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कभी जंगल में उठाती थीं हथियार, अब कोसा सिल्क पहन रैंप पर उतरीं तो तालियों से गूंज उठा ऑडिटोरियम, कहानी 9 पूर्व महिला माओवादियों की

छत्तीसगढ़ के रायपुर में नौ आत्मसमर्पण कर चुकीं महिला माओवादियों ने कोसा सिल्क और पारंपरिक हैंडलूम परिधान पहनकर फैशन रैंप पर कदम रखा. कभी बस्तर के जंगलों में हथियार उठाने वाली इन महिलाओं ने पुनर्वास के बाद आत्मविश्वास के साथ नई जिंदगी की शुरुआत का संदेश दिया.

From Forests to the Fashion Ramp: 9 Former Women Maoists Begin a New Life
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रैंप पर उतरीं 9 पूर्व महिला माओवादी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम की रोशनी धीमी होती है. संगीत शुरू होता है. सामने सजी हुई फैशन रैंप पर एक-एक कर नौ महिलाएं कदम रखती हैं. उनके चेहरे पर मुस्कान है, चाल में आत्मविश्वास है और शरीर पर छत्तीसगढ़ की पहचान कही जाने वाली कोसा सिल्क और पारंपरिक हैंडलूम की पोशाक.

ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठता है. पहली नजर में यह किसी सामान्य फैशन शो जैसा ही लगता है... लेकिन इन नौ महिलाओं की कहानी इस मंच को असाधारण बना देती है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये वे महिलाएं हैं, जो कभी बस्तर के घने जंगलों में माओवादी आंदोलन का हिस्सा थीं. जिनकी जिंदगी में कभी हथियार, जंगल और संघर्ष था। आज वही महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर पेशेवर मॉडल्स के साथ रैंप पर चल रही थीं.

यह सिर्फ कपड़ों का प्रदर्शन नहीं था. यह एक जिंदगी के दूसरी जिंदगी में बदलने की कहानी थी.

जंगल से रैंप तक का सफर

इन नौ महिलाओं में से सात ने पड़ोसी राज्य तेलंगाना के हैदराबाद में आत्मसमर्पण किया था. एक ने छत्तीसगढ़ के सुकमा और एक ने तेलंगाना के मुलुगु में आत्मसमर्पण किया. पिछले करीब डेढ़ साल के दौरान उन्होंने हिंसा और माओवादी संगठन से अलग होकर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया. फिलहाल ये सभी महिलाएं सुकमा के पुनर्वास केंद्र में रह रही हैं.

इनकी कहानी का एक और पहलू बेहद महत्वपूर्ण है. माओवादी संगठन में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 35 से 40 फीसदी तक रही है. इनमें से कई महिलाओं की भर्ती कम उम्र में ही कर ली गई थी. यानी जिन जंगलों को उन्होंने अपना घर समझकर जाना, वहां तक पहुंचने का फैसला हमेशा उनका अपना नहीं था. अब उनकी जिंदगी का रास्ता बदल चुका है.

सात दिन की ट्रेनिंग और पहली बार रैंप पर कदम

रायपुर आने से पहले इन महिलाओं के लिए एक सप्ताह का ग्रूमिंग और ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित किया गया. उन्हें बॉडी लैंग्वेज, रैंप वॉक और प्रस्तुति के तौर-तरीके सिखाए गए. मुंबई से आए एक प्रोफेशनल ट्रेनर ने उन्हें रैंप पर चलने की ट्रेनिंग दी...

सिर्फ सात दिन. लेकिन इन सात दिनों का महत्व शायद कैलेंडर के सात पन्नों से कहीं ज्यादा था... क्योंकि इन महिलाओं ने पहली बार एक ऐसी दुनिया में कदम रखा, जहां उनके हाथ में हथियार नहीं था. उनके सामने कोई जंगल नहीं था। सामने रोशनी थी, दर्शक थे, संगीत था और एक मंच था, जिस पर उन्हें खुद को पेश करना था.

22 साल की पुनम ज्योति के लिए यह अनुभव शायद सबसे अलग था. सुकमा के चिंतागुफा क्षेत्र के एलमगुंडा गांव की रहने वाली ज्योति ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी जिंदगी में ऐसा दिन आएगा, जब वह रैंप पर सिल्क की पोशाक पहनकर चलेंगी और लोग उनके लिए तालियां बजाएंगे... लेकिन 7 अगस्त को यह कल्पना हकीकत बन गई.

