गजब पुलिस है भाई! 100 रुपये के गेहूं चोरी पर 45 साल बाद गिरफ्तारी, शिकायतकर्ता बोले - 'अब दिल में कोई शिकवा नहीं'
मध्य प्रदेश के खरगोन में 45 साल पहले 100 रुपये के गेहूं चोरी के मामले में 65 साल के सलीम मेवाती की गिरफ्तारी ने सबको चौंका दिया. डिजिटलीकरण के दौरान सामने आए इस केस में आखिरकार 80 साल के शिकायतकर्ता ने राजीनामा कर लिया और कहा, 'अब दिल में कोई शिकवा नहीं.'
एमपी के खरगोन की ये कहानी सिर्फ 100 रुपये के गेहूं की नहीं है. ये वक्त, कानून और इंसान के बीच अटके एक मुकदमे से जुड़ी है. इसमें पुलिस क्राइम रिकॉर्ड का डिजिटलाइजेशन की वजह से 45 साल बाद जाकर फाइल से मामला बाहर आया. इसके बाद खरगोन पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. आरोपी का परिवार पुलिस के इस कार्रवाई चौंक गए. लेकिन इस मुकदमे का अंत और सुखद हो गया है.
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में आरोपी मुसलमान और और शिकायतकर्ता हिंदू. गिरफ्तारी के बार 80 साल के शिकायतकर्ता ने कहा अब मुझे सलीम मेवाती से कोई शिकायत नहीं है. दोनों के बीच राजीनामा हो गया. यानी यह मामला अदालत से ज्याद दिल का था, जो निपट गया.
45 साल पुरानी ‘शरारत’ और अचानक दस्तक देती पुलिस
सलीम मेवाती आज 65 साल के हैं. पोते-पोतियों वाले दादा कहलाते हैं. शुगर और बीपी के मरीज हैं. एक साधारण परिवार की तरह जिंदगी बिता रहे थे. उन्हें खुद याद ठीक से याद नहीं कि 1980 में क्या हुआ था, लेकिन 7 फरवरी की सुबह मध्य प्रदेश के खरगोन जिले की पुलिस उनके दरवाजे पर खड़ी थी. आरोप था 45 साल पहले 100 रुपये के गेहूं की चोरी.
फोन पर सलीम ने कहा, “साहब, मुझे तो याद भी नहीं था कब बचपने में क्या शरारत की. पता होता कि मेरे नाम केस है तो खुद ही पुलिस के पास चला जाता.”
1980 की सर्द रात और दो खेतों से गेहूं
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, दिसंबर 1980 में बलसमुंद काकड़ गांव में दो खेतों से गेहूं चोरी हुआ था. उस वक्त सलीम और उनके छह दोस्त 19-20 साल के बताए गए.
परिवार का दावा - सलीम तब किशोर थे, शायद 13-14 साल के
दो किसानों माणिकचंद पटेल और लालचंद पटेल ने एफआईआर दर्ज कराई थी. धारा 379 (चोरी) के तहत मामला कायम हुआ था. फिर वक्त गुजरता गया… और केस फाइलों में दबा रहा.
डिजिटलीकरण ने खोला 45 साल पुराना पन्ना
कुछ साल पहले मध्य प्रदेश में पुराने मामलों का डिजिटलीकरण हुआ. इसी दौरान यह फाइल फिर सामने आई. स्थाई वारंट के आधार पर पुलिस फरार आरोपियों को ढूंढने निकली. पुलिस के लिए सलीम तक पहुंचना भी एक संयोग था. एक अन्य आरोपी के परिवार से बातचीत के दौरान उनका नाम मिला. पुलिस धार जिले के बाघ गांव पहुंची, जहां सलीम शादी के बाद से रह रहे थे.सलीम के परिवार कहना है - उन्हें कभी कोई समन नहीं मिला, कोई सूचना नहीं मिली.
'चोरी की बात सुन हम तो शॉक में थे'
सलीम की बहू आयशा बताती हैं, “हमें तो समझ ही नहीं आया. पुलिस आई और ससुर जी को गिरफ्तार करने की बात कही. कहा 45 साल पहले 100 रुपये के गेहूं चुराए थे.” सलीम की पत्नी तस्लीम के लिए यह और भी कठिन था. तीन बेटियों, एक बेटे के बाप और पोते-पोतियों के दादा को चोर कहकर गाड़ी में बैठा लिया. हम कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे. तस्लीम कहती हैं, “अगर सच में मामला था, तो इतने सालों में किसी ने बताया क्यों नहीं? हम 70-80 किलोमीटर दूर रह रहे थे, पूरा परिवार गांव में है। कभी कोई नोटिस नहीं आया.”
उनकी सबसे बड़ी पीड़ा गिरफ्तारी से ज्यादा सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर है. जिस तरह मीडिया में दिखाया गया, लगा जैसे कोई बड़ा अपराधी हो. जबकि वो एक साधारण आदमी हैं.
जेल, उम्र और थक चुका मुकदमा
गिरफ्तारी के बाद सलीम को जेल भेजा गया, लेकिन अब दोनों पक्ष बूढ़े हो चुके थे. सलीम कहते हैं, “मैं भी बूढ़ा हो गया हूं. शुगर-बीपी का मरीज हूं. मुकदमा दर्ज कराने वाले भी बुजुर्ग हैं। इतनी पुरानी बात पर अब किसमें ताकत है केस लड़ने की? इसलिए राजीनामा कर लिया.”
उधर शिकायतकर्ता माणिकचंद पटेल के बेटे राजेंद्र पटेल भी यही कहते हैं, “तब रकम बड़ी रही होगी. आज के हिसाब से छोटी बात है. दोनों पक्ष बुजुर्ग हैं, इसलिए समझौता कर लिया.”
अदालत से पहले दिल का फैसला
कानूनी जानकार बताते हैं कि चोरी जैसे मामलों में अदालत की अनुमति से समझौते के आधार पर कार्यवाही खत्म हो सकती है, लेकिन इस कहानी में जो सबसे ज्यादा बोलता है, वह है समय.
45 साल पहले की एक घटना, जिसे शायद किसी ने बचपने की शरारत माना होगा,वह आधी सदी तक एक परिवार के नाम से जुड़ी रही, बिना उन्हें पता चले. और अंत में, कोर्टरूम से पहले इंसानियत ने फैसला सुनाया.
अब दिल में कोई शिकवा नहीं
कभी 100 रुपये के गेहूं पर शुरू हुआ विवाद, आखिरकार दो बुजुर्गों के बीच एक समझौते और थके हुए समय की चुप्पी में खत्म हो गया. शिकायतकर्ता ने कहा, 'अब सलीम से कोई शिकायत नहीं.'





