35 लाख से ज्यादा सैनिक, 20000 एयरक्राफ्ट, परमाणु हथियार भी; BRICS के सामने कहां खड़ा है NATO?
NATO के पास 35 लाख से ज्यादा सैनिक, 20,000 एयरक्राफ्ट और परमाणु ताकत है. जानिए रूस, चीन और BRICS के सामने इसकी असली ताकत और कमजोरी.
दुनिया की सैन्य ताकत की बात हो और NATO का जिक्र न आए, ऐसा संभव नहीं हो सकता. ऐसा इसलिए कि NATO के पास करीब 35 लाख सैनिक (एक्टिव + रिजर्व), 20,000 से ज्यादा एयरक्राफ्ट और दुनिया के कुल रक्षा बजट का 50% से ज्यादा हिस्सा है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके तीन प्रमुख सदस्य, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस, परमाणु हथियारों से लैस हैं. NATO की असली ताकत सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि एडवांस टेक्नोलॉजी, इंटीग्रेटेड कमांड सिस्टम, सैटेलाइट, साइबर वारफेयर और stealth capability में छिपी है. यही वजह है कि इसे अब भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन माना जाता है.
किसमें, कितना दम?
NATO, अमेरिका, चीन और Russia की सैन्य ताकत को अगर एक साथ देखें, तो तस्वीर दिलचस्प बनती है. NATO के पास कुल मिलाकर लगभग 35 लाख सैनिक (active + reserve) हैं, जो इसे सबसे बड़ा सामूहिक सैन्य समूह बनाते हैं. अकेले अमेरिका के पास करीब 13 लाख active और 8 लाख reserve सैनिक हैं, जबकि चीन के पास लगभग 20 लाख active सैनिक हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी स्थायी सेना मानी जाती है. रूस के पास करीब 11 से 13 लाख active सैनिक और बड़ा reserve बल है. यानी संख्या में चीन आगे है, लेकिन combined strength में NATO और तकनीक के मामले में अमेरिका सबसे मजबूत माना जाता है.
अकेला रूस NATO को चुनौती दे सकता है?
Russia सैन्य दृष्टि से आज भी एक बड़ी ताकत है, खासकर परमाणु हथियारों के मामले में. उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा nuclear arsenal है, साथ ही hypersonic missiles और S-400 जैसे advanced missile systems भी हैं. लेकिन समस्या उसकी अर्थव्यवस्था और सीमित सहयोगियों की है. यूक्रेन युद्ध ने यह भी दिखाया कि वो पारंपरिक वॉर में रूस को लंबी लड़ाई में कठिनाई होती है. यही वजह है कि यूक्रेन के साथ रूस का युद्ध पिछले चार साल से ज्यादा समय से जारी है. यानी रूस अकेले NATO को पारंपरिक युद्ध में नहीं हरा सकता, लेकिन nuclear deterrence के कारण संतुलन बनाए रखता है.
क्या चीन NATO के लिए भविष्य का खतरा है?
China तेजी से उभरती हुई सैन्य शक्ति है. उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना, तेजी से बढ़ती नौसेना और मजबूत होती वायुसेना है. तकनीक के क्षेत्र में चीन तेजी से NATO के करीब पहुंच रहा है. खासकर hypersonic weapons, drones और cyber warfare में. हालांकि, NATO जैसा global alliance चीन के पास नहीं है, लेकिन Asia-Pacific क्षेत्र में वह अमेरिका और उसके सहयोगियों को कड़ी चुनौती देता है. अगर भविष्य में सीधा टकराव होता है, तो यह मुकाबला बेहद संतुलित और खतरनाक हो सकता है.
BRICS, NATO का सैन्य विकल्प बन सकता है?
BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य) को अक्सर NATO के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह तुलना पूरी तरह सही नहीं है. BRICS एक आर्थिक और रणनीतिक समूह है, कोई सैन्य गठबंधन नहीं. इसका कोई संयुक्त सैन्य कमांड या सेना नहीं है. इसलिए NATO बनाम BRICS की सीधी तुलना करना गलत होगा. BRICS का असर आर्थिक और geopolitical है, सैन्य नहीं.
क्या सिर्फ संख्या ही युद्ध तय करती है?
मॉडर्न वारफेयर सिर्फ सैनिकों और हथियारों की संख्या से नहीं जीते जाते. NATO की सबसे बड़ी ताकत उसकी global alliances, अमेरिका की military dominance और यूरोप-नॉर्थ अमेरिका का संयुक्त संसाधन है. वहीं उसकी कमजोरी internal politics और long war fatigue है, जैसा कि यूक्रेन युद्ध में दिखा. दूसरी ओर रूस के पास न्यूक्लियर पावर है. जबकि चीन के पास मैनपावर व इंडस्ट्रियल कैपेसिटी है. यानी असली खेल स्ट्रेटजी, ज्योगरफी और अलाएंस का है. सिर्फ नंबर्स का नहीं.
NATO और रूस आमने-सामने आए तो क्या होगा?
