावित करती है. जब ऑलेफिन क्रैकर को नाफ्था नहीं मिलता तो पॉलीएथिलीन प्लांट काम नहीं कर पाता. पॉलीएथिलीन प्लांट बंद होने पर पैकेजिंग बनाने वाली कंपनियां प्रभावित होती हैं.

जब पैकेजिंग निर्माता काम नहीं कर पाते तो फूड कंपनियों तक सप्लाई प्रभावित होती है और कीमतें बढ़ने लगती हैं. अंत में इसका असर सीधे सुपरमार्केट तक पहुंचता है.

कीमतों में बढ़ोतरी

इस संकट का असर कच्चे माल की कीमतों पर भी दिखने लगा है. एशिया में पॉलीप्रोपलीन की कीमतें बढ़ा दी गई हैं या कई जगहों पर इन्हें अस्थायी रूप से रोक दिया गया है. स्पॉट प्रीमियम 50 से 100 डॉलर प्रति टन तक बढ़ गए हैं.

रोज़मर्रा की जिंदगी पर कैसे असर डाल रही है ये जंग?

यूरोप में पॉलीएथिलीन और पॉलीप्रोपलीन के कॉन्ट्रैक्ट 60 से 200 यूरो प्रति टन तक महंगे हो गए हैं. इन प्लास्टिक उत्पादों का इस्तेमाल मेडिकल उपकरणों, फूड पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, निर्माण सामग्री, पाइप और इलेक्ट्रिकल इंसुलेशन में किया जाता है. इसका मतलब है कि इनकी कीमत बढ़ने का असर रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली कई चीजों पर पड़ेगा.

बीमा और लॉजिस्टिक्स पर कैसे पड़ रहा है असर?

इस पूरे संकट की जड़ में केवल तेल की आपूर्ति नहीं बल्कि बीमा और लॉजिस्टिक्स की समस्या भी है. सात P&I क्लबों ने 5 मार्च को वॉर रिस्क कवरेज रद्द कर दी. इसके बाद तेल और नाफ्था ले जाने वाले टैंकरों का संचालन व्यावसायिक रूप से मुश्किल हो गया.

खाड़ी इलाके से एशिया की ओर नाफ्था ले जाने वाले टैंकर रुक गए. जब टैंकर नहीं पहुंचे तो ऑलेफिन क्रैकर्स को फीडस्टॉक नहीं मिला और वे बंद होने लगे. इसके बाद पॉलीएथिलीन प्लांट भी बंद होने लगे.

इसका मतलब यह है कि पूरी सप्लाई चेन केवल रिफाइनरी या तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करती. भले ही ब्रेंट क्रूड की कीमत 94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हो, लेकिन पहले बंद हुए प्लांट तभी दोबारा शुरू होंगे जब टैंकरों को बीमा मिल सके और नाफ्था समय पर पहुंच सके. विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई चेन को सामान्य स्थिति में लौटने में 12 से 24 महीने तक का समय लग सकता है.

यह संघर्ष केवल एक समुद्री मार्ग या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. इसका असर दुनिया के बड़े हिस्से के मैन्युफैक्चरिंग बेस पर पड़ रहा है. खाड़ी इलाके का तेल पहले नाफ्था में बदलता है. नाफ्था से प्लास्टिक बनती है और वही प्लास्टिक रोजमर्रा की हजारों चीजों में इस्तेमाल होती है. इस तरह एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट पूरी वैश्विक औद्योगिक श्रृंखला को प्रभावित कर देता है. सात देशों में 13 फोर्स मेज्योर घोषणाएं, बीमा प्रणाली में आई रुकावट और लगातार फैलता यह औद्योगिक असर दिखाता है कि यह संकट केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा है.

फोन निर्यात पर कैसे है बड़ा संकट?

  • इस जंग का असर फोन निर्यात पर भी पड़ रहा है. देश में मोबाइल फोन निर्यात लगातार बढ़ रहा था और मौजूदा वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में इससे करीब 11 अरब डॉलर यानी लगभग 1,01,651 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल हुआ था. लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस तेजी पर असर पड़ने की आशंका बढ़ा दी है.
  • उद्योग से जुड़े कार्यकारी अधिकारियों, विश्लेषकों और ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि युद्ध के कारण खपत, आयात और माल ढुलाई प्रभावित हो सकती है. इसका सीधा असर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात पर पड़ सकता है. अनुमान है कि इस वजह से भारत को करीब 2 से 3 अरब डॉलर यानी लगभग 18,494 करोड़ से 27,723 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है.
  • इस संभावित नुकसान की एक बड़ी वजह यह है कि भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज कंपनियां बड़ी मात्रा में मोबाइल फोन खाड़ी क्षेत्र के देशों को निर्यात करती हैं. यह इलाका लंबे समय से व्यापार और उपभोग के लिहाज से एक महत्वपूर्ण बाजार माना जाता है.
  • विश्लेषकों ने भारत के मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2025 में खाड़ी और पश्चिम एशिया के देशों को मोबाइल फोन निर्यात बढ़कर 3.1 अरब डॉलर यानी लगभग 28,647.1 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. यह भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा है.
  • इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज यानी EMS कंपनियां मोबाइल फोन निर्माण पर काफी हद तक निर्भर हैं. ऐसे में पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर इन कंपनियों पर भी पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा तिमाही और अगली तिमाही में इन कंपनियों को कारोबारी दबाव और नुकसान का सामना करना पड़ सकता है.
ईरान इजरायल युद्धवर्ल्‍ड न्‍यूज
अगला लेख