Ground Report: सावधान! आजादपुर मंडी से घर आ रही है सब्जी या बीमारी? गंदगी, सड़ांध और गंदे पानी के बीच बिक रही सब्जियां
आजादपुर मंडी में गंदगी, सड़ांध और जलभराव के बीच फल-सब्जियों की बिक्री हो रही है. ग्राउंड रिपोर्ट में सफाई व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और स्वास्थ्य जोखिम पर सवाल.
दिल्ली की आजादपुर मंडी को देश ही नहीं, एशिया की बड़ी फल और सब्जी थोक मंडियों में गिना जाता है. दिल्ली-एनसीआर की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था में इस मंडी की भूमिका कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा यहां रोज आने वाली फल-सब्जियों की मात्रा और हजारों लोगों की आवाजाही से लगाया जा सकता है. मंडी के आढ़तियों की मानें तो आजादपुर मंडी में रोजाना करीब 7,000 से 8,000 टन फल और सब्जियां पहुंचती हैं. अलग-अलग वर्षों और मौसम के हिसाब से यह आंकड़ा काफी ऊपर-नीचे भी रहा है.
एपीएमसी के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार औसतन कई दिनों में 8,500 टन से अधिक और कुछ समय में 11,000 टन से ज्यादा फल-सब्जियों की रोजाना आवक दर्ज हुई है. यानी यह वह मंडी है जहां से हर दिन भारी मात्रा में फल और सब्जियां निकलकर दिल्ली और आसपास के इलाकों की दुकानों, बाजारों और रसोइयों तक पहुंचती हैं.
चौंकाने वाली बात यह है कि जिस मंडी पर करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की खाद्य जरूरतें निर्भर हैं, उसकी जमीनी तस्वीर चिंता पैदा करती है. मंडी में जगह-जगह कूड़ा, सड़ती सब्जियों के अवशेष, गंदा पानी, नालियों की बदबू और बारिश के बाद जलभराव की शिकायतें सामने आती हैं. कारोबार चलता रहता है, ट्रक आते-जाते रहते हैं, मजदूर सामान ढोते रहते हैं और इसी बीच कई जगह फल और सब्जियां गंदगी के बेहद करीब रखी दिखाई देती हैं.
सवाल सिर्फ सफाई का नहीं है. सवाल सब्जियां और फलों की उस चेन का है, जिसका अंतिम सिरा दिल्ली के आम परिवार की रसोई तक पहुंचता है. अगर थोक मंडी का वातावरण ही गंदगी, सड़ांध और जलभराव से घिरा हो तो उपभोक्ता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह घर में सब्जी ला रहा है या बीमारी का जोखिम?
1977 में बनी मंडी, आज भी बुनियादी सुविधाओं का संकट
आजादपुर एपीएमसी की स्थापना 1977 में हुई थी और इसका उद्देश्य फल-सब्जी के थोक कारोबार को व्यवस्थित करना था. आज भी एपीएमसी की वेबसाइट पर यहां आने वाले फलों और सब्जियों की आवक तथा बाजार से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराए जाते हैं. मंडी में आलू, प्याज, टमाटर, बैंगन, गोभी, खीरा, अदरक, लौकी, भिंडी, नींबू, मटर, कद्दू, मूली, पालक, शिमला मिर्च और तोरी जैसी सब्जियों के साथ सेब, केला, अमरूद, मौसंबी, पपीता, अनानास और तरबूज जैसे फलों का कारोबार होता है. एपीएमसी अलग-अलग वर्षों के लिए फल और सब्जियों की मासिक तथा वार्षिक आवक का रिकॉर्ड भी प्रकाशित करता है.
रोजाना 50 से 60 तरह की सब्जियों से ज्यादा का कारोबार यहां से होता है. मौसम के साथ फलों और सब्जियों की आवक बदलती रहती है. सेब, केला, संतरा, आम, अंगूर, अनार, पपीता, तरबूज, खरबूजा, लीची, अमरूद और अनानास जैसे फलों के अलावा आलू, प्याज, लहसुन, अदरक, टमाटर, मटर, पालक, धनिया, हरी मिर्च, गाजर, मूली, भिंडी, शिमला मिर्च, गोभी, ब्रोकली, लौकी, तोरी और बैंगन जैसी सब्जियां बड़े पैमाने पर यहां पहुंचती हैं. मंडी में फल-सब्जियों के अलावा पैकिंग सामग्री, प्लास्टिक और लकड़ी के क्रेट, बोरियां तथा परिवहन से जुड़ा सामान भी लगातार आता-जाता रहता है.
