Iran US Israel War: अमेरिका ने जिस पर रखा हाथ वो हो गया बर्बाद! क्या बारूद के ढेर पर इजरायल?
मिडिल ईस्ट में ईरान-इजरायल तनाव के बीच एक पुराना सवाल फिर उठ रहा है. क्या अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप से देश और अस्थिर हो जाते हैं? इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया के उदाहरण बताते हैं कि सत्ता परिवर्तन के बाद स्थिर राजनीतिक व्यवस्था बनाना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है.
मिडिल ईस्ट में ईरान ईरान, इजरायल, और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने एक पुरानी बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है. क्या जिस संघर्ष में अमेरिका उतरता है, वहां अंततः भारी तबाही होती है? यह दावा पूरी तरह से सार्वभौमिक सच नहीं है, लेकिन पिछले दो दशकों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के बाद संबंधित देशों में लंबे समय तक अस्थिरता, हिंसा और आर्थिक संकट देखने को मिला. ईराक, अफगानिस्तान, लिबिया और सीरिया जैसे देश अक्सर इस बहस के केंद्र में रहते हैं. इन मामलों में सत्ता परिवर्तन तो हुआ, लेकिन उसके बाद स्थिर राजनीतिक व्यवस्था बनाना बेहद कठिन साबित हुआ. इसी वजह से मौजूदा ईरान-इजरायल तनाव के बीच कई विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इतिहास से कोई सबक मिलता है या नहीं.
1. Iraq War 2003: सत्ता बदली, लेकिन अस्थिरता बढ़ गई
साल 2003 में अमेरिका ने जॉर्ज डब्लू बुश के नेतृत्व में ईराक पर हमला किया. उस समय अमेरिकी प्रशासन का दावा था कि सद्दाम हुसैन के पास “Weapons of Mass Destruction” यानी बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले हथियार हैं. अमेरिका के साथ ब्रिटेन समेत कई पश्चिमी देश भी इस अभियान में शामिल हुए. कुछ ही हफ्तों में सद्दाम हुसैन की सरकार गिर गई और बाथ पार्टी का शासन खत्म हो गया.
लेकिन युद्ध के बाद हालात तेजी से बिगड़ने लगे. इराक में सत्ता का खालीपन पैदा हुआ, जिससे सांप्रदायिक हिंसा और उग्रवाद को बढ़ावा मिला. इसी अस्थिर माहौल में बाद के वर्षों में इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन उभर कर सामने आए. लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए और हजारों नागरिकों की मौत हुई. देश का बुनियादी ढांचा (सड़कें, बिजली, तेल उद्योग) गंभीर रूप से प्रभावित हुआ. कई विश्लेषकों का मानना है कि इस युद्ध ने न केवल इराक को अस्थिर किया बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीतिक संतुलन को भी बदल दिया और क्षेत्र में ईरान का प्रभाव बढ़ गया.
2. Afghanistan War: 20 साल की जंग, फिर तालिबान की वापसी
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया. उस समय अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था और उस पर आरोप था कि उसने ओसमा बिन लादेन तथा Al-Qaeda को पनाह दी है. अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कुछ ही महीनों में तालिबान सरकार को सत्ता से हटा दिया और वहां एक नई लोकतांत्रिक सरकार स्थापित करने की कोशिश की.
हालांकि, इसके बाद भी युद्ध खत्म नहीं हुआ. अगले 20 साल तक अफगानिस्तान में विद्रोह, आतंकी हमले और राजनीतिक अस्थिरता जारी रही. अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए और हजारों सैनिक खोए, जबकि अफगानिस्तान में लाखों नागरिकों की जान गई और करोड़ों लोग विस्थापित हुए. 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ और 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी शुरू हो गई. जैसे ही विदेशी सेना हटी, तालिबान ने तेजी से कई प्रांतों पर कब्जा कर लिया और अगस्त 2021 में राजधानी Kabul पर नियंत्रण कर फिर से सत्ता में आ गया. इससे यह बहस और तेज हो गई कि दो दशक की सैन्य मौजूदगी के बावजूद स्थायी स्थिरता क्यों नहीं बन सकी.
