चीनी या देसी? लहसुन खरीदते वक्त कहीं आप भी तो नहीं खा रहे धोखा, क्यों छिड़ी बहस? 5 आसान तरीकों से करें असली की पहचान?
चीनी और भारतीय लहसुन की पहचान करना आसान है. आकार, रंग, कलियों, डंठल, खुशबू और स्वाद के जरिए दोनों में अंतर आसानी से पहचाना जा सकता है.
रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाला लहसुन पिछले कुछ दिनों से सिर्फ स्वाद और सेहत की वजह से चर्चा में नहीं है. बाजार में बिक रहे चीनी लहसुन को लेकर किसानों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं के बीच बहस तेज है. सवाल यह है कि जब चीन से लहसुन के आयात पर भारत में प्रतिबंध है, तो फिर इसकी खेपें देश के अलग-अलग हिस्सों तक कैसे पहुंच रही हैं? इतना ही नहीं, चीनी लहसन को लेकर ये भी बताया जा रहा है कि यह कैंसन और कई अन्य बीमारियों को भी इसके सेवन करने वालों के लिए न्योता दे रहा है.
दिल्ली के आजादपुर मंडी में लहसुन कारोबार से जुड़े व देश के बड़े आढ़ती जितेंद्र खुराना लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं. उनका दावा है कि प्रतिबंध के बावजूद चीन का लहसुन नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर के रास्तों से भारतीय बाजार में पहुंचाया जा रहा है. वह इसे केवल किसानों के कारोबार का मामला नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं की सेहत और देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक बता रहे हैं.
खुराना का दावा है कि देशभर में 20 लाख से ज्यादा किसान अलग-अलग नेटवर्क के माध्यम से उनसे जुड़े हैं. वह किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ चीनी लहसुन के खिलाफ भी अभियान चला रहे हैं. उनका कहना है कि उपभोक्ता को यह समझना जरूरी है कि वह बाजार से वास्तव में कौन-सा उत्पाद खरीद रहा है.
चीन के लहसुन पर कब लगा प्रतिबंध?
चीनी लहसुन के आयात को लेकर सबसे बड़ा भ्रम प्रतिबंध की तारीख को लेकर है. कई जगह 2014 में रोक लगाए जाने की बात सामने आती है, लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक चीन से लहसुन के आयात पर प्रतिबंध 6 सितंबर 2005 से लागू है.
सरकार के अनुसार चीन से आने वाले लहसुन के नमूनों में पौधों के लिए गंभीर माने जाने वाले Embellisia alli और Urocytis cepulae जैसे फंगस पाए गए थे. इसी तरह के क्वारंटीन जोखिम के कारण आयात पर रोक लगाई गई थी. इसलिए इसे केवल खाद्य बीमारी से जोड़ना सही नहीं होगा.
प्रतिबंध के बाद भी भारतीय बाजार में कैसे?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है. सरकारी जवाब के मुताबिक प्रतिबंधित माल की तस्करी रोकने के लिए सीमा शुल्क विभाग और डीआरआई कार्रवाई करते हैं. इसके बावजूद अलग-अलग सीमावर्ती इलाकों से चीनी लहसुन पकड़े जाने की खबरें सामने आती रही हैं.
2023-24 में सीमा शुल्क और डीआरआई ने 546 मीट्रिक टन चीनी लहसुन जब्त किया. 2024-25 में यह मात्रा 507 मीट्रिक टन बताई गई. खुराना का दाव है कि 2025 में 5,000 ट्रक चीनी लहसन भारतीय बाजारों में स्मगलिंग के जरिए डंप किया गया है. इसका मतलब यह नहीं कि इतनी ही मात्रा देश में पहुंची, बल्कि ये वे खेप हैं जिन्हें जांच एजेंसियों ने पकड़कर जब्त किया.