यहां आने वाली उपज सिर्फ दिल्ली की नहीं होती. उपलब्ध अध्ययनों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से सेब, महाराष्ट्र से अंगूर, अनार और केले जैसे फल, जबकि नागालैंड और पश्चिम बंगाल से अनानास और अदरक जैसी उपज पहुंचती है. हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्य हरी सब्जियों की आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. मौसम और फसल के हिसाब से देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां फल-सब्जियों की आपूर्ति होती रहती है.
रोज करीब 3 हजार ट्रकों की आवाजाही
आजादपुर मंडी का पैमाना समझने के लिए यहां होने वाली रोजाना आवाजाही ही काफी है. 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक मंडी में करीब 50 हजार लोगों की रोजाना आवाजाही और लगभग 3,000 ट्रकों का आवागमन होता है. वहीं अन्य उपलब्ध अध्ययनों में पीक सीजन में ट्रकों की संख्या इससे अधिक होने का अनुमान भी दिया गया है. फल-सब्जियों की रोजाना आवक को एक ही स्थायी आंकड़े में बांधना सही नहीं होगा, क्योंकि मौसम, फसल, कीमत, मांग और परिवहन व्यवस्था के साथ मात्रा बदलती रहती है. उपलब्ध एपीएमसी और मीडिया रिकॉर्ड बताते हैं कि अलग-अलग समय में रोजाना आवक करीब 5,500 टन से लेकर 11,000 टन से ज्यादा तक रही है. मंडी की विभागीय रिपोर्ट में सामान्य परिस्थितियों में करीब 11,500 टन प्रतिदिन की आपूर्ति का उल्लेख है, जबकि दूसरे समय मंडी में 8,983 टन और 8,542 टन की दैनिक आवक दर्ज की गई थी.
आढ़तियों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. 2014 की रिपोर्टों में करीब 3,800 कमीशन एजेंट यानी आढ़तियों का जिक्र मिलता है. जबकि 2020 की रिपोर्ट में करीब 3,000 पंजीकृत कमीशन एजेंट बताए गए थे. इसलिए इन पुराने आंकड़ों में से किसी एक को वर्तमान संख्या बताना उचित नहीं होगा. इतना जरूर स्पष्ट है कि मंडी में आढ़तियों, थोक कारोबारियों, किसानों, ड्राइवरों, पल्लेदारों और खरीदारों का विशाल नेटवर्क काम करता है.
मंडी की असली तस्वीर उस वक्त सामने आती है, जब हजारों लोग और हजारों वाहन एक सीमित परिसर में लगातार सामान लेकर पहुंचते हैं. ट्रकों से माल उतरता है, पल्लेदार उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं, खराब फल-सब्जियां अलग होती हैं, खाली क्रेट और पैकिंग सामग्री निकलती है और दिनभर कचरा जमा होता रहता है. अगर इसी अनुपात में सफाई और कचरा प्रबंधन नहीं हो तो गंदगी का बढ़ना स्वाभाविक है.
Credit : State Mirror
बारिश हो या न हो, गंदगी और बदबू क्यों बनी रहती है?
मंडी के अधिकारियों का कहना है कि मंडी में गंदगी की समस्या को केवल बारिश से जोड़ना सही नहीं है. फल और सब्जियों के कारोबार में जैविक कचरा लगातार पैदा होता है. खराब टमाटर, सड़ी पत्तागोभी, गल चुके फल, पत्तियां, डंठल, मिट्टी, गत्ते, प्लास्टिक और पैकिंग सामग्री रोज निकलती है. यदि इन्हें समय पर अलग करके उठाया और प्रोसेस नहीं किया जाए तो यही कचरा नालियों को जाम कर सकता है और सफाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकता है.
यहीं से दूसरी समस्या शुरू होती है- जलनिकासी. नालियों में कचरा जमा होने, रास्तों की खराब सतह और भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण पानी की निकासी प्रभावित हो सकती है. बारिश होने पर यही पानी कूड़े और सड़े जैविक पदार्थों के साथ मिलकर बदबूदार कीचड़ और जलभराव में बदल जाता है. यानी सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि बारिश के दिन मंडी में पानी भरता है या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि बारिश नहीं होने पर भी अगर जैविक कचरा, सड़ी सब्जियां, प्लास्टिक और गंदगी जमा रहती है तो उसकी रोजाना निकासी और सफाई का सिस्टम कितना प्रभावी है.
