UP Election 2027: टिकट मिलेगा या कटेगा? यूपी BJP के साइलेंट सर्वे ने क्यों बढ़ाई विधायकों की बेचैनी?
यूपी चुनाव 2027 से पहले बीजेपी का साइलेंट सर्वे कई विधायकों की चिंता बढ़ा रहा है. रिपोर्ट कार्ड, एंटी-इनकंबेंसी और जीत की संभावना के आधार पर टिकट तय हो सकते हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी 14 महीने से ज्यादा का समय बाकी है, लेकिन बीजेपी ने उम्मीदवारों की परीक्षा अभी से शुरू कर दी है. पार्टी ने प्रदेशभर में एक साइलेंट सर्वे लॉन्च किया है, जिसमें मौजूदा विधायकों की लोकप्रियता, जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता, एंटी-इनकंबेंसी और जीत की संभावनाओं का अनुमान लगाया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, दो या उससे अधिक बार चुनाव जीत चुके विधायकों पर खास नजर रखी जा रही है. 2024 लोकसभा चुनाव में कई दिग्गज नेताओं की हार के बाद पार्टी विधानसभा चुनाव कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं है.
यही वजह है कि बाहरी एजेंसियों, संगठन और RSS के फीडबैक के आधार पर 2027 के लिए उम्मीदवारों का नया ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है. संकेत साफ हैं- जिन विधायकों की रिपोर्ट कमजोर होगी, उनके लिए टिकट बचाना आसान नहीं होगा.
1. BJP ने सर्वे अभियान क्यों शुरू किया?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी करीब 8 महीने का समय बाकी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने अभी से चुनावी तैयारियों को तेज कर दिया है. पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह की सत्ता विरोधी लहर, स्थानीय असंतोष या संगठनात्मक कमजोरी को पहले से पहचानना चाहता है. इसी उद्देश्य से बड़े पैमाने पर विधानसभा क्षेत्रों का सर्वे कराया जा रहा है. यह काम पिछले दो महीने से ज्यादा समय से जारी है. ताकि उम्मीदवार चयन से लेकर चुनावी रणनीति तक हर फैसला जमीनी आंकड़ों के आधार पर लिया जा सके.
2. किन एजेंसियों को मिली सर्वे की जिम्मेदारी?
सूत्रों के अनुसार, सर्वे का पहला चरण प्रोफेशनल चुनाव प्रबंधन संस्था 'नेशन विद नमो' को सौंपा गया है. यह संगठन पहले 'अ बिलियन माइंड्स (ABM)' के नाम से काम कर चुका है और बीजेपी भाजपा के कई चुनावी अभियानों से जुड़ा रहा है. पार्टी इस बार दो अलग-अलग एजेंसियों से रिपोर्ट तैयार कराने की रणनीति पर काम कर रही है. ताकि एक-दूसरे के आंकड़ों का मिलान कर निष्पक्ष और वास्तविक फीडबैक हासिल किया जा सके. 2022 के चुनाव से पहले भी भाजपा ने जार्विस और एबीएम जैसी एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर बड़े स्तर पर टिकट वितरण में बदलाव किए थे.
3. विधायकों के बारे में क्या-क्या परखा जा रहा?
सर्वे केवल लोकप्रियता मापने तक सीमित नहीं है. टीमों को यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई है कि विधायक अपने क्षेत्र में कितने सक्रिय हैं, जनता से उनका संपर्क कैसा है, विकास कार्यों को लेकर लोगों की राय क्या है और स्थानीय स्तर पर उनके प्रति संतोष या नाराजगी का माहौल कितना है. इसके साथ ही संभावित नए चेहरों की स्वीकार्यता, जातीय समीकरण, संगठन में उनकी पकड़ और चुनाव जीतने की क्षमता का भी मूल्यांकन किया जा रहा है.
4. सर्वे टीमों का काम कैसे चल रहा है?
सर्वे एजेंट गांवों, कस्बों और शहरों में अलग-अलग सामाजिक समूहों से संपर्क कर रहे हैं. चाय की दुकानों, बाजारों, अदालत परिसरों, शिक्षण संस्थानों और आवासीय इलाकों में लोगों से अनौपचारिक बातचीत के जरिए राय जुटाई जा रही है. इसके अलावा, बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं, जिला पदाधिकारियों, शिक्षकों, डॉक्टरों, व्यापारियों, महिला संगठनों और युवा समूहों से भी फीडबैक लिया जा रहा है. सर्वे का उद्देश्य केवल सार्वजनिक धारणा नहीं बल्कि पार्टी के अंदरूनी माहौल और स्थानीय समीकरणों को भी समझना है.
