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ISI के निशाने पर भारत के मासूम! फोन, पैसे और झांसा, 15 साल का किशोर कैसे बना गया जासूस?

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी Inter-Services Intelligence द्वारा भारत में नाबालिगों को जासूसी के लिए इस्तेमाल करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. पठानकोट में 15 वर्षीय किशोर की गिरफ्तारी से खुलासा हुआ कि भावनात्मक कमजोरी और सोशल मीडिया के जरिए बच्चों को फंसाया जा रहा है. पुलिस के मुताबिक, किशोर एक साल से संवेदनशील सैन्य जानकारियां साझा कर रहा था. यह मामला भारत की डिजिटल और आंतरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी है.

ISI के निशाने पर भारत के मासूम! फोन, पैसे और झांसा, 15 साल का किशोर कैसे बना गया जासूस?
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 6 Jan 2026 11:00 AM IST

भारत में जासूसी नेटवर्क चलाने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी Inter-Services Intelligence अब नाबालिगों को निशाना बना रही है. यह खुलासा सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चेतावनी है. पठानकोट में 15 वर्षीय किशोर की गिरफ्तारी ने दिखाया कि दुश्मन अब कम उम्र, भावनात्मक कमजोरी और डिजिटल पहुंच का फायदा उठा रहा है. मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि नई भर्ती रणनीति का संकेत है. इससे पहले भी पंजाब के डीजीपी ने ISI की साजिश को लेकर चेताया था.

पुलिस जांच के अनुसार, किशोर पिछले एक साल से सैन्य ठिकानों और संवेदनशील इलाकों से जुड़ी जानकारी ISI हैंडलरों को भेज रहा था. यह नेटवर्क इस तरह डिज़ाइन किया गया था कि सुरक्षा एजेंसियों की नज़र से बचा रहे. शुरुआती पूछताछ में यह भी सामने आया कि पंजाब के अन्य जिलों में भी कुछ नाबालिग इसी तरह संपर्क में हैं जिससे खतरे का दायरा कहीं बड़ा दिखता है.

क्यों चुने जाते हैं नाबालिग?

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ISI जानबूझकर बच्चों का इस्तेमाल करती है ताकि शक कम हो और ट्रैकिंग मुश्किल बने. पैसे, ऑनलाइन गेमिंग क्रेडिट, मोबाइल रिचार्ज जैसे छोटे प्रलोभन देकर भरोसा जीता जाता है. इस केस में भी किशोर को इसी तरह धीरे-धीरे फंसाया गया, ताकि वह खुद को अपराधी नहीं बल्कि “काम करने वाला” समझे.

व्यक्तिगत त्रासदी से कट्टर नेटवर्क तक

जांच में सामने आया कि किशोर के पिता की विदेश में मौत ने उसे गहरे अवसाद में धकेल दिया था. पढ़ाई छूट गई, अकेलापन बढ़ा और सोशल मीडिया पर भड़काऊ कंटेंट से जुड़ाव हुआ. इसी भावनात्मक खालीपन को पहचानकर ISI से जुड़े तत्वों ने संपर्क साधा और धीरे-धीरे उसे जासूसी नेटवर्क में शामिल कर लिया. यह कट्टरपंथी भर्ती का जाना-पहचाना पैटर्न है.

सोशल मीडिया बना भर्ती का हथियार

पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया के ज़रिये न सिर्फ सूचनाएं ली जा रही थीं, बल्कि अन्य युवकों को जोड़ने की कोशिश भी हो रही थी. किशोर के मोबाइल की फॉरेंसिक जांच से संपर्कों, चैट्स और फाइनेंशियल ट्रेल की पड़ताल की जा रही है. इस डिजिटल सबूत से नेटवर्क की पूरी कड़ी तक पहुंचने की कोशिश तेज़ है.

चेन तोड़ने की दौड़

Punjab Police ने नाबालिग को न्यायिक हिरासत में भेजते हुए पूरे राज्य में अलर्ट जारी किया है. यह केस बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि घरों के भीतर, मोबाइल स्क्रीन पर चुनौती झेल रही है. सबक साफ है: बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी, मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट और डिजिटल साक्षरता अब सुरक्षा नीति का हिस्सा बननी चाहिए, वरना दुश्मन की यह रणनीति और गहरी पैठ बना सकती है.

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