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UP चुनाव से पहले मुस्लिम वोट के पैटर्न पर SP-Congress में रार क्यों? FAQ में समझें पूरा गणित

यूपी चुनाव से पहले मुस्लिम वोट पर सपा-कांग्रेस में बढ़ती रार क्यों है? 2012 से 2024 तक वोट पैटर्न, गठबंधन और बदलते सियासी समीकरणों का पूरा गणित समझें.

Uttar Pradesh Election Muslim Vote SP Congress
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उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम वोट सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि कई सीटों पर जीत-हार के लिहाज से निर्णायक माना जाता है. करीब 19 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले यूपी में समाजवादी पार्टी लंबे समय से खुद को इस वोट का सबसे मजबूत राजनीतिक दावेदार मानती रही है, जबकि कांग्रेस अब दोबारा इस समुदाय के बीच अपनी जमीन तलाश रही है. 2024 लोकसभा चुनाव में SP-कांग्रेस गठबंधन की बड़ी सफलता ने इस पुराने समीकरण को फिर चर्चा में ला दिया. कुल 80 सीटों में से SP ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं. लेकिन सवाल है कि मुस्लिम वोट पर असली पकड़ किसकी है?

अहम सवाल यह है कि कांग्रेस की वापसी से सपा क्यों बेचैन है? 2012 से 2024 तक मुस्लिम राजनीति में क्या बदला? और 2027 से पहले दोनों दलों की रणनीति क्या संकेत दे रही है? आइए FAQ में पूरा गणित समझते हैं.

सपा को मुस्लिम वोट का सबसे मजबूत आधार मुलायम सिंह यादव के दौर से मिला. 2012 में सपा ने 78 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें 43 जीते. उसी चुनाव में यूपी विधानसभा में 69 मुस्लिम विधायक चुने गए और सपा ने सरकार बनाई. लेकिन 2017 में तस्वीर बदली. सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद मुस्लिम विधायकों की संख्या घटकर 24 रह गई.

सपा के उभार से पहले कांग्रेस लंबे समय तक यूपी में मुस्लिमों का प्रमुख राजनीतिक विकल्प रही. लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति और कांग्रेस के कमजोर संगठन ने उसका आधार खिसका दिया. 2017 में कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन किया. कांग्रेस 114 सीटों पर लड़ी, जबकि सपा ने 311 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. गठबंधन सत्ता तक नहीं पहुंच सका.

2017 में दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़ा, लेकिन गठबंधन को अपेक्षित मुस्लिम समर्थन नहीं मिला. बीजेपी ने 403 में से 312 सीटें जीतीं. सपा 47 और कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई. यह चुनाव बताता है कि सिर्फ मुस्लिम वोट का समीकरण सत्ता दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है. व्यापक सामाजिक गठजोड़, उम्मीदवार और बूथ स्तर का संगठन भी जरूरी है.

2022 में सपा ने 64 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जो 2017 के मुकाबले कम थे. इसके पीछे पार्टी की कोशिश अपनी पुरानी मुस्लिम-यादव वाली छवि से आगे निकलकर पिछड़े, दलित और अन्य वर्गों तक पहुंच बनाने की थी. इसके बावजूद 64 में से 31 मुस्लिम उम्मीदवार जीत गए. यूपी विधानसभा में कुल मुस्लिम विधायकों की संख्या 34 रही.

2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी की 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीतीं. अकेले सपा 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. मुस्लिम-यादव बहुल सीटों पर बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ. सपा ने बीजेपी की कई मजबूत सीटें छीनीं. इससे संकेत मिला कि मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा विपक्ष के साथ रणनीतिक तरीके से गया और सपा को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिला.

ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा. 2024 में सपा ने सिर्फ चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और चारों जीत गए. मुस्लिम वोट कई सीटों पर उम्मीदवार और बीजेपी को हराने की संभावना के आधार पर गया. कांग्रेस ने भी मुस्लिम बहुल इलाकों में वोट हासिल किया. इसलिए 2024 का पैटर्न यह बताता है कि मुस्लिम मतदाता किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक नहीं, बल्कि चुनावी परिस्थितियों के अनुसार रणनीतिक मतदान कर सकता है.

सबसे बड़ी चिंता मुस्लिम वोट के बंटवारे की है. यूपी में मुस्लिम आबादी करीब 19 फीसदी है और कई विधानसभा सीटों पर यह निर्णायक भूमिका में है. सपा को डर है कि कांग्रेस अगर मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है तो विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है. यही वजह है कि 2027 से पहले सीट बंटवारा दोनों दलों के बीच सबसे बड़ा विवाद बन सकता है.

कांग्रेस 2027 से पहले संगठन में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने यूपी संगठन में मुस्लिम चेहरे को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है. सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस का संदेश है कि वह सिर्फ गठबंधन की सहयोगी नहीं, बल्कि यूपी में अपना स्वतंत्र सामाजिक आधार दोबारा तैयार करना चाहती है.

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद सपा यूपी में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे मुस्लिम समर्थन का बड़ा हिस्सा मिला. कांग्रेस भी 2024 में छह लोकसभा सीटें जीतकर अपनी वापसी का दावा कर रही है. अब सवाल सिर्फ गठबंधन का नहीं, बल्कि कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा और किस पार्टी का उम्मीदवार मुस्लिम वोट को बेहतर तरीके से एकजुट कर पाएगा, इसका है.

2027 में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि मुस्लिम मतदाता किसे बीजेपी के खिलाफ सबसे मजबूत विकल्प मानता है. 2024 में विपक्षी वोटों के तालमेल ने सपा-कांग्रेस को बड़ा फायदा दिया था. लेकिन विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन और सीटवार मुकाबला ज्यादा महत्वपूर्ण होगा. इसलिए मुस्लिम वोट पर सपा या कांग्रेस का एकतरफा दावा आसान नहीं होगा.

अखिलेश यादवराहुल गांधी
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