क्या होता है GI टैग जो झारखंड के मांदर को मिला, जानें कैसे बनता है ये इंस्ट्रूमेंट और इसकी खासियत
झारखंड के पारंपरिक मांदर की थाप अब सिर्फ त्योहारों तक सीमित नहीं रही, इसे GI टैग मिलने से देशभर में इसकी खास पहचान बनी है.
झारखंड की पहचान यहां के लोकगीतों, नृत्य और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से भी जुड़ी है. इन्हीं में से एक है मांदर, जिसकी गूंजती थाप पर गांवों में त्योहारों के दौरान लोग नाचते-गाते हैं. अब इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को GI टैग दिया गया है. GI टैग यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन एक ऐसी पहचान है, जो किसी खास इलाके में बनने वाले उत्पाद को उसकी जगह और उससे जुड़ी खासियतों के आधार पर मिलती है. मांदर को यह सम्मान मिलने से झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान मिली है.
मांदर को पहली बार देखने पर यह ढोल जैसा लग सकता है, लेकिन इसे बनाने का तरीका और इसकी आवाज इसे अलग बनाती है. इसका ढांचा स्थानीय लाल मिट्टी से तैयार किया जाता है और दोनों सिरों पर जानवरों की खाल लगाई जाती है. जब इस पर थाप पड़ती है, तो इसकी गूंज पूरे माहौल को उत्सव के रंग में रंग देती है. सरहुल, करम और सोहराय जैसे पर्वों पर मांदर की धुन झारखंड के लोकजीवन का अहम हिस्सा बन जाती है.
क्या होता है GI टैग?
GI टैग किसी ऐसी चीज को मिलने वाली खास पहचान है, जो किसी निश्चित इलाके से जुड़ी हो और जिसकी खासियत उस जगह की मिट्टी, कारीगरी या पुरानी परंपरा से बनी हो. इससे उस प्रोडक्ट की पहचान उसके अपने क्षेत्र के नाम से होती है. झारखंड के मांदर को भी यह दर्जा उसकी अलग बनावट, बनाने की पारंपरिक कला, खास गूंज और स्थानीय लोगों के जीवन से लंबे समय से जुड़े होने की वजह से मिला है.
कैसा दिखता है झारखंड का मांदर?
पहली नजर में मांदर आपको ढोल जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसे बनाने का तरीका इसे अलग पहचान देता है. इसे तैयार करने के लिए स्थानीय लाल मिट्टी से एक खोखला ढांचा बनाया जाता है. इसके दोनों मुंह खुले रहते हैं और एक तरफ का हिस्सा दूसरी तरफ से छोटा होता है. दोनों सिरों पर पशु की खाल लगाकर उसे रस्सियों से मजबूती से बांधा जाता है. जब मांदर पर हाथों से थाप पड़ती है, तो इसकी गहरी और गूंजदार आवाज पूरे माहौल में उत्सव की रंगत भर देती है. यही कारण है कि झारखंड के पारंपरिक जीवन और लोकनृत्य में मांदर को खास जगह मिली हुई है.
कहां इस्तेमाल होता है मांदर?
झारखंड के कई आदिवासी इलाकों में मांदर सिर्फ एक इंस्ट्रूमेंट नहीं, बल्कि उत्सव का अहम हिस्सा है. सरहुल, करम, सोहराय और माघे जैसे त्योहारों में इसकी थाप माहौल को खास बना देती है. गांव के अखरा में जब मांदर बजता है, तो लोग पारंपरिक गीतों के साथ नृत्य करते हुए उत्सव मनाते हैं. इसकी धुन पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपराओं और सामुदायिक जीवन को जोड़ने का काम करती है.




