हिमाचल प्रदेश से लेकर जम्मू-कश्मीर तक... आखिर क्यों पर्यटकों की संख्या कम करने की हो रही बात, ज्यादा टूरिज्म से क्या बिगड़ता है?
हिमाचल से कश्मीर तक बढ़ते पर्यटन ने पर्यावरण, पानी, ट्रैफिक और स्थानीय संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है. जानिए क्यों पर्यटकों की संख्या सीमित करने की बात हो रही है.
हिमाचल प्रदेश से लेकर जम्मू-कश्मीर तक पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की बढ़ती संख्या अब पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का कारण बन रही है. होटल और होमस्टे का विस्तार, पहाड़ों की कटाई, सड़कों का निर्माण और कचरे का बढ़ता बोझ इन इलाकों की प्राकृतिक क्षमता पर असर डाल रहा है. इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने हिमाचल प्रदेश के संवेदनशील पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की संख्या सीमित करने और कॉमर्शियल निर्माण पर अस्थायी रोक लगाने की सिफारिश की है.
दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर की प्रस्तावित सतत पर्वतीय विकास नीति 2026 में 15 पर्यटन स्थलों पर रोजाना आने वाले पर्यटकों की संख्या तय करने का प्रस्ताव है. आखिर पहाड़ों पर पर्यटन का दबाव इतना क्यों बढ़ गया है और पर्यटकों की संख्या सीमित करने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है?
पर्यटकों से किस बात का खतरा है?
हिमाचल प्रदेश के शिमला, कसौली और दूसरे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर होटल, होमस्टे और रिसॉर्ट तेजी से बढ़ रहे हैं. इसके लिए पहाड़ों की ढलानों को काटकर निर्माण किया जा रहा है. इससे जमीन की स्थिरता प्रभावित हो रही है और भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है. वहीं, बढ़ती जरूरतों के मुकाबले पानी, पार्किंग और कचरा प्रबंधन की सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं.
जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण को हो रहे नुकसान, पहाड़ों की अस्थिरता और बार-बार होने वाले भूस्खलन का स्वतः संज्ञान लिया था. कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने अपनी रिपोर्ट पेश की. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की बेंच के सामने रखी गई इस रिपोर्ट में पर्यटन स्थलों की क्षमता के मुताबिक पर्यटकों की संख्या तय करने की सिफारिश की गई है. कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है.
SC की कमेटी ने क्या सिफारिशें की?
CEC के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में होटल, होमस्टे और पर्यटकों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन पर्यटन स्थलों पर लोगों की संख्या की कोई तय सीमा नहीं है. कमिटी ने इसे राज्य की 2019 की पर्यटन नीति के अनुरूप नहीं माना है.
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार हर प्रमुख पर्यटन स्थल की वैज्ञानिक क्षमता का आकलन करे. इसके तहत यह तय किया जाए कि किसी जगह पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कितने पर्यटक आ सकते हैं. इसके लिए सड़कों की चौड़ाई, पार्किंग की उपलब्धता, कचरा प्रबंधन, नगर निकायों की सुविधाओं और पर्यावरण की संवेदनशीलता को आधार बनाया जाए. जिन इलाकों में पर्यावरण पर पहले से ज्यादा दबाव है, वहां पर्यटकों के प्रवेश और नए व्यावसायिक निर्माण पर अस्थायी रोक लगाने की सिफारिश की गई है.
कमेटी ने शिमला-कसौली राजमार्ग के किनारे हो रहे होटल, व्यावसायिक भवनों और रिसॉर्ट निर्माण की तत्काल समीक्षा करने को भी कहा है. यहां बड़े पैमाने पर पहाड़ काटे गए हैं और ढलानों का प्राकृतिक स्वरूप बदला गया है.
इसके अलावा, वन भूमि पर निजी इकोटूरिज्म संचालकों के चयन के लिए जारी सभी टेंडर वापस लेने की सिफारिश की गई है. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समीक्षा पूरी होने तक मौजूदा रियायती समझौतों पर भी रोक लगाने को कहा गया है.
पहाड़ काटकर सड़कें बनाने से क्यों बढ़ रहा खतरा?
CEC की रिपोर्ट में राजमार्गों के विस्तार के दौरान इंजीनियरिंग और नियमों के पालन में कमियों पर भी सवाल उठाए गए हैं. कमिटी के मुताबिक, खड़ी पहाड़ी ढलानों को काटकर सड़कें चौड़ी करने से कई जगह राजमार्गों को नुकसान पहुंचा है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने अकेले कीरतपुर-मनाली राजमार्ग के 44 संवेदनशील हिस्सों में ढलानों को स्थिर करने के लिए 825 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं.
सर्वोच्च अदालत की कमेटी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से पहाड़ी राजमार्गों को चौड़ा करने की कुछ परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी से मिली छूट की दोबारा समीक्षा करने की सिफारिश भी की है. साथ ही, सड़क परियोजनाओं के लिए वन भूमि के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्तावों को छोटे-छोटे हिस्सों में पेश करने पर आपत्ति जताई है.
रिपोर्ट के अनुसार, 1980-81 के बाद से हिमाचल प्रदेश में वन भूमि के इस्तेमाल के बदले अनिवार्य रूप से किए जाने वाले प्रतिपूरक वनीकरण में करीब 10 फीसदी की कमी रह गई है.
10 साल में पर्यटकों की संख्या कितनी बढ़ी?
हिमाचल प्रदेश में 2015 में करीब 1.75 करोड़ पर्यटक आए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर करीब 1.81 करोड़ हो गई. यानी लगभग 3.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. जम्मू-कश्मीर के पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में करीब 1.33 करोड़ पर्यटक आए थे, जबकि 2024 में यह संख्या करीब 2.36 करोड़ दर्ज की गई. इस हिसाब से लगभग 77 फीसदी की बढ़ोतरी दिखती है.
जम्मू-कश्मीर में भी संख्या सीमित करने की योजना क्यों?
हिमाचल की तरह जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग और दूधपथरी जैसे पर्यटन स्थलों पर भी पर्यटकों का दबाव बढ़ रहा है. यहां सड़कों, पानी, साफ-सफाई और कचरा निपटान की व्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है.
इसी समस्या को देखते हुए जम्मू-कश्मीर सरकार ने 'सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट पॉलिसी 2026' का मसौदा तैयार किया है. इसमें 15 अधिक दबाव वाले पर्यटन स्थलों पर रोजाना आने वाले पर्यटकों की संख्या सीमित करने का प्रस्ताव है.
इसके अलावा, निजी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाने, पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण नियंत्रित करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए ग्रीन सेस लगाने की योजना है. इसका उद्देश्य पर्यटन को पहाड़ों की प्राकृतिक क्षमता के दायरे में रखना है.