अगर NATO और रूस के बीच सीधा युद्ध होता है, तो ट्रेडिशनल वॉर में में NATO का पलड़ा भारी रहेगा क्योंकि उसके पास ज्यादा संसाधन, बेहतर तकनीक और मजबूत सहयोगी हैं. लेकिन जैसे ही न्यूक्लियर विपंस की बात आती है, स्थिति पूरी तरह बदल जाती है. “Mutually Assured Destruction” का सिद्धांत कहता है कि परमाणु युद्ध में कोई नहीं जीतता, दोनों पक्ष तबाह हो जाते हैं. यही कारण है कि सीधा युद्ध टालने की कोशिश की जाती है.
क्या NATO और चीन के बीच युद्ध संभव है?
अगर चीन और नाटो के बीच भविष्य में (या अमेरिका) के बीच टकराव होता है, तो Asia-Pacific क्षेत्र इसका केंद्र होगा. जैसे ताइवान या दक्षिण चीन सागर. चीन को भौगोलिक और मैनपावर का फायदा मिलेगा. जबकि NATO को नौसेना और हवाई वरीयता का लाभ के साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे सहयोगियों का समर्थन. छोटे समय के युद्ध में चीन मजबूत दिख सकता है, लेकिन लंबी लड़ाई में NATO को बढ़त मिल सकती है.
NATO देशों की बेरुखी से अमेरिका कमजोर हो रहा है?
अमेरिका की ताकत काफी हद तक उसके गठबंधनों, खासकर NATO पर टिकी है. लेकिन हाल के वर्षों में यूरोपीय देशों के साथ रक्षा खर्च पर मतभेद, यूक्रेन युद्ध में हिचकिचाहट और अमेरिका पर ज्यादा निर्भरता ने सवाल खड़े किए हैं. क्या इससे अमेरिका कमजोर हो रहा है? पूरी तरह नहीं. उसकी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी ताकत अब भी दुनिया में सबसे ज्यादा है. बावजूद इसके अगर NATO में एकजुटता कम होती है, तो अमेरिका की global leadership चुनौती में आ सकती है. यानी कमजोरी नहीं, लेकिन दबाव जरूर बढ़ रहा है.
रूस और चीन साथ आ जाएं तो क्या NATO टिक पाएगा?
हालांकि, यह एक काल्पनिक सवाल है, लेकिन महत्वपूर्ण मसला है. अगर रूस और चीन एक साथ आते हैं, तो NATO के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी. रूस की न्यूक्लियर और मिसाइल ताकत और चीन की मैनपावन और इंडस्ट्रियल क्षमता मिलकर बड़ा संतुलन बना सकती है. फिर भी NATO के global alliances और economic-technology superiority के कारण वह पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ेगा. लेकिन ऐसी स्थिति में पूरी दुनिया को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा.
NATO आज भी दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन है. लेकिन दुनिया अब unipolar नहीं मल्टीपोलर है. रूस न्यूक्लियर इक्वेलाइजर है, चीन राइजिंग चैलेंजर है. इन सबके बीच BRICS आर्थिक संतुलन बना रहा है. अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ, तो जीत किसी की नहीं होगी, सिर्फ नुकसान होगा.
NATO अब है कहां? ट्रंप के 'पागलपन' ने खत्म कर दिया - विजय वर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफेसर विजय वर्मा का कहना है, "जब युद्ध की बात हो तो अलाएंस का कोई मतलब नहीं होता. क्योंकि सभी संबंध पावर से तय होते हैं. कभी भी युद्ध और प्यार अपनी औकात के भरोसे करना चाहिए, न कि दूसरे भरोसे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब NATO पर वही बातें लागू होती हैं. NATO अब प्रभाव में है कहां."
प्रोफेसर विजय वर्मा के मुताबिक, "डोनाल्ड ट्रंप का दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से नैटो बकवास का सौदा है. अब अलाएंस है कहां? ट्रंप कभी कहता है ग्रीनलैंड हमारा है. कनाडा को यूएस को 51वां स्टेट बना लेता है. अब तो ग्रेट नेशन यानी अमेरिका को ही कोई साथ नहीं दे रहा.'
उन्होंने कहा कि सभी तरह के संबंध मतलब और ताकत से तय होते हैं. इंटरनेशनल लेवल पर कोई भी अलाएंस स्थायी नहीं होता. अलाएंस होता, तो अकेले नैटो सबको तबाह करने के लिए काफी है. ट्रंप के पागलपन ने सारे समीकरण खत्म कर दिए. पागलपन से चीजें नहीं चलतीं. इसे कोई पसंद नहीं करेगा. सही या गलत भी तो चीज होती है न. वैश्विक स्तर पर धीरे चीजें पलट रही हैं.
विजय वर्मा के अनुसार, जहां तक नैटो का रूस और चीन के संदर्भ में है तो वर्तमान में नैटो प्रभाव कम हो गया है. दोनों नैटो को अकेले टक्कर दे सकते हैं. यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस टक्कर दे ही रहा है. रूस यूक्रेन से नहीं, नैटो से चार साल से ज्यादा समय से युद्ध लड़ रहा है. "हां, रूस-चीन मिल जाएं, तो गेम बदल सकता है, लेकिन ऐसा होना भी संभव नहीं है."




