पत्नी को ससुराल आने से रोकती रही मां, ‘घर जमाई’ की शर्त और गंभीर बीमारी का खुलासा; तलाक के बाद पति को 30 लाख देने का आदेश
झारखंड में एक पति को तलाक मांगना भारी पड़ गया. दरअसल पत्नी की क्रूरता की वजह से पति ने तलाक की डिमांड की थी. कोर्ट ने आदेश दिया कि पति को 30 लाख भरण पोषण देना होगा.
Jharkhand Talaq Case: झारखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक तलाक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति को पत्नी को एकमुश्त 30 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण (permanent alimony) देने का निर्देश दिया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए, जिससे पत्नी अपने जीवन स्तर और शादी के दौरान जिस तरह के जीवन की आदी थी, उसी के अनुरूप सम्मानजनक जीवन जी सके.
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद की खंडपीठ ने 16 अप्रैल को परिवार अदालत द्वारा सितंबर 2023 में दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा. परिवार अदालत ने पत्नी द्वारा क्रूरता (cruelty) के आधार पर तलाक की इजाजत दी थी.
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी के लाइफस्टाइल, दोनों पक्षों की कंडीशन, उनकी जरूरतें, पति की भुगतान क्षमता, उसके खुद के खर्च और अन्य जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि पत्नी को ऐसी राशि मिले जिससे वह सम्मानजनक जीवन जी सके. इन सभी पहलुओं को देखते हुए 30 लाख रुपये की राशि उचित मानी गई.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पति पर यह जिम्मेदारी है कि वह पत्नी को ऐसा जीवन स्तर दे सके जैसा वह शादी के दौरान जी रही थी, भले ही पति की अपनी भी जिम्मेदारियां और खर्च हों. यह मामला पत्नी द्वारा दाखिल अपील पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें उसने सितंबर 2023 के फैसले को चुनौती दी थी.
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के मुताबिक, मामले के अनुसार, दोनों की शादी जुलाई 2018 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी. पति ने बताया कि शादी में पत्नी के परिवार के बहुत कम लोग शामिल हुए थे, जिससे उसे संदेह हुआ, लेकिन उसने शादी जारी रखी. उसने यह भी आरोप लगाया कि शादी के बाद पत्नी और उसके परिवार ने महीनों और वर्षों तक बिना किसी कारण के विदाई नहीं होने दी.
पति ने क्या लगाए आरोप?
पति के अनुसार, जब वह पत्नी को अपने घर लाने की कोशिश करता था, तो पत्नी के परिवार ने शर्त रखी कि उसे ‘घरजमाई’ बनकर रहना होगा और अपने परिवार से संबंध तोड़ने होंगे. हालांकि, उसने शादी बचाने की कोशिश की और कई पंचायतों के बाद जनवरी 2019 में पत्नी उसके घर आई.
पति ने बताया कि उसकी मां ने पारिवारिक परंपरा के अनुसार गहने पत्नी को सौंपे थे, लेकिन पत्नी का व्यवहार ससुराल वालों के प्रति उदासीन था और उसने घर की जिम्मेदारियां निभाने से इनकार किया. उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का स्वभाव बहुत गुस्सैल था और वह छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी. पति ने यह भी कहा कि पत्नी उससे दूरी बनाकर रखती थी और शारीरिक संबंधों से भी बचती थी. बाद में पता चला कि वह कुष्ठ रोग (leprosy) के गंभीर रूप से पीड़ित है.
आरोप के अनुसार, एक दिन पत्नी अपने पिता के साथ बिना सूचना दिए घर छोड़कर चली गई और अपने साथ सभी सामान, उपहार और गहने भी ले गई. पति ने कहा कि इस लगातार मानसिक तनाव और सामाजिक अपमान का असर उसकी मां की सेहत पर पड़ा और अक्टूबर 2021 में उनकी मृत्यु हो गई.
ट्रायल कोर्ट ने क्या कहा?
ट्रायल कोर्ट ने माना कि पति पत्नी द्वारा की गई क्रूरता को साबित करने में सफल रहा है और उसे तलाक का अधिकार है. इसके खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की थी. पत्नी का यह भी दावा था कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और वह एकमुश्त भरण-पोषण की मांग कर रही थी.
पति ने छुपाई अपनी आय?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोनों की शादी 2018 में हुई थी और पति ने 2021 में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें क्रूरता, परित्याग (desertion) और गंभीर बीमारी को आधार बनाया गया था. पति ने दावा किया था कि उसकी आय बहुत कम है और वह ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करता है. हालांकि, कोर्ट ने उसके आयकर रिटर्न पर ध्यान दिया, जिसमें उसकी सालाना आय 19 लाख से 32 लाख रुपये के बीच पाई गई.
एक मुश्त राशि पर कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने माना कि पति की आय स्थिर है, जबकि पत्नी के पास जीविका का कोई साधन नहीं है और उसे इस एकमुश्त राशि के ब्याज पर ही जीवन यापन करना होगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि भविष्य की महंगाई को ध्यान में रखना जरूरी है.
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि भारत में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 70 वर्ष है. चूंकि पत्नी की उम्र 37 वर्ष है, इसलिए अगले लगभग 33 वर्षों को ध्यान में रखकर स्थायी भरण-पोषण की गणना की गई, जो करीब 30 लाख रुपये बनती है.
हाई कोर्ट ने कहा कि स्थायी भरण-पोषण का उद्देश्य उस पति या पत्नी की आर्थिक कठिनाइयों को दूर करना है, जिसके पास जीवन यापन या मुकदमे का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त आय नहीं है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर विवाहेतर संबंध (extramarital relations) साबित हो जाएं तो भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है.
कोर्ट ने कैसे तय किया भरण पोषण?
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि स्थायी भरण-पोषण तय करने के लिए कोई निश्चित गणितीय फार्मूला नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति, जरूरतें, पति की आर्थिक क्षमता और अन्य जिम्मेदारियों को ध्यान में रखा जाता है.
पत्नी के वकील ने क्या दी दलील?
पत्नी की ओर से वकील सुमिर प्रसाद ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल अपने पति के साथ रहना चाहती है, लेकिन पति ने दूसरी शादी कर ली है और उसे रखने को तैयार नहीं है, इसलिए अब केवल भरण-पोषण का मुद्दा बचता है. उन्होंने कहा कि पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है.
वहीं, पति की ओर से वकील लुकेश कुमार ने कहा कि वह मामले के गुण-दोष में नहीं जाना चाहते और पति पत्नी को 7500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने को तैयार है, लेकिन कोर्ट ने इसे पर्याप्त नहीं माना और 30 लाख रुपये एकमुश्त देने का आदेश दिया.




