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मोबाइल से लेकर अटेंशन तक, पंचकूला में 8 साल का बच्चा कैसे बना इतना क्रूर, पैरेंट्स लें कौन-कौन सी सीख?

पंचकूला में तीसरी क्लास के बच्चे ने 6 साल की मासूम के साथ जमकर मारपीट की. आरोपी बच्चे केमेंटल असेसमेंट टेस्ट में 2 डिसऑर्डर पाए गए हैं.

मोबाइल से लेकर अटेंशन तक, पंचकूला में 8 साल का बच्चा कैसे बना इतना क्रूर, पैरेंट्स लें कौन-कौन सी सीख?
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( Image Source:  x-@meevkt )
हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत6 Mins Read

Updated on: 3 Nov 2026 11:46 AM IST

पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में तीसरे क्लास के बच्चे ने 6 साल की मासूम को बेरहमी से मारा. अब इस मामले में आरोपी बच्चे की मानसिक जांच के दौरान दो तरह के बर्ताव संबंधी डिसऑर्डर के साइन मिले हैं. इनमें अर्ली ऑनसेट कंडक्ट डिसऑर्डर और इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर शामिल हैं. पहली स्थिति में बच्चा आक्रामक हो सकता है, झूठ बोल सकता है, नियम तोड़ सकता है या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकता है. वहीं, दूसरी परेशानी में उसे अचानक तेज गुस्सा आता है और वह खुद पर काबू नहीं रख पाता.

इस घटना के पीछे बच्चे की मोबाइल गेमिंग की आदत और माता-पिता से पर्याप्त ध्यान नहीं मिलने की बातें भी सामने आई हैं. ऐसे में यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि बच्चों की परवरिश को लेकर भी कई सवाल खड़े करता है. माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें, उनके साथ बातचीत करें और बर्ताव में अचानक बदलाव दिखने पर विशेषज्ञ की मदद लें.

क्या बच्चे को थी गेमिंग की लत

इस मामले में बच्चे के बर्ताव में आए बदलाव के पीछे मोबाइल गेम खेलने की आदत को भी एक वजह माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, बच्चा मोबाइल गेम खेलने का आदी था. इसके साथ ही परिवार की ओर से पर्याप्त समय और ध्यान नहीं मिलने की बात भी सामने आई है. सोमवार को चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के साइकेट्रिक एक्सपर्ट्स ने बच्चे का मेंटल असेसमेंट टेस्ट किया.

बच्चे को कौन-कौन से डिसऑर्डर

  • बच्चे में अर्ली ऑनसेट कंडक्ट डिसऑर्डर पाया गया है. यह बच्चों में कम उम्र से दिखाई देने वाली व्यवहार से जुड़ी एक परेशानी है. इसमें बच्चा बार-बार आक्रामक हो सकता है और दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाला व्यवहार कर सकता है. ऐसे बच्चों में चार तरह की समस्याएं देखने को मिल सकती हैं.
  • दूसरों के साथ मारपीट: बच्चा छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई कर सकता है या किसी को चोट पहुंचा सकता है.
  • चोरी और झूठ बोलना: वह अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोल सकता है या दूसरों की चीजें चुरा सकता है.
  • नियमों की अनदेखी: बच्चा बार-बार घर, स्कूल या समाज के बनाए नियमों को तोड़ सकता है.
  • चीजों को नुकसान पहुंचाना: गुस्से में सामान तोड़ना या किसी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना भी इसके लक्षण हो सकते हैं.
  • कुछ बच्चों को अपने गलत व्यवहार पर पछतावा या दूसरों को हुई तकलीफ का अहसास भी कम होता है. हालांकि, हर बच्चे में ये सभी लक्षण हों, यह जरूरी नहीं है.

2. इंटरमिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर क्या है?