जितेंद्र खुराना का आरोप है कि नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर राज्यों के रास्तों का इस्तेमाल करके चीन का लहसुन भारत में लाया जा रहा है. उन्होंने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात के दौरान करीब 5,000 ट्रकों में लहसुन भारत में डंप किए जाने का दावा भी किया था. यह आंकड़ा उनका दावा है, इसलिए इसे सरकारी रूप से प्रमाणित आंकड़ा नहीं माना जा सकता.
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जितेंद्र खुराना का परिवार चार पीढ़ियों से लहसुन और प्याज के कारोबार से जुड़ा बताया जाता है. उनके पूर्वज हुकुम चंद खुराना और स्वर्गीय धर्मवीर खुराना ने आजादपुर मंडी से कारोबार शुरू किया था. अब उनके बेटे सर्वज्ञ खुराना भी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं.
जितेंद्र खुराना का कहना है कि केंद्रीय वाणित्य मंत्री पीयूष गोयल से भी मुलाकात इस मसले को लेकर हुई थी. उन्होंने चीनी लहसन को भारतीय बाजारों में डंप करने और खतरों को लेकर गंभीर चिंता जताई. उसके बाद जांच एजेंसियों ने लहसन जब्त भी किए हैं. उन्होंने कहा कि इस दिशा में सरकार प्रभावी कदम उठाएगी. ताकि भारतीय किसानों और कारोबारियों के हित प्रभावित न हों.
सेहत को लेकर क्या है असली चिंता?
चीनी लहसुन के स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर सबसे ज्यादा बातें सोशल मीडिया और बाजार में सुनने को मिलती हैं. इसमें जहरीले रसायन, ब्लीच, भारी धातु, फंगस और कीटनाशक होने जैसे दावे किए जाते हैं.
लेकिन यहां सावधानी जरूरी है. उपलब्ध सरकारी सामग्री में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि चीन का हर लहसुन खाने से कैंसर, लिवर या किडनी की बीमारी होती है. इसलिए किसी एक देश में पैदा हुए पूरे उत्पाद को सीधे कैंसरकारी कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा.
अगर किसी विशेष खेप में तय सीमा से अधिक कीटनाशक अवशेष, भारी धातु या अन्य दूषित तत्व पाए जाते हैं, तो उसकी पुष्टि प्रयोगशाला परीक्षण से करनी होगी. यही वजह है कि स्वास्थ्य संबंधी दावों को तथ्य और आरोप के बीच अलग-अलग समझना जरूरी है.
फिर चीनी लहसुन को लेकर डर क्यों?
खुराना और इस मुद्दे को उठाने वाले अन्य लोगों की चिंता मुख्य रूप से उस उत्पाद को लेकर है, जो गैरकानूनी तरीके से देश में प्रवेश करता है और जिसकी पूरी सप्लाई चेन की निगरानी नहीं हो पाती.
उनका सवाल है कि यदि कोई खेप आधिकारिक आयात प्रक्रिया से नहीं गुजरती, तो उसकी गुणवत्ता, स्रोत, भंडारण और इस्तेमाल किए गए रसायनों की जांच कैसे होगी? यही वजह है कि वह उपभोक्ताओं से सजावटी रूप से सुंदर दिखने वाले लहसुन के बजाय उसके स्रोत और गुणवत्ता पर ध्यान देने की अपील करते हैं.
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चीनी और देसी लहसुन की पहचान कैसे करें?
बाजार में दोनों को देखकर अंतर समझना हमेशा आसान नहीं होता. फिर भी कुछ सामान्य संकेत मदद कर सकते हैं.
1. आकार से पहचानें: चीनी लहसुन की कलियां आमतौर पर बड़ी और एक समान आकार की होती हैं. भारतीय लहसुन की कलियां छोटी और अलग-अलग आकार की मिलती हैं.
2. रंग देखें: चीनी लहसुन की बाहरी परत अक्सर चमकीली सफेद दिखाई देती है. भारतीय लहसुन का रंग सफेद के साथ हल्का गुलाबी या बैंगनी भी हो सकता है.