प्रशासनिक दावे और जमीन की तस्वीर में कितना फर्क?
आजादपुर मंडी की बदहाल बुनियादी सुविधाओं की शिकायत कोई नई बात नहीं है. मई 2025 में दिल्ली सरकार की ओर से मंडी को साफ-सुथरा और आधुनिक बनाने की योजना की घोषणा की गई थी. इसमें अतिरिक्त सफाईकर्मियों की तैनाती, सड़कों, शेड और शौचालयों के सुधार, कचरा प्रबंधन के लिए कॉम्पेक्टर और ग्रीन-वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट लगाने तथा पानी की व्यवस्था जैसे कदम शामिल थे. सरकार ने मंडी की खराब सफाई, जर्जर सड़कों और शौचालयों की स्थिति पर भी चिंता जताई थी. यानी समस्या की पहचान प्रशासन के स्तर पर भी हो चुकी है. असली सवाल इसके बाद शुरू होता है: क्या घोषित व्यवस्था जमीन पर उसी गति से लागू हुई? यदि कचरा उठाने, नालियों की सफाई और जलनिकासी की नियमित व्यवस्था हो तो हर बारिश के बाद वही जगह कूड़े और गंदे पानी के तालाब में क्यों बदलती है?
गंदगी के बीच फल-सब्जी, कितना बड़ा है खतरा?
यही वह सवाल है जो इस पूरी ग्राउंड रिपोर्ट को सबसे ज्यादा गंभीर बनाता है, जिस सब्जी को परिवार की सेहत के लिए खरीदा जाता है, अगर वह गंदे पानी और सड़े कचरे के बीच रखी हो तो उसके सुरक्षित होने की गारंटी कौन देगा? गंदगी के बीच रखी गई हर सब्जी या फल को बीमारी फैलाने वाला कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. लेकिन दूषित पानी, सड़ा जैविक कचरा, मक्खियां, कीट और खराब स्वच्छता खाद्य पदार्थों के संदूषण का जोखिम बढ़ा सकते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दूषित भोजन बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या रासायनिक पदार्थों के कारण 200 से अधिक बीमारियों का कारण बन सकता है. इनमें दस्त, उल्टी, पेट दर्द और बुखार जैसी समस्याएं शामिल हैं.
दूषित पानी और भोजन से टाइफाइड और हैजा जैसी बीमारियों का खतरा भी जुड़ा है. टाइफाइड आमतौर पर दूषित भोजन या पानी से फैलता है, जबकि हैजा भी दूषित भोजन या पानी के सेवन से होने वाला गंभीर संक्रमण है. ऐसे में खाद्य पदार्थों के थोक बाजार में साफ पानी, स्वच्छ फर्श, कचरा प्रबंधन और खाद्य पदार्थों को गंदे पानी से दूर रखने की व्यवस्था महज सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा का हिस्सा है. लंबे समय तक जमा पानी मच्छरों के लिए प्रजनन स्थल बन सकता है. रुका हुआ पानी मच्छरों के अंडे देने की जगह बन सकता है और कचरा तथा खराब जलनिकासी वाली जगहों में मच्छर पनप सकते हैं. ऐसे वातावरण में डेंगू जैसे मच्छरजनित रोगों का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है.
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा. मंडी में गंदगी दिखना अपने आप किसी बीमारी के फैलने का प्रमाण नहीं है. किसी बीमारी का वास्तविक प्रकोप स्वास्थ्य विभाग की जांच और निगरानी से ही साबित होगा. फिर भी खाद्य पदार्थों के इतने बड़े थोक बाजार में खराब स्वच्छता, सड़ा कचरा और जलभराव को नजरअंदाज करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय जरूर है.
आजादपुर मंडी को सफाई नहीं, स्थायी सिस्टम चाहिए
आजादपुर मंडी की समस्या का समाधान केवल एक दिन झाड़ू लगाने या बारिश से पहले नाली साफ करने से नहीं होगा. करीब 3,000 ट्रकों की रोजाना आवाजाही और हजारों लोगों की मौजूदगी वाले बाजार में कचरा प्रबंधन को कारोबार की तरह व्यवस्थित करना होगा. जैविक और गैर-जैविक कचरे को अलग करना, खराब फल-सब्जियों को तुरंत हटाना, नालियों की नियमित डी-सिल्टिंग, जलभराव वाले स्थानों की पहचान, पर्याप्त कूड़ेदान, नियमित सफाई और कचरे की निगरानी जैसी व्यवस्था लगातार चलनी चाहिए.
