भोजशाला से मौला तक: परमारों का वाग्देवी मंदिर कैसे बना कमाल मौला मस्जिद?
धार की भोजशाला को लेकर विवाद क्यों है? जानिए कैसे परमारों का वाग्देवी मंदिर समय के साथ कमाल मौला मस्जिद परिसर के रूप में पहचाना जाने लगा.
मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित भोजशाला विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. अब यह भारत के सबसे चर्चित धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों में से एक है. हिंदू पक्ष इसे मां वाग्देवी (सरस्वती) का प्राचीन मंदिर और राजा भोज द्वारा स्थापित विद्या केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है. सवाल यह है कि जब भोजशाला का निर्माण परमार शासकों ने कराया था, तो मस्जिद का विवाद आखिर शुरू कैसे हुआ? दरअसल, इसकी कहानी इतिहास, आक्रमणों, स्थापत्य परिवर्तन और औपनिवेशिक काल की प्रशासनिक नीतियों से जुड़ी हुई है.
राजा भोज और भोजशाला की स्थापना
11वीं शताब्दी में मालवा पर शासन करने वाले परमार वंश के महान राजा राजा भोज को भारतीय इतिहास में विद्या, स्थापत्य और संस्कृति के संरक्षक के रूप में याद किया जाता है. माना जाता है कि उन्होंने धार को अपनी राजधानी बनाया और यहां एक विशाल शिक्षा केंद्र तथा सरस्वती मंदिर की स्थापना करवाई, जिसे बाद में 'भोजशाला' कहा गया.
इतिहासकारों के अनुसार यह केवल मंदिर नहीं था, बल्कि संस्कृत अध्ययन, काव्य, व्याकरण और दर्शन का प्रमुख केंद्र था. यहां विद्वानों की सभाएं होती थीं. कई शिलालेख और स्थापत्य अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहां देवी सरस्वती की पूजा होती थी. ब्रिटिश काल में मिली वाग्देवी की मूर्ति को भी इसी परंपरा से जोड़ा गया.
मुस्लिम आक्रमण और स्थापत्य परिवर्तन
13वीं-14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत का प्रभाव मालवा तक पहुंचा. अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों के बाद धार पर मुस्लिम शासन स्थापित हुआ. इसी दौर में कई मंदिरों और राजकीय संरचनाओं का स्वरूप बदला गया.
इतिहासकार बताते हैं कि भोजशाला परिसर में इस्लामी स्थापत्य के कुछ हिस्से बाद में जोड़े गए. मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यहां सूफी संत कमालुद्दीन चिश्ती की याद में मस्जिद बनाई गई, जिसे 'कमाल मौला मस्जिद' कहा गया. हिंदू पक्ष का आरोप है कि मंदिर के स्तंभों और संरचनाओं का उपयोग करके मस्जिदनुमा ढांचा तैयार किया गया. यहीं से विवाद की ऐतिहासिक जड़ें शुरू होती हैं. एक ही परिसर पर दो धार्मिक दावों का आधार अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याओं पर खड़ा हो गया.
अंग्रेजों के दौर में विवाद ने आकार लिया
भोजशाला विवाद लंबे समय तक स्थानीय स्तर तक सीमित रहा, लेकिन ब्रिटिश शासन में यह अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया. 19वीं सदी में अंग्रेज पुरातत्वविदों और अधिकारियों ने धार के इस परिसर का सर्वे किया. उन्हें यहां संस्कृत शिलालेख, देवी-देवताओं से जुड़े अवशेष और हिंदू स्थापत्य शैली दिखाई दी.
ब्रिटिश अधिकारी और पुरातत्वविद जॉन मार्शल तथा अन्य विद्वानों ने इस स्थल को मिश्रित स्थापत्य वाला परिसर बताया. इसी समय यहां मिली मां वाग्देवी की प्रतिमा को बाद में संग्रहालय ले जाया गया, जो अब British Museum में होने का दावा किया जाता है. अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए अलग-अलग समय पर दोनों समुदायों को पूजा और नमाज की अनुमति देने की व्यवस्था बनाई. यह “समय विभाजन” आगे चलकर विवाद की स्थायी प्रशासनिक नीति बन गया.
स्वतंत्रता के बाद विवाद क्यों बढ़ा?
स्वतंत्रता के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति तेज हुई. हिंदू संगठनों ने भोजशाला को पूर्ण रूप से सरस्वती मंदिर घोषित करने की मांग उठाई. उनका तर्क था कि यह मूल रूप से परमारकालीन मंदिर और शिक्षा केंद्र था, इसलिए यहां केवल हिंदू पूजा होनी चाहिए.
दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय ने इसे सदियों पुरानी मस्जिद बताते हुए नमाज के अधिकार की मांग की. विशेषकर शुक्रवार की नमाज को लेकर विवाद बार-बार सामने आया. 1990 के दशक में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गया. अयोध्या आंदोलन के बाद कई ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों पर दावे-प्रतिदावे तेज हुए, जिनमें भोजशाला भी शामिल थी.
ASI और पुरातात्विक बहस
भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) ने भोजशाला परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया. पुरातात्विक अध्ययनों में यहां हिंदू और इस्लामी दोनों प्रकार के स्थापत्य चिह्न मिलने की बात कही गई.
हिंदू पक्ष कहता है कि स्तंभों पर देवी-देवताओं की आकृतियां, संस्कृत लेख और मंदिर शैली इस बात का प्रमाण हैं कि यह मूल रूप से सरस्वती मंदिर था. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि सदियों से यहां मस्जिद के रूप में इबादत होती रही है, इसलिए उसकी धार्मिक पहचान को नकारा नहीं जा सकता. हाल के वर्षों में ASI सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन को लेकर अदालतों में कई याचिकाएं दायर हुईं. सर्वेक्षणों में मंदिरनुमा अवशेषों की चर्चा ने विवाद को और राजनीतिक बना दिया.
वर्तमान व्यवस्था क्या?
फिलहाल, प्रशासन द्वारा समय आधारित व्यवस्था लागू की जाती रही है. आम तौर पर हिंदू समुदाय को वसंत पंचमी सहित कुछ अवसरों पर विशेष पूजा की अनुमति दी जाती है, जबकि मुस्लिम समुदाय शुक्रवार को नमाज अदा करता रहा है. हालांकि, हर वर्ष त्योहारों और जुमे के एक साथ पड़ने पर तनाव की स्थिति बन जाती है.
मध्य प्रदेश सरकार, स्थानीय प्रशासन और अदालतें समय-समय पर सुरक्षा और धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही हैं.
विवाद का मूल कारण क्या है?
भोजशाला विवाद का मूल कारण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्वामित्व का प्रश्न है.हिंदू पक्ष इसे राजा भोज की सरस्वती मंदिर-विद्या पीठ मानता है. मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है.
इतिहासकारों का एक वर्ग इसे बहुस्तरीय ऐतिहासिक स्थल मानता है, जहां अलग-अलग कालखंडों की परतें मौजूद हैं.
यानी विवाद इसलिए शुरू हुआ क्योंकि परमारकालीन संरचना पर बाद के इस्लामी शासन के दौरान धार्मिक उपयोग बदल गया. सदियों तक सहअस्तित्व की स्थिति रही, लेकिन आधुनिक राजनीति और पहचान की बहस ने इसे बड़े राष्ट्रीय विवाद में बदल दिया. आज भोजशाला केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और राजनीति के टकराव का प्रतीक बन चुकी है.




