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BJP-JDU अब जुड़वा भाई! NDA सीट बंटवारे में कैसे सिकंदर बन गए मोदी के हनुमान? जीतन राम मांझी को लगी ये चोट

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए एनडीए ने सीट शेयरिंग का एलान कर दिया है. भाजपा और जेडीयू ने बराबर-बराबर 101-101 सीटें अपने लिए रखीं, जबकि चिराग पासवान की एलजेपी (आर) को 29 सीटें मिलीं. जीतनराम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा को छह-छह सीटें दी गईं. चिराग की मांग और पिछले चुनावों में उनके प्रभाव के चलते भाजपा-जेडीयू गठबंधन मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है, वहीं मांझी नाराज दिखे और उन्होंने कम सीटें मिलने पर प्रतिक्रिया दी.

BJP-JDU अब जुड़वा भाई! NDA सीट बंटवारे में कैसे सिकंदर बन गए मोदी के हनुमान? जीतन राम मांझी को लगी ये चोट
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( Image Source:  ANI )
सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी5 Mins Read

Updated on: 12 Oct 2025 11:24 PM IST

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने रविवार शाम को सीट शेयरिंग फॉर्मूला का एलान कर दिया. लंबे समय से चल रही अंदरूनी वार्ताओं के बाद बीजेपी और जेडीयू ने बराबर-बराबर यानी 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया. वहीं, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) को 29 सीटें मिलीं. इसके अलावा, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (HAM) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) को छह-छह सीटें मिलीं.

इस सीट बंटवारे के पीछे भाजपा-जेडीयू की रणनीति साफ है- चिराग पासवान को ज्यादा हिस्सेदारी देकर NDA में उनके प्रभाव को बढ़ाना, ताकि पिछले लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई हो सके. वहीं, मांझी को अपेक्षा से कम सीटें मिलने से उनके भीतर नाराजगी दिख रही है.

वही इस बार JDU और बीजेपी बराबर सीट पर चुनाव लड़ रही है जिसके बाद कहा जा रहा है कि न कोई बड़ा भाई नहीं यानी बिहार चुनाव में भाजपा और JDU जुड़वा भाई बन चुके है तो वहीं चिराग पासवान मोदी इस बार सिंकदर नजर आ रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन्हें पांच सीट मिली थी और उन्होंने पाचों सीट पर परचम लहराया था. इसी के साथ जीतन राम मांझी को इस बार एक सीट कम मिली तो पहले बोले हम सतुंष्ट है लेकिन फिर उनका बयान सामने आया. जिसमें उन्होंने कहा कि कम सीट का खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

चिराग पासवान की जीत- कैसे NDA में बना उनका दबदबा

चिराग पासवान ने शुरुआत में अपने दल के लिए 40 सीटों की मांग की थी. इसके बाद वे 30 सीटों पर अड़े रहे. भाजपा नेतृत्व को आखिरकार 29 सीटें देने पर मजबूर होना पड़ा. पिछली विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने के कारण चिराग ने NDA और खासकर जेडीयू को बड़ा नुकसान पहुंचाया था. जेडीयू को कई सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था, जिससे नीतीश कुमार को तीसरे नंबर की पार्टी से संतोष करना पड़ा.

चिराग ने इस बारे में कहा, 'मैं चाहता था कि नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री न बनें, जिसके लिए मैंने ईमानदारी से कोशिश की... लेकिन हम जनता द्वारा दिए गए जनादेश का सम्मान करते हैं. अगर यह हमारे हाथ में होता, तो हम हस्तक्षेप करते. लेकिन यह भाजपा और जेडीयू को दिया गया स्पष्ट जनादेश है और उन्हें ही फैसला लेना है.'

मांझी की नाराजगी- कम सीटें और बढ़ती चिंता

हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के सुप्रीमो और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने सीटों की घोषणा के बाद विरोध व्यक्त किया. उन्होंने कहा, “आलाकमान ने जो तय किया वो निर्णय सिर आंखों पर है. लेकिन 6 सीट देकर हमारे महत्व को कम करके आंका है, हो सकता है इसका खामियाजा NDA को भुगतना पड़े.”

मांझी पहले भी अपनी पार्टी के लिए कम से कम 15 सीटों की मांग कर रहे थे. उन्होंने इसकी सूची भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को सौंपी थी. कम सीटें मिलने पर उन्होंने NDA छोड़ने के संकेत भी दिए थे और कहा था कि वे 100 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने को तैयार हैं.

BJP-जेडीयू की रणनीति: खुद की कुर्बानी, चिराग की जीत

सूत्रों के अनुसार भाजपा और जेडीयू ने पहले 205 सीटें अपने लिए निर्धारित की थीं. चिराग पासवान को संतुष्ट करने के लिए दोनों दलों ने अपने हिस्से से कुछ सीटें कम कीं. इस तरह दोनों दल बराबर-बराबर 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. इसके अलावा, मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को 6-6 सीटें दी गई हैं.

बीजेपी ने चिराग को किसी भी हाल में NDA से दूर नहीं जाने दिया. इसके लिए पहले उन्हें 26 सीटों का ऑफर भी दिया गया, साथ ही भविष्य में राज्यसभा और एमएलसी सीट देने का आश्वासन भी दिया गया. लेकिन चिराग ने 30 से कम सीटों पर कोई समझौता नहीं किया.

राजनीतिक पारा गरम: सीट बंटवारे का असर

सीट बंटवारे के ऐलान के बाद बिहार की सियासत में हलचल बढ़ गई है. मांझी का विरोध और चिराग पासवान का दबदबा इस बार के विधानसभा चुनाव में NDA की ताकत और कमजोरियों को स्पष्ट रूप से दिखा रहा है. एनडीए के घटक दलों की रणनीति, सीटों की कुर्बानी और नेताओं के बीच जटिल समीकरण चुनावी नतीजों पर बड़ा असर डाल सकते हैं.

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