3. कलियों की बनावट: चीनी लहसुन में अक्सर कम और मोटी कलियां होती हैं. भारतीय लहसुन में कई छोटी कलियां एक साथ जुड़ी होती हैं.
4. डंठल पर ध्यान दें: भारतीय लहसुन में डंठल और जड़ों के निशान अधिक स्पष्ट दिख सकते हैं. चीनी लहसुन आमतौर पर ज्यादा साफ-सुथरा और मशीन से तैयार किया हुआ नजर आता है.
5. खुशबू और स्वाद: भारतीय लहसुन की खुशबू और स्वाद सामान्यतः ज्यादा तेज और तीखा होता है. चीनी लहसुन की महक अपेक्षाकृत हल्की हो सकती है. इसके अलावा, भारतीय लहसुन में हल्का गुलाबी, बैंगनी या मिट्टी जैसा प्राकृतिक रंग दिखाई दे सकता है. अत्यधिक सफेद और चमकदार दिखने वाले उत्पाद को देखकर तुरंत विदेशी मान लेना भी सही नहीं है, क्योंकि हिमाचल, कश्मीर और दूसरे पहाड़ी क्षेत्रों में भी बड़े आकार का उच्च गुणवत्ता वाला लहसुन पैदा होता है. इसलिए सिर्फ आकार देखकर फैसला करना ठीक नहीं होगा.
किसानों को क्यों हो रहा नुकसान?
लहसुन की खेती करने वाले किसानों की सबसे बड़ी चिंता कीमत को लेकर है. अगर कम कीमत वाला प्रतिबंधित या अवैध माल बाजार में आता है, तो घरेलू उत्पाद पर दबाव पड़ सकता है. हालांकि, चीनी लहसन भारतीय बाजार में कम कीमत में नहीं बल्कि ज्यादा कीमत में बेचा जा रहा है, जबकि यह सेहत के लिए भी नुकसान देह है.
मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में किसान लहसुन की खेती करते हैं. कारोबारियों का कहना है कि बाजार में सस्ता विदेशी माल आने से स्थानीय किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलने में परेशानी हो सकती है.
जितेंद्र खुराना का तर्क है कि भारत अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने की क्षमता रखता है. इसलिए प्रतिबंधित रास्तों से विदेशी माल आने के बजाय देश के किसानों की उपज को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.
जैविक खेती पर भी जोर
जितेंद्र खुराना किसानों को जैविक खेती की ओर जाने के लिए भी जागरूक करने की बात कहते हैं. उनकी सलाह में खेतों में गोबर और गोमूत्र के इस्तेमाल का उल्लेख है. किसान यदि मिट्टी की जांच करवाकर जरूरत के मुताबिक खेती करें और प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल करें, तो उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है. हालांकि जैविक खेती के हर तरीके का लाभ खेत, मिट्टी और फसल के अनुसार अलग हो सकता है.
सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए?
चीनी लहसुन के अवैध प्रवेश को रोकने के लिए प्लांट क्वारंटीन व्यवस्था, सीमा शुल्क विभाग और डीआरआई काम करते हैं. सरकार ने सभी संबंधित प्लांट क्वारंटीन स्टेशनों को अवैध आयात रोकने के निर्देश दिए हैं.
इसके अलावा सीमा क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, संदिग्ध खेपों की जांच करने और जब्ती की कार्रवाई करने के मामले सामने आए हैं. खाद्य सुरक्षा से जुड़ी शिकायतों पर एफएसएसएआई और राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों को भी निगरानी के निर्देश दिए गए हैं.
जितेंद्र खुराना का दावा क्या?
खुराना का कहना है कि चीनी लहसुन के खिलाफ अभियान चलाने की वजह से उन्हें धमकियां मिली हैं और एक बार उन पर हमला भी हुआ. उन्होंने इसके पीछे लहसुन कारोबार से जुड़े कुछ लोगों का हाथ होने की आशंका जताई है.
