ट्रंप की नीति इंटरनेशनल लॉ की नजर में कितना सही, क्या अमेरिका किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष को गिरफ्तार कर सकता है?
Nicolas Maduro Arrest: वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अब अमेरिका के निशाने पर कौन है, इसकी चर्चा दुनिया भर में चरम पर है. इस बीच अहम सवाल यह उभरकर सामने आया है कि क्या अमेरिका किसी भी देश के राष्ट्रपति को उठा सकता है? जानें, अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है, अमेरिका की रणनीति और इस तरह की कार्रवाई से दुनिया पर क्या असर पड़ेगा.
Nicolas Maduro Arrest: जब अमेरिका की मर्जी चलती है, तो दुनिया की राजनीति हिल जाती है. अमेरिका ऐसा पहली बार नहीं किया है. 20वीं सदी के अंतिम दशक में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया था. कई अन्य देशों के प्रमुखों के साथ ही भी वो ऐसा कर चुका हे. अब सवाल ये है कि क्या अमेरिका की ‘अदालत’ अब किसी भी देश के राष्ट्रपति को सीधे पकड़ सकती है? क्या अंतरराष्ट्रीय कानून इसके खिलाफ है या सिर्फ नाम का खेल है? जानिए, डोनाल्ड ट्रंप ये सब क्यों कर रहे हैं? क्यों ट्रंप की नजर अब क्यूबा, मेक्सिको और कोलंबिया पर है?
दरअसल, अमेरिकी कानून में किसी को दुनिया के किसी भी कोने से गिरफ्तार करने (चाहे वो किसी देश को संवैधानिक प्रमुख ही क्यों न हो या फिर कोई अन्य अपराधी क्यों न हो) को लेकर सही गलत का फैसला वहां के सुप्रीम कोर्ट के दोनों मामले (Ker v. Illinois (1886) और Frisbie v. Collins (1952)) में दिए गए फैसले से तय होता है. दोनों की मामले एक ही सिद्धांत पर टिके हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून और extradition बहस में बार-बार जिक्र होता है. इसे आम भाषा में कहा जाता है, “किस तरह से आरोपी को कोर्ट के सामने लाया गया, उससे कोर्ट का अधिकार खत्म नहीं होता.”
1. Ker v. Illinois (1886) - 'किडनैप कर लाओ, फिर भी ट्रायल वैध'
इस मामले में Frederick Ker नाम का अमेरिकी नागरिक पेरू में था. एक अमेरिकी एजेंट ने उसे बिना extradition प्रक्रिया अपनाए जबरन पकड़कर अमेरिका ले आया. Ker ने दलील दी कि, “मुझे गैरकानूनी तरीके से लाया गया है, इसलिए अमेरिकी कोर्ट मुझे ट्रायल नहीं कर सकती.”
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अगर आरोपी कोर्ट के सामने मौजूद है, तो यह मायने नहीं रखता कि उसे वहां लाने का तरीका कानूनी था या नहीं. कोर्ट का अधिकार (jurisdiction) आरोपी की मौजूदगी से तय होता है, न कि गिरफ्तारी के तरीके से. अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं, ये ट्रायल रोकने का आधार नहीं है.
2. Frisbie v. Collins (1952) - 'घरेलू अपहरण पर भी वही नियम'
Collins को एक राज्य से दूसरे राज्य में जबरन उठा कर लाया गया. उसने सुप्रीम कोर्ट से कहा, “मुझे गैरकानूनी तरीके से पकड़ा गया, इसलिए कोर्ट का ट्रायल अवैध है.” सुप्रीम कोर्ट ने Ker v. Illinois को दोहराते हुए कहा, “Due Process का मतलब ये नहीं है कि आरोपी को सिर्फ सही तरीके से ही पकड़ा जाए. अगर कोर्ट के सामने आरोपी मौजूद है, ट्रायल चलेगा.” पुलिस या एजेंसियों की गलती से कोर्ट की शक्ति खत्म नहीं होती.
वर्तमान में दोनों फैसलों का संयुक्त सार अमेरिकी कानून का सैद्धांतिक आधार है. आम भाषा में प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा आरोपी को पकड़ना गलत हो सकता है, लेकिन ट्रायल फिर भी सही माना जाएगा. अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यही सिद्धांत बाद में Manuel Noriega (Panama), Osama bin Laden, Abu Omar (CIA rendition cases) और आज जब सवाल उठता है, “क्या अमेरिका किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति या नेता को उठाकर ट्रायल कर सकता है?” तो जवाब में यही केस कानून की ढाल बनते हैं.
क्या है अंतरराष्ट्रीय कानून?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर तीन जनवरी 2026 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में ले लिया गया. उसके बाद से यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या अमेरिका राष्ट्रपति मादुरो की तरह किसी भी हेड ऑफ स्टेट को गिरफ्तार कर सकता है या नहीं?