जब कोसा सिल्क सिर्फ कपड़ा नहीं रहा

यह आयोजन नेशनल हैंडलूम डे के मौके पर हुआ था. मंच पर छत्तीसगढ़ की पारंपरिक बुनाई और कोसा सिल्क को प्रदर्शित किया जा रहा था. पेशेवर मॉडल्स के साथ इन नौ महिलाओं ने भी पारंपरिक परिधानों को प्रस्तुत किया.

और यहीं इस पूरे आयोजन का सबसे खूबसूरत अर्थ छिपा था. जिन हाथों ने कभी हथियार उठाए थे, वही हाथ अब सिल्क की साड़ी और पारंपरिक कपड़ों को संभाल रहे थे. जिन कदमों ने कभी जंगलों के कठिन रास्ते तय किए थे, वही कदम अब रैंप की सीधी रोशनी में बढ़ रहे थे... और जिन चेहरों से कभी संघर्ष और डर जुड़ा था, उन चेहरों पर अब मुस्कान थी.

यह बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं था. यह पहचान वापस पाने की कोशिश थी. आत्मसमर्पण के बाद असली चुनौती शुरू होती है. किसी हथियारबंद संगठन से बाहर आना किसी व्यक्ति की कहानी का अंत नहीं होता. असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है- जब उसे सामान्य समाज में वापस अपनी जगह बनानी होती है.

सुकमा का पुनर्वास केंद्र इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए सरकार की ओर से पुनर्वास और कौशल विकास के अवसर दिए जा रहे हैं, ताकि वे सम्मानजनक आजीविका हासिल कर सकें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें.

और यही वह जगह है, जहां पुनर्वास शब्द का वास्तविक अर्थ समझ आता है.पुनर्वास सिर्फ जंगल से किसी व्यक्ति को बाहर निकालना नहीं है. पुनर्वास का मतलब है- उसे भविष्य देना. उसे कोई हुनर देना. उसे यह भरोसा देना कि उसकी पहचान उसके अतीत से आगे भी हो सकती है.

तालियां सिर्फ फैशन शो के लिए नहीं थीं

जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में तालियां गूंजीं, तो वे सिर्फ खूबसूरत कपड़ों या रैंप वॉक के लिए नहीं थीं. वे उन नौ महिलाओं के लिए थीं, जिन्होंने अपनी जिंदगी का रास्ता बदला. उनके लिए, जिन्होंने जंगल छोड़कर समाज में लौटने का फैसला किया. उनके लिए, जिन्होंने कभी हथियार उठाए थे और अब अपने हाथों में एक नई पहचान थाम ली है... और शायद उन सभी लोगों के लिए भी, जो यह मानते हैं कि किसी इंसान की कहानी उसके अतीत पर खत्म नहीं होती.

पुनम देवें, मेडवी गंगी, मड़वी देवें, पूनम ज्योति... और उनके साथ पांच अन्य महिलाएं. उनके नाम शायद आज हर घर में नहीं जाने जाते, लेकिन 7 अगस्त 2026 को उन्होंने रायपुर के उस मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

यह रैंप वॉक नहीं, एक शुरुआत थी. फैशन शो खत्म हो गया. रोशनी बुझ गई. संगीत रुक गया. दर्शक लौट गए... लेकिन उन नौ महिलाओं के लिए कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

असल कहानी अब शुरू होती है... क्योंकि जंगल से निकलकर रैंप तक पहुंचना सिर्फ एक दिन का सफर था.

आगे का रास्ता लंबा है. रोजगार, आत्मनिर्भरता, समाज में सम्मान और अपनी नई पहचान बनाने का रास्ता... लेकिन 7 अगस्त की वह शाम उन्हें एक बात जरूर बता गई- वे अपनी जिंदगी को दोबारा लिख सकती हैं. कभी जिस दुनिया में उनके हाथों में हथियार थे, उसी जिंदगी में अब उनके हाथ कोसा सिल्क थाम सकते हैं.

कभी जिन कदमों का रास्ता जंगल तय करता था, अब वही कदम अपना रास्ता खुद चुन सकते हैं... और शायद यही पुनर्वास की सबसे बड़ी सफलता है-किसी को सिर्फ हिंसा से दूर करना नहीं, बल्कि उसे ऐसा भविष्य देना जिसे वह अपना कह सके.

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