3. Libya: गद्दाफी का अंत, लेकिन देश अराजकता में फंस गया
2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान लिबिया में सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हुआ. इस संघर्ष के दौरान अमेरिका और नाटो देशों ने विद्रोहियों का समर्थन किया और मुअम्मर गद्दाफी की सेना के खिलाफ हवाई हमले किए. इन हमलों ने गद्दाफी की सैन्य ताकत को कमजोर कर दिया और अंततः उनका शासन खत्म हो गया.
लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद लीबिया में स्थिर सरकार नहीं बन सकी. देश कई सशस्त्र मिलिशिया गुटों में बंट गया और लंबे समय तक गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी रही. तेल से समृद्ध होने के बावजूद अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई और कानून व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई. मानव तस्करी, हथियारों की तस्करी और अवैध माइग्रेशन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ीं. आलोचकों का कहना है कि गद्दाफी को हटाने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय लीबिया में स्थिर राजनीतिक ढांचा बनाने में सफल नहीं हो सका, जिसका खामियाजा वहां की जनता को भुगतना पड़ा.
4. Syria: बहु-पक्षीय युद्ध और मानवीय संकट में सीरिया
2011 में Syria में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए जो धीरे-धीरे गृहयुद्ध में बदल गए. इस संघर्ष में कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां शामिल हो गईं. अमेरिका ने कुछ विद्रोही गुटों को समर्थन दिया और Islamic State के खिलाफ अभियान चलाया, जबकि Bashar al‑Assad को रूस और ईरान का समर्थन मिला.
लंबे युद्ध ने सीरिया को भारी नुकसान पहुंचाया. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग शरणार्थी बन गए. कई शहर जैसे अलेप्पो और रक्का भारी तबाही का शिकार हुए. हालांकि यह संघर्ष केवल अमेरिका की वजह से नहीं बल्कि कई देशों की भागीदारी के कारण जटिल बना, लेकिन यह उदाहरण दिखाता है कि जब बाहरी शक्तियां किसी आंतरिक संघर्ष में शामिल हो जाती हैं तो युद्ध अक्सर और लंबा तथा विनाशकारी हो जाता है.
5. क्यों उठता है सवाल “अमेरिका के साथ युद्ध में तबाही होती है?”
विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि अमेरिका अक्सर उन देशों में सैन्य हस्तक्षेप करता है जहां पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता, तानाशाही या गृहयुद्ध की स्थिति होती है. ऐसे माहौल में सत्ता परिवर्तन तो जल्दी हो जाता है, लेकिन उसके बाद स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाना बेहद कठिन होता है. इराक और अफगानिस्तान इसके प्रमुख उदाहरण हैं.
दूसरा कारण यह माना जाता है कि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप शासन को गिराने तक तो सफल हो सकता है, लेकिन नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना कहीं ज्यादा जटिल प्रक्रिया है. जब तक मजबूत संस्थाएं, स्थिर प्रशासन और सामाजिक सहमति नहीं बनती, तब तक संघर्ष खत्म नहीं होता. यही वजह है कि कई देशों में युद्ध खत्म होने के बाद भी अस्थिरता बनी रहती है.
6. तो क्या ईरान-इजरायल टकराव में भी इतिहास दोहराएगा?
फिलहाल Iran और Israel के बीच तनाव बढ़ रहा है और United States खुलकर इजरायल के साथ खड़ा दिखाई देता है. हालांकि मौजूदा हालात पहले के उदाहरणों से अलग भी हैं, क्योंकि इजरायल सैन्य, तकनीकी और आर्थिक रूप से क्षेत्र के सबसे मजबूत देशों में से एक है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगा कि इतिहास बिल्कुल उसी तरह दोहराया जाएगा.
फिर भी इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया के अनुभव यह जरूर दिखाते हैं कि जब किसी क्षेत्रीय संघर्ष में बड़ी शक्तियां सीधे शामिल हो जाती हैं, तो युद्ध का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता, पूरे क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है.




