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नरोत्तम मिश्रा ही नहीं दतिया में BJP का यादव कार्ड भी नहीं चला, अखिलेश ने कैसे बिना गए कांग्रेस के लिए चली चाल?

दतिया में BJP का यादव कार्ड और नरोत्तम मिश्रा फैक्टर दोनों चर्चा में रहे. जानें मोहन यादव, अखिलेश यादव और दामोदर यादव के बीच बने समीकरण ने कैसे बदला चुनाव.

नरोत्तम मिश्रा ही नहीं दतिया में BJP का यादव कार्ड भी नहीं चला, अखिलेश ने कैसे बिना गए कांग्रेस के लिए चली चाल?
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मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव का नतीजा बीजेपी के लिए सिर्फ एक सीट गंवाने की कहानी नहीं है. इस बार यहां एक साथ कई राजनीतिक प्रयोग हुए. नरोत्तम मिश्रा को टिकट से बाहर कर नया चेहरा उतारा गया, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने यादव वोटों का समीकरण साधने के लिए मोर्चा संभाला और दूसरी तरफ कांग्रेस ने अखिलेश यादव के जरिए यादव वोटों तक पहुंच बनाने की कोशिश की. इसी बीच आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने 22 हजार से ज्यादा वोट लेकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया. आखिर में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 66,757 वोट हासिल किए, जबकि बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 60,741 वोट मिले. जीत का अंतर 6,016 वोट रहा.

पहले नरोत्तम बाहर किया, फिर उन्हीं से जीत की उम्मीद

दतिया की चुनावी पटकथा की शुरुआत बीजेपी के टिकट फैसले से हुई. पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को मैदान में उतारने के बजाय संगठन से जुड़े आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया. मिश्रा दतिया से कई बार विधायक रह चुके हैं और लंबे समय तक इस सीट पर बीजेपी का प्रमुख चेहरा रहे हैं. 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें हराया था.

टिकट कटने के बाद समर्थकों की नाराजगी खुलकर सामने आई. विरोध प्रदर्शन हुए, सड़क जाम हुई और पुलिस से टकराव की स्थिति भी बनी. यानी जिस उम्मीदवार को पार्टी ने टिकट नहीं दिया, उसके समर्थकों को मनाना ही बीजेपी के लिए पहला चुनावी संकट बन गया.

भावुक नरोत्तम मंच पर आए, सामने थे मोहन यादव

बीजेपी ने इसके बाद डैमेज कंट्रोल शुरू किया. 13 जुलाई को आशुतोष तिवारी के नामांकन के दौरान नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री मोहन यादव और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ मंच पर पहुंचे. समर्थकों के विरोध के कुछ ही दिन बाद मिश्रा ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी उम्मीदवार के लिए काम करने और उनकी जीत सुनिश्चित करने की बात कही.

राजनीतिक संदेश साफ था- टिकट भले ही नहीं मिला, लेकिन चुनाव जिताने की जिम्मेदारी अब भी नरोत्तम के कंधों पर है. लेकिन चुनावी राजनीति में सार्वजनिक समर्थन और जमीन पर वोट ट्रांसफर, दोनों हमेशा एक ही चीज नहीं होते.

मोहन यादव के सामने अखिलेश यादव का ‘बिना आए’ दांव

दतिया के चुनाव में यादव वोटों का समीकरण भी महत्वपूर्ण रहा. बीजेपी के पास मुख्यमंत्री मोहन यादव के रूप में प्रदेश का सबसे बड़ा यादव चेहरा था. दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी इस सामाजिक समीकरण को नजरअंदाज नहीं किया.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 'कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने यादव वोटों के लिए अखिलेश यादव से संपर्क किया और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने दतिया में सक्रियता बढ़ाई. यानी अखिलेश के कहने पर यादव वोट कांग्रेस में ट्रांसफर हो गया. यानी मोहन यादव का दांव फेल हो गया. इस बीच कांग्रेस की रणनीति में अखिलेश यादव का नाम दूर से ही सही, चर्चा में आ गया.

अखिलेश ने दतिया पर कहा- ‘बतिया मत करिए’

नतीजे आने के बाद अखिलेश यादव ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए दतिया और बांकीपुर के नतीजों को लेकर तंज किया. उन्होंने कहा, “आप लोग बीजेपी को समझने की कोशिश कीजिए.” बांकीपुर को लेकर उन्होंने कहा कि वहां बीजेपी ने फेयर चुनाव कराया और बेईमानी नहीं की. दतिया के संदर्भ में उन्होंने तंज करते हुए कहा— “दतिया की तो बतिया मत करिए...”

अखिलेश ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए यह भी कहा: “भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के पास बाकी कुछ बचा ही नहीं है. बीजेपी को 12 साल का यह रिटर्न गिफ्ट मिला है. बीजेपी अगर कुंदरकी की तरह चुनाव लड़ती या बंगाल की तरह चुनाव लड़ती और फोर्स लगा देती तो उसकी हार नहीं होती. वो पुलिस प्रशासन को लगाए बिना, बेईमानी किए बिना और EVM में घोटाला किए बिना देखना चाहते थे कि कितनी नाराजगी है. ये हार नहीं है. उन्होंने अपना तय किया है कि बिना बेईमानी के जनता कितना वोट देगी...”