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक मौजूद हेड ऑफ स्टेट को व्यक्तिगत सुरक्षा प्राप्त होती है. यह सुरक्षा कथित अपराध की परवाह किए बिना लागू होती है और इसमें विदेशी राष्ट्रीय अदालतों द्वारा गिरफ्तारी, हिरासत और मुकदमा शामिल है. यह इम्यूनिटी सरकार के प्रमुख और विदेश मंत्रियों पर भी लागू होती है. इससे यह पक्का होता है कि इंटरनेशनल रिलेशंस सही तरीके से कम करे. जिस वजह से नेता शत्रु देश द्वारा गिरफ्तारी के डर के बिना यात्रा कर सकें और राजनयिक रूप से जुड़ सकें.
इसका फायदा क्या?
यह नियम कानून से ऊपर नहीं है बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कानूनी अराजकता को रोकने के लिए है. ऐसा ना होने पर दुश्मन देश विदेशी नेताओं को परेशान करने या हिरासत में लेने के लिए अदालतों का इस्तेमाल कर सकते हैं. जब तक किसी भी नेता को देश के वैध प्रमुख के रूप में मान्यता प्राप्त है विदेशी घरेलू अदालतें उन्हें कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं कर सकतीं.
गिरफ्तारी संभव कब?
जिस तरफ राष्ट्रीय अदालतें डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी से बंधी होती हैं, उसी तरह अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण को इससे पूरी छूट है. रोम संविधि के तहत हेड ऑफ स्टेट पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसे निकायों द्वारा नरसंहार, युद्ध अपराध या मानवता के खिलाफ अपराध जैसे अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है. चाहे आरोपी का आधिकारिक पद कोई भी क्यों न हो. इसके लिए वो कानून को खुद को बचाने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता, लेकिन क्षेत्राधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून से आना चाहिए ना कि किसी एक देश की एकतरफा कार्रवाई से.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति अलग कैसे?
इस मसले पर अमेरिका का तर्क है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को वह प्रतिरक्षा के लिए योग्य ही नहीं मानता. वाशिंगटन उन्हें वेनेजुएला के वैध राष्ट्रपति के रूप में मान्यता नहीं देता है. साल 2018 के वेनेजुएला के चुनाव धोखाधड़ी वाले थे और उसके बजाय विपक्षी नेता जुआन गुएडो को अंतिम राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दी. अमेरिका के न्याय विभाग ने अदालत में दायर दस्तावेजों में यह तर्क दिया है की मादुरो अमेरिकी क्षेत्राधिकार में प्रतिरक्षा के हकदार नहीं हैं.
US किसी भी हेड ऑफ स्टेट को गिरफ्तार कर सकता है!
अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ऐसा नहीं कर सकता. कोई भी देश अपने न्यायालय के जरिए से किसी मौजूदा विदेशी राष्ट्रीय अध्यक्ष को कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं कर सकता. जब तक कि वह व्यक्ति पद पर है.
ट्रंप मानता कहां, उसे समझाएं कौन?
भारत के पूर्व राजदूत अशोक शर्मा का कहना है कि जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार किया गया है, वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिहाज से गैर कानूनी है. कानून कहता है' "कोई भी देश किसी दूसरे देश सीमा में बेमतलब घुस नहीं सकता. फिर किसी भी देश के संवैधानिक प्रमुख, विदेश मंत्रियों की गिरफ्तारी पर रोक है. इसी तरह विदेशी राजनयिकों को कई मामलों में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त है."
पूर्व राजदूत अशोक शर्मा के मुताबिक, "कोई भी देश इंटरनेशनल लॉ के मुताबिक न तो हेड आफ स्टेट को गिरफ्तार कर सकता है, न ही क्रिमिनल डिक्लेयर कर सकता है. लेकिन, अमेरिका इसे मानता कहां है? अहम सवाल यह है कि अमेरिका की मनमर्जी के खिलाफ इंटरनेशनल लॉ को लागू कौन कराएगा?"
उन्होंने आगे कहा, "जहां तक संयुक्त राष्ट्र संघ की बात है तो उसे बनाया किसने? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विजेता राष्ट्रों ने दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत के नाम पर बनाया था. हारे हुए राष्ट्र जापान और जर्मन को तो बहुत बाद में उसका सदस्य बनाया गया. इसलिए, विजेता राष्ट्रों ने अपने हित में ही नियम भी बनाए. आज भी वो उसकी व्याख्या अपने हितों के हिसाब से ही करते हैं. इसमें कमजोर राष्ट्रों को विवाद की स्थिति में नुकसान उठाना पड़ता है."