  • यह गुस्से पर काबू रखने से जुड़ी एक मानसिक समस्या है. इसमें बच्चे को अचानक बहुत तेज गुस्सा आ सकता है. कई बार छोटी-सी बात पर भी उसका गुस्सा इतना बढ़ जाता है कि वह खुद पर नियंत्रण खो बैठता है.
  • इस दौरान बच्चा किसी को मार सकता है, गाली-गलौज कर सकता है या आसपास रखी चीजों को तोड़ सकता है.
  • गुस्से का यह दौरा अचानक आता है और कुछ समय बाद बच्चा सामान्य भी हो सकता है.
  • कुछ मामलों में डॉक्टर बच्चे की स्थिति को देखते हुए दवाएं भी दे सकते हैं, ताकि उसके गुस्से और मूड को संभालने में मदद मिले.

बच्चे को कहां रखा गया है?

पंचकूला की घटना के बाद आरोपी बच्चे को 31 अक्टूबर से अंबाला के एक ऑब्जर्वेशन होम में रखा गया है. सोमवार को चंडीगढ़ स्थित पीजीआई के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने उसकी जांच की थी. इस दौरान उसके व्यवहार, मानसिक स्थिति और परिवार से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश की गई. सूत्रों के मुताबिक, डॉक्टरों की रिपोर्ट जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) को सौंप दी गई है. अब बोर्ड इस रिपोर्ट और मामले से जुड़े दूसरे तथ्यों के आधार पर आगे का फैसला करेगा.

ऑब्जर्वेशन होम में बच्चे की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं?

बच्चे को जिस कमरे में रखा गया है, वहां से ऐसी चीजें हटा दी गई हैं जिनसे वह खुद को या किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा सकता है. ऑब्जर्वेशन होम में उसकी सुरक्षा और बर्ताव को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरती जा रही है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गुस्से या किसी अचानक रिएक्शन के दौरान कोई अनहोनी न हो.

पेरेंट्स को क्या करना चाहिए?

  • अक्सर माता-पिता बच्चे की जिद या गुस्से को उसकी शरारत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर बच्चा बार-बार मारपीट करता है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा दिखाता है या दूसरों को चोट पहुंचाने की कोशिश करता है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. ऐसे बदलाव दिखने पर बाल मनोचिकित्सक की मदद लेना जरूरी है.
  • आजकल कई बच्चे घंटों मोबाइल पर गेम खेलते रहते हैं. शुरुआत में माता-पिता को लगता है कि बच्चा घर में ही व्यस्त है, लेकिन धीरे-धीरे फोन उसकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन सकता है. इसलिए बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें. उनकी उम्र के हिसाब से मोबाइल इस्तेमाल करने का समय तय करें और हिंसा वाले गेम से दूर रखें.
  • बच्चों को महंगे खिलौनों और सुविधाओं से ज्यादा माता-पिता के साथ की जरूरत होती है. उनसे दिनभर की बातें पूछें, स्कूल में क्या हुआ यह जानें और उनकी परेशानियां सुनें. अगर बच्चा अपनी बात घर में नहीं कह पाएगा तो वह अकेलापन महसूस कर सकता है. इसलिए रोज कुछ समय सिर्फ उसके लिए निकालें.
  • अगर बच्चा गुस्से में चीजें फेंकता है, किसी को मारता है या जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है तो उसे सिर्फ बचपना कहकर छोड़ना ठीक नहीं है. उसे प्यार से समझाएं कि किसी को चोट पहुंचाना गलत है. जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लें. बच्चे को डराने या लगातार सजा देने के बजाय उसके बर्ताव की वजह समझने की कोशिश करें.
  • बच्चे मोबाइल पर कौन-से गेम खेल रहे हैं और क्या देख रहे हैं, इसकी जानकारी माता-पिता को होनी चाहिए. उनके साथ बैठकर गेम खेलें और इंटरनेट के अच्छे-बुरे पहलुओं के बारे में बताएं. साथ ही उन्हें बाहर खेलने, दोस्तों के साथ समय बिताने और दूसरी क्रिएटिव एक्टिविटी के लिए इंस्पायर करें.
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