नरोत्तम फैक्टर: गुस्सा दबा या वोट में बदला?

अब कहानी वापस नरोत्तम मिश्रा पर आती है. दतिया में उनका प्रभाव सिर्फ चुनावी पोस्टर या भाषण तक सीमित नहीं रहा है. वह लंबे समय तक इस क्षेत्र में बीजेपी का चेहरा रहे हैं. टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों की नाराजगी ने यह संकेत जरूर दिया कि पार्टी के लिए उनके प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.

नामांकन के दौरान भावुक हुए नरोत्तम की तस्वीरें भी खूब चर्चा में रहीं. इसके बाद उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के समर्थन का ऐलान किया, लेकिन नतीजे ने एक दूसरा सवाल खड़ा कर दिया— क्या समर्थकों ने नेतृत्व का फैसला स्वीकार तो किया, लेकिन वोट के स्तर पर पूरी तरह साथ नहीं आए?

इसका निर्णायक जवाब फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता. लेकिन इतना जरूर है कि बीजेपी जिस सीट पर अपने पुराने संगठनात्मक प्रभाव पर भरोसा कर रही थी, वहां कांग्रेस ने जीत दर्ज कर ली.

दतिया से टिकट मांगा था...

इस बीच दतिया विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरोत्तम मिश्रा का एक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. एक टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्होंने कभी राज्यसभा या लोकसभा की सीट नहीं मांगी, लेकिन विधानसभा चुनाव के लिए टिकट जरूर मांगा था. उन्होंने यह भी कहा कि वह 30 साल विधायक रहे और पार्टी ने 15 साल मंत्री रखा.

22 हजार वोट वाला तीसरा खिलाड़ी कौन?

बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबले में आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने चुनाव का गणित और पेचीदा कर दिया. उन्हें 22 हजार से ज्यादा वोट मिले. यह संख्या इतनी बड़ी रही कि उन्हें नजरअंदाज करके दतिया का चुनावी विश्लेषण पूरा नहीं किया जा सकता.

दामोदर यादव को लेकर चुनाव के दौरान यह राजनीतिक चर्चा भी रही कि उन्हें नरोत्तम मिश्रा की ‘बी टीम’ के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन यह राजनीतिक आरोप/व्याख्या है, स्थापित तथ्य नहीं.

कांग्रेस का चेहरा भी कमजोर नहीं था

घनश्याम सिंह की जीत को सिर्फ बीजेपी विरोधी वोट के खाते में डालना भी सही नहीं होगा. कांग्रेस ने दतिया में अपने पुराने राजनीतिक आधार को सक्रिय किया और घनश्याम सिंह ने 66,757 वोट हासिल किए. दूसरी ओर बीजेपी के आशुतोष तिवारी 60,741 वोट पर रुक गए. यानी अंतर 6,016 वोट का रहा.

यह अंतर बताता है कि बीजेपी की हार केवल कुछ सौ या एक-दो हजार वोटों की मामूली चूक नहीं थी. पार्टी को अपने पुराने प्रभाव वाले क्षेत्र में स्पष्ट अंतर से पीछे रहना पड़ा. नरोत्तम का ‘अपमान’, मोहन की मेहनत और अखिलेश का असर- किसने कितना खेल बदला?

दतिया के नतीजे को लेकर अब कई राजनीतिक दावे किए जा रहे हैं. कोई इसे नरोत्तम मिश्रा की नाराजगी से जोड़ रहा है, कोई यादव वोटों के समीकरण से और कोई दामोदर यादव के 22 हजार से ज्यादा वोटों को निर्णायक मान रहा है.

दतिया का संदेश क्या?

दतिया की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी मजबूत नेता को टिकट से हटाना सिर्फ उम्मीदवार बदलना नहीं होता. उसके साथ जुड़े समर्थक, स्थानीय नेटवर्क और सामाजिक समीकरण भी चुनाव का हिस्सा होते हैं.

बीजेपी के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आशुतोष तिवारी क्यों हारे. असली सवाल यह है कि दतिया में पार्टी का पुराना सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण कहां कमजोर हुआ. नरोत्तम मिश्रा फैक्टर, मोहन यादव का यादव कार्ड, अखिलेश यादव से जुड़ी कांग्रेस की रणनीति और दामोदर यादव के 22 हजार से ज्यादा वोट- इन सभी को साथ रखकर ही दतिया के नतीजे को समझा जा सकता है. और यही वजह है कि दतिया की हार को फिलहाल सिर्फ “कांग्रेस जीती” कहकर खत्म करना आसान है, लेकिन इसकी अंदरूनी कहानी बीजेपी के लिए कहीं ज्यादा असहज सवाल छोड़ती है.

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