सेलिब्रिटीज को लेकर भी किया बड़ा दावा
खुराना का कहना है कि बाजार में सुंदर, बड़ा और चमकदार उत्पाद देखकर लोग उसे बेहतर मान लेते हैं. उनका दावा है कि बड़े घरों और सेलिब्रिटीज तक भी इसी वजह से ऐसा लहसुन पहुंच सकता है.
हालांकि, किसी व्यक्ति या वर्ग को चीनी लहसुन का बड़ा खरीदार बताने के लिए अलग से ठोस बाजार आंकड़ों की जरूरत होगी. केवल धारणा के आधार पर इसे प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता.
चीन पर खुराना का बड़ा आरोप
जितेंद्र खुराना इस मुद्दे को सिर्फ लहसुन के कारोबार तक सीमित नहीं मानते. उनका आरोप है कि चीन सीधे युद्ध के बजाय ऐसे उत्पादों के माध्यम से भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने और लोगों की सेहत से खेलने की कोशिश कर रहा है.
यह उनका राजनीतिक और कारोबारी विश्लेषण है. इसे स्थापित तथ्य के तौर पर पेश करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण जरूरी होंगे.
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ग्राहक खरीदारी के समय क्या सावधानी रखें?
लहसुन खरीदते समय केवल चमकदार सफेद रंग देखकर फैसला न करें. स्थानीय किसान, भरोसेमंद विक्रेता या विश्वसनीय सप्लायर से खरीदारी करना बेहतर विकल्प हो सकता है.
उत्पाद का रंग, डंठल, बनावट, गंध और स्वाद देखें. बहुत ज्यादा सफेद दिखने वाली हर गांठ को विदेशी मानना भी ठीक नहीं है और हर बड़े आकार के लहसुन को खराब समझना भी गलत होगा.
सबसे अहम बात यह है कि प्रतिबंधित उत्पाद की पहचान के लिए केवल घरेलू नजर पर निर्भर रहने के बजाय प्रमाणित सप्लाई चेन और सरकारी जांच व्यवस्था पर भरोसा किया जाए.
चीनी लहसन को लेकर सवाल क्या?
चीनी लहसुन को लेकर विवाद की जड़ में तीन बड़े सवाल हैं- प्रतिबंध के बावजूद इसकी खेपें भारत तक कैसे पहुंचती हैं, इनकी निगरानी कितनी प्रभावी है और इससे भारतीय किसानों पर कितना असर पड़ता है.
सरकारी रिकॉर्ड यह जरूर दिखाता है कि प्रतिबंधित चीनी लहसुन की खेपें जब्त की गई हैं. लेकिन इसके हर स्वास्थ्य नुकसान को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध मान लेना सही नहीं होगा. वहीं जितेंद्र खुराना लगातार किसानों और उपभोक्ताओं को इस मुद्दे पर जागरूक करने की मुहिम चलाने का दावा करते हैं.
ऑनलाइन कंपनियां चीनी लहसुन क्यों नहीं खरीदतीं?
लहसन के एक अन्य व्यापारी हेमराज शर्मा का कहना है कि ब्लिंकिट, स्विगी इंस्टामार्ट, बिगबास्केट जैसी ऑनलाइन कंपनियां प्रतिबंधित चीनी लहसुन को जानबूझकर खरीदकर बेच नहीं सकतीं. भारत में चीन से लहसुन का आयात 6 सितंबर 2005 से प्रतिबंधित है. ऐसी कंपनियों को खाद्य सुरक्षा और वैध सप्लाई चेन के नियमों का पालन करना होता है. प्रतिबंधित या अवैध तरीके से आया लहसुन उनकी सप्लाई चेन में मिलने पर कानूनी कार्रवाई, माल जब्ती और लाइसेंस संबंधी जोखिम पैदा कर सकता है.
इसके अलावा कंपनियां आमतौर पर अधिकृत भारतीय किसानों, मंडियों और लाइसेंस प्राप्त सप्लायरों से खरीद करती हैं, जिससे उत्पाद की ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके.