सबसे जरूरी है जिम्मेदारी तय होना. सफाई का ठेका किसके पास है, कितने कर्मचारी तैनात हैं, कितनी बार सफाई होनी चाहिए, कचरा उठाने का रिकॉर्ड क्या है और जलभराव की शिकायत के बाद कितने समय में कार्रवाई होती है—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए. 2025 में सरकार ने मंडी में अतिरिक्त सफाईकर्मियों की तैनाती, कचरा प्रबंधन के लिए कॉम्पेक्टर और ग्रीन-वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट जैसी योजनाओं की बात कही थी. ऐसे में अब यह देखना जरूरी है कि इन घोषणाओं का कितना असर मंडी की जमीन पर दिखाई दे रहा है.
किसने क्या कहा?
मंटू : बदबू इतनी कि खड़ा रहना मुश्किल
“बारिश हो या न हो, मंडी में गंदगी की समस्या बनी रहती है. नालियों का पानी और कूड़ा कई जगह जमा रहता है. थोड़ी बारिश होते ही रास्तों पर पानी भर जाता है और बदबू इतनी तेज हो जाती है कि खड़ा रहना मुश्किल होता है. सबसे परेशानी की बात यह है कि इसी माहौल में हमें सब्जियां रखकर बेचनी पड़ती हैं. ग्राहक भी गंदगी देखकर नाराज होते हैं.”
दीपक : गंदगी का राज नई बात नहीं, सरकार को भी परवाह नहीं
आजादपुर मंडी में सफाई व्यवस्था ठीक नहीं है. कई जगह कूड़े के ढेर और गंदा पानी जमा रहता है. बारिश होने पर हालत और खराब हो जाती है. सब्जियां लेकर आने-जाने वाले लोगों को भी गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ता है. हम रोज इसी माहौल में काम करते हैं. सफाई नियमित हो तो मंडी का माहौल और यहां आने वाले लोगों की परेशानी काफी कम हो सकती है. लेकिन दिल्ली सरकार व अधिकारियों को इसकी कोई परवाह नहीं है.
सुनीता : सफाई नहीं अफसरों को पैसे से मतलब
हम लोग मजबूरी में इसी गंदगी के बीच सब्जियां बेचते हैं. मंडी में कई जगह बदबू और गंदा पानी रहता है. बारिश होते ही हालात ऐसे हो जाते हैं कि रास्ता पहचानना मुश्किल हो जाता है. ग्राहक भी कई बार शिकायत करते हैं कि इतनी गंदगी के बीच सब्जियां क्यों रखी हैं. लेकिन हमारे पास दूसरा विकल्प नहीं है. प्रशासन को नियमित सफाई और जलनिकासी पर ध्यान देना चाहिए.”
शकीला बेगम : गंदगी में काम करना मजबूरी
मंडी में सफाई सिर्फ कभी-कभार कर देने से समस्या खत्म नहीं होगी. यहां रोज कूड़ा निकलता है और उसे समय पर नहीं उठाया जाए तो चारों तरफ गंदगी फैल जाती है. बारिश के बाद गंदा पानी जमा होने से बदबू और बढ़ जाती है. हम सब्जी बेचकर परिवार चलाते हैं, लेकिन इसी गंदगी में बैठकर काम करना हमारे लिए भी मजबूरी है. व्यवस्था सुधरनी चाहिए.”
मणिकचंद : गंदगी के बीच सब्जी रखना मजबूरी
“आजादपुर मंडी देश की बड़ी मंडियों में है, लेकिन यहां सफाई की हालत देखकर लगता है कि इसकी तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा. बारिश में गंदा पानी और कूड़ा मिलकर तालाब जैसा बना देते हैं. सब्जी और फल इसी रास्ते से आते-जाते हैं और कई बार गंदगी के बीच ही सामान रखना पड़ता है. हम चाहते हैं कि नियमित सफाई हो और जलभराव की समस्या स्थायी रूप से खत्म की जाए.




