800 करोड़ रुपये की लागत, 22 एकड़ जमीन, अंबाला कैंट में क्यों बनाया गया है शहीद स्मारक... कहानी 1857 में छिड़ी क्रांति की
अंबाला कैंट में 800 करोड़ रुपये की लागत से शहीद स्मारक बनाया गया है, जो 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह और शहीद भारतीय सैनिकों की याद दिलाता है. ये शहीद स्मारक 22 एकड़ जमीन पर बना है.
Ambala Cantonment Shaheed Samarak
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 5 नवंबर 2026 को हरियाणा के अंबाला छावनी में 'आज़ादी की पहली लड़ाई का शहीद स्मारक' का उद्घाटन किया. करीब 22 एकड़ जमीन पर 800 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह स्मारक 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंबाला के योगदान को सामने लाने के लिए बनाया गया है. इसे 6 नवंबर से आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा.
इस स्मारक में 700 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के नाम सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं. यहां 63 मीटर ऊंचा कमल के आकार का टावर और 1857 की क्रांति को समर्पित 23 ऐतिहासिक गैलरी बनाई गई हैं. दावा किया जाता है कि मेरठ से करीब 9 घंटे पहले अंबाला छावनी में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी भड़क चुकी थी. आइए जानते हैं इस स्मारक की खासियत और 1857 की क्रांति से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें.
क्यों नाराज थे भारतीय सैनिक?
10 मई 1857 से पहले के कई हफ्तों तक अंबाला छावनी में तनाव का माहौल बना हुआ था. यहां बंदूक डिपो में तैनात सैनिकों को नई एनफील्ड राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी. इसी दौरान सैनिकों ने अपने अधिकारियों के सामने कारतूसों को लेकर चिंता जताई. उन्हें शक था कि कारतूसों पर इस्तेमाल की जाने वाली कथित चर्बी से उनकी धार्मिक और जातीय मान्यताओं को ठेस पहुंचेगी. 26 मार्च से 1 मई 1857 के बीच अंबाला छावनी में आगजनी की 13 घटनाएं हुईं. इन घटनाओं में बैरकों और एक पुलिस स्टेशन को निशाना बनाया गया. अंग्रेजी अधिकारियों ने आरोपियों की जानकारी देने वाले के लिए 1,000 रुपये का इनाम भी घोषित किया, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.
उस समय सिस-सतलज राज्यों के कमिश्नर और सुपरिंटेंडेंट जॉर्ज कार्नेक बार्न्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि कारतूसों के विवाद ने विद्रोह की चिंगारी भड़काई थी. हालांकि, सैनिकों के बीच नाराजगी फैलाने में चिट्ठियों और अलग-अलग जगहों पर घूमने वाले साधु-संतों की भी भूमिका थी.
अंबाला में सैनिकों ने क्यों उठाए थे हथियार?
10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह शुरू होने से कुछ घंटे पहले अंबाला छावनी में भी बगावत हो गई थी. यहां तैनात 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए. अंबाला के डिप्टी कमिश्नर टीडी फोर्सिथ ने बाद में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा था कि अगर सैनिकों की योजना सफल हो जाती, तो अंग्रेज अपने खजाने पर से नियंत्रण खो सकते थे.
इस दौरान जनरल बर्नार्ड कुछ समय के लिए सैनिकों को शांत करने में सफल रहे लेकिन मेरठ और दिल्ली में विद्रोह की खबर अंबाला पहुंचते ही हालात फिर बिगड़ने लगे. इसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने पटियाला, जींद और नाभा रियासतों के शासकों की मदद ली. उनकी सहायता से ग्रैंड ट्रंक रोड को सुरक्षित करने की कोशिश की गई, ताकि विद्रोह का असर दूसरे इलाकों तक न फैल सके.
किन सैनिकों को तोप से उड़ाया?
विद्रोह के दौरान फिरोजपुर से भागकर आए 45वीं और 57वीं रेजिमेंट के 20 सैनिकों को अंग्रेजों ने पकड़ लिया. उस समय सैन्य अदालत गठित नहीं हो सकी थी, इसलिए जॉर्ज कार्नेक बार्न्स ने खुद उनके मामलों की सुनवाई की. 17 और 25 जून को सजा सुनाए जाने के बाद इन सैनिकों को परेड के लिए इकट्ठा किए गए अन्य जवानों के सामने तोप से बांधकर उड़ा दिया गया. इस कार्रवाई की एक और दर्दनाक बात यह थी कि भारतीय तोपचियों को अपने ही देश के सैनिकों को फांसी देने के लिए मजबूर किया गया.
कब मारी गई 10 मिनट में 135 सैनिकों को गोली?
अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह को पूरी तरह दबाने के लिए 1 सितंबर 1857 को 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट को आधिकारिक रूप से भंग करने का फैसला किया. इस दौरान सैनिकों को परेड के लिए इकट्ठा किया गया था. तभी भीड़ में से किसी ने "भागो" चिल्ला दिया. इसके बाद सैनिकों ने अपनी कतारें तोड़ दीं और वहां से भागने लगे. जॉर्ज कार्नेक बार्न्स ने बाद में बताया कि महज 10 मिनट के भीतर 135 सैनिकों को गोली मार दी गई. 33 सैनिकों को पकड़ लिया गया, जबकि करीब 30 जवान भागने में कामयाब रहे. बाद में गिरफ्तार किए गए 29 सैनिकों को फांसी दे दी गई.
क्या है शहीद स्मारक की खासियत?
1. 63 मीटर ऊंचा कमल टावर
2. 700 से ज्यादा शहीदों के नाम
3. 23 ऐतिहासिक गैलरी
4. 130 शॉर्ट फिल्में
अंबाला शहीद स्मारक क्यों बनाया गया है?
इस स्मारक को बनाने का मुख्य उद्देश्य 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंबाला छावनी की भूमिका को देश के सामने लाना है. आमतौर पर इस क्रांति की शुरुआत मेरठ से मानी जाती है, लेकिन अंबाला से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों के जरिए यह बताया जा रहा है कि यहां अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत उससे पहले हो गई थी.