5. टिकट वितरण में RSS और स्थानीय नेताओं की क्या भूमिका?
बीजेपी संगठन अपने स्तर पर संभावित उम्मीदवारों की अलग सूची तैयार कर रहा है. बताया जा रहा है कि सांसदों, जिला संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े पदाधिकारियों की राय भी अंतिम निर्णय में महत्वपूर्ण होगी. बाहरी एजेंसियों की रिपोर्ट, संगठन के फीडबैक और संघ के इनपुट को एक साथ मिलाकर उम्मीदवारों की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा. जिन नामों को विभिन्न स्तरों पर समर्थन मिलेगा, उनकी दावेदारी सबसे मजबूत मानी जाएगी.
6. मुरादाबाद मंडल पर BJP की खास नजर क्यों?
प्रदेशव्यापी सर्वे में मुरादाबाद मंडल बीजेपी के लिए विशेष महत्व रखता है. 2017 में पार्टी ने यहां शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन 2022 में सीटों की संख्या घट गई. इसी वजह से पार्टी इस क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और संभावित उम्मीदवारों का गहन अध्ययन कर रही है. नेतृत्व यह जानना चाहता है कि पिछली बार प्रदर्शन में गिरावट की वजह क्या रही और अगले चुनाव तक उसे कैसे सुधारा जा सकता है.
7. इन विधायकों की टिकट पर बढ़ा संकट
यूपी बीजेपी सूत्रों के मुताबिक दो या दो से अधिक बार चुनाव जीत चुके विधायकों के काम काज पर ज्यादा नजर रखी जा रही है. लोकसभा चुनाव में यह देखने को मिला कि जो लोग दो बार चुनाव जीत चुके थे और तीसरी बार चुनाव लड़े उनमें से ज्यादातर चुनाव हार गए.
वेस्ट यूपी से संजीव बालियान तीसरी बार लोकसभा चुनाव हार गए. डॉ. Sanjeev Balyan ने 2024 का लोकसभा चुनाव Muzaffarnagar लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था. वे 2014 और 2019 में इसी सीट से सांसद चुने गए थे, लेकिन 2024 में उन्हें समाजवादी पार्टी के हरेंद्र सिंह मलिक ने लगभग 24,600 वोटों के अंतर से हरा दिया. यूपी के कई विधायक भी ऐसे हैं, जिनकी परफार्मेंश रिपोर्ट सही नहीं हैं. लोकसभा चुनाव परिणाम से सीख लेते हुए पार्टी ऐसे विधायकों को टिकट नहीं देने का मन बना रही है.
इसके अलावा, पार्टी मौजूदा विधायकों की एंटी इनकंबेंसी किसके खिलाफ कितना है, इस पर ध्यान दे रही है. कास्ट फैक्टर का भी इस बार ध्यान रखा जा रहा है. नए उम्मीदवारों का चुनावी जीत का रेशियो ज्यादा है. ऐसे में पार्टी कई सीटों पर नए चेहरों पर दांव लगा सकती है.
8. सर्वे का सियासी संदेश क्या?
बीजेपी स्पष्ट संकेत दे रही है कि 2027 का चुनाव केवल मौजूदा विधायकों के आधार पर नहीं लड़ा जाएगा. जिन प्रतिनिधियों के खिलाफ नकारात्मक फीडबैक मिलेगा या जिनकी जन स्वीकार्यता कमजोर पाई जाएगी, उनके टिकट पर खतरा मंडरा सकता है. साथ ही पार्टी योगी आदित्यनाथ सरकार के नौ वर्षों के कामकाज, योजनाओं के प्रभाव और संभावित एंटी-इनकंबेंसी का भी आकलन कर रही है. दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और आजाद समाज पार्टी भी अपने-अपने स्तर पर उम्मीदवार चयन और संगठन विस्तार की तैयारी में जुटी हुई हैं. यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी शीर्ष नेतृत्व की नजर है. पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, इस बार कोई चूक नहीं होने देना चाहते हैं.
साफ है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव 2027 को लेकर मुकाबले की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है और आने वाले महीनों में सर्वे रिपोर्ट कई राजनीतिक समीकरण बदल सकती है.




