Delhi Liquor Policy Case: ‘पहले आरोपी बनाओ, बाद में सबूत ढूंढो’? 15 प्वाइंट में जानें कोर्ट ने CBI को कैसे 'रगड़ा'
राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा कि एक्साइज पॉलिसी में कोई साजिश नहीं थी और CBI का केस सबूतों पर खरा नहीं उतरा. जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने इसे अनुमान और कमजोर गवाही पर आधिारित मामला करार दिया.
दिल्ली की राजनीति को हिला देने वाले चर्चित एक्साइज पॉलिसी केस में शुक्रवार को निर्णायक मोड़ आ गया. राउज एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और के. कविता समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले में किसी भी तरह की आपराधिक साजिश या दुर्भावनापूर्ण इरादे के ठोस सबूत नहीं मिले, जिससे पूरे केस की बुनियाद ही कमजोर साबित हुई.
इस फैसले में सबसे अहम बात यह रही कि जज ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. फैसले के मुताबिक आरोपों को तथ्यों के बजाय ‘अंदाजे’ और ‘कहानी’ के आधार पर गढ़ा गया, जो न्यायिक जांच में टिक नहीं सका. ऐसे में यह फैसला सिर्फ आरोपियों को राहत देने तक सीमित नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा संदेश माना जा रहा है. यही वजह है कि स्पेशल जज ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) द्वारा आरोपियों के खिलाफ शुरू किए गए केस को बंद करने का ऑर्डर पास किया. कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट शब्दों में कहा, "एक्साइज पॉलिसी में कोई बड़ी साजिश या क्रिमिनल इरादा नहीं था."
दिल्ली की अदालत ने सख्त लहजे में कहा, "अगर इस तरह के व्यवहार की इजाजत दी जाती है, तो यह संविधान के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन होगा. ऐसा व्यवहार जिसमें किसी आरोपी को माफी दे दी जाती है और फिर उसे सरकारी गवाह बना दिया जाता है. 15 प्वाइंट में जानें अदालत ने दिल्ली शराब घोटाले मामले में और क्या कहा?
1. बिना सबूत आरोपी बनाना जांच की विश्वसनीयता पर सवाल
राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा कि कुलदीप सिंह को आरोपी बनाने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिला. फिर भी उन्हें मुख्य आरोपी बनाना जांच की गंभीर खामी को दिखाता है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह की जांच से एजेंसी की क्रेडिबिलिटी प्रभावित होती है. निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित जांच को जरूरी बताया गया.
2. जांच पहले से तय और कोरियोग्राफ्ड
राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज (PC एक्ट) जितेंद्र सिंह ने साफ कहा कि जांच निष्पक्ष नहीं बल्कि पहले से तय स्क्रिप्ट के मुताबिक की गई. इससे निष्पक्ष जांच की बजाय कहानी फिट करने की कोशिश नजर आती है.
3. आरोपों को कहानी में फिट किया गया
कोर्ट के मुताबिक आरोप तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि पहले से बने नैरेटिव में फिट करने के लिए बनाए गए. यह जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. ऐसा क्यों किया गया, किसके कहने पर किया गया?
4. सस्पेक्ट और गवाह दोनों बनाना गलत
कुछ लोगों को चार्जशीट में एक साथ संदिग्ध और सरकारी गवाह के रूप में दिखा गया है. राउज एवेन्यू कोर्ट ने इसे गंभीर विरोधाभास और जांच में गड़बड़ी बताया. इस तरह की लापरवाही समझ से परे है. इस पर चार्जशीट पेश करने से पहले ध्यान क्यों नहीं दिया गया.
5. दोहरी रणनीति अपनाई गई
दिल्ली की कोर्ट ने कहा कि जांच अफसर ने ऐसा सिस्टम बनाया, जिससे केस फेल होने पर भी विकल्प बचा रहे. यानी जरूरत पड़ने पर उसी व्यक्ति को आरोपी बनाने की गुंजाइश रखी गई. ताकि खुद को बचाया जा सके.
6. जांच अधिकारी को केस की कमजोरी जानकारी थी
राउज एवेन्यू कोर्ट के अनुसार जांच अफसर शुरू से जानता था कि केस कमजोर है और अदालत में टिक नहीं पाएगा. इसी डर से जांच को लचीला और उलझा हुआ रखा गया. इसके पीछे कोई न कोई वजह तो होगी.
7. सच खोजने की बजाय खुद को बचाने की कोशिश
स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने कहा कि जांच का मकसद सच्चाई सामने लाना होना चाहिए था, लेकिन यहां ऐसा लगा कि अधिकारी खुद को बचाने के लिए काम कर रहा था. न कि जांच को अंजाम तक पहुंचाने के लिए.
8. जांच में हेरफेर के संकेत
दिल्ली की कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में जानबूझकर हेरफेर के संकेत दिए हैं. यह किसी भी निष्पक्ष जांच एजेंसी की साख के लिए गंभीर खतरा है. ऐसा करना किसी भी नजरिए से सही नहीं का जा सकता. जांच अफसर ने इस पर गौर क्यों नहीं फरमाया?
9. जवाबदेही तय करने की जरूरत
दिल्ली की कोर्ट ने जांच में बरती गई खामियों की वजह से CBI अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं. ताकि इस बात का पता चल सके कि उसने निष्पक्षता के साथ काम क्यों नहीं किया?
10. जांच का आधार स्पष्ट और निष्पक्ष होना चाहिए
दिल्ली की अदालत ने कहा कि जांच तथ्यों और सुसंगत विश्लेषण पर आधारित होनी चाहिए. भविष्य के विकल्प बचाने के लिए उलझी हुई जांच स्वीकार्य नहीं है. इसलिए विचाराधीन मामलों को आगे बढ़ाना उचित कैसे हो सकता है?
11. प्रॉसिक्यूशन का केस अदालत में टिक नहीं पाया
जज जितेंद्र सिंह ने कहा कि CBI का मामला न्यायिक जांच में टिक नहीं सका. सबूतों की कमी के कारण आरोप साबित नहीं हो पाए. ऐसे में अदालत के सामने चार्जशीट को खारिज करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.
12. सरकारी गवाह के बयान पर निर्भरता गलत
अदालत अपने आदेश में कहा कि CBI ने अपने केस के लिए मुख्य रूप से अप्रूवर के बयान पर भरोसा किया. यह तरीका कमजोर और अस्थिर जांच को दर्शाता है. सिर्फ अप्रूवर के बयान पर मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.
13. माफी देकर गवाह बनाना और फंसाना गलत
जांच अधिकारी द्वारा आरोपी को माफी देकर गवाह बनाना और उसके बयान से दूसरों को फंसाना गलत है. इसे संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया. ऐसा कोई भी सरकारी कर्मचारी कैसे कर सकता है.
14. बिना सबूत सरकारी कर्मचारी को आरोपी बनाना
दिल्ली की कोर्ट ने कहा कि कुलदीप सिंह को बिना पर्याप्त सबूत के आरोपी नंबर-1 बनाया गया. इसे गंभीर त्रुटि माना गया. इससे साफ है कि जांच के दौरान कई अहम पहलुओं पर गौर नहीं फरमाया गया.
15. जांच के बाद दोषी अफसरों पर कार्रवाई की सिफारिश
दिल्ली की अदालत ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की. यह कदम जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है. जो भी दोषी है, उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. ऐसा करना पूरी तरह से गलत है.




