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Bihar में चर्चा में रहता है स्वास्थ्य मंत्रालय, मंगल पांडे से लेकर तेजप्रताप तक घिरे, अब क्यों निशाने पर नए मंत्री निशांत?

बिहार का स्वास्थ्य मंत्रालय फिर विवादों में है. मंगल पांडे और तेजप्रताप के बाद अब नए मंत्री निशांत कुमार की क्षमता और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं.

Bihar Health Ministry Nishant Kumar Mangal Pandey Tej Pratap
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बिहार का स्वास्थ्य मंत्रालय हमेशा राजनीति, विवाद और जनता के गुस्से के केंद्र में रहा है. कभी चमकी बुखार से बच्चों की मौत, कभी अस्पतालों में ऑक्सीजन और दवाओं की कमी, तो कभी डॉक्टरों की भारी कमी ने इस विभाग को लगातार कटघरे में खड़ा किया. 2015 में तेजप्रताप यादव स्वास्थ्य मंत्री बने तो उनके बयानों और कार्यशैली ने सुर्खियां बटोरीं, जबकि 2017 के बाद बीजेपी नेता मंगल पांडे के कार्यकाल में कोरोना प्रबंधन, अस्पतालों की बदहाली और भ्रष्टाचार के आरोप चर्चा में रहे. 2026 में अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिलने के बाद विपक्ष परिवारवाद और अनुभवहीनता का मुद्दा उठा रहा है.

दिलचस्प यह है कि बिहार सरकार लगातार नए मेडिकल कॉलेज, AIIMS और जिला अस्पतालों के विस्तार का दावा कर रही है, लेकिन जमीन पर स्वास्थ्य सेवाओं की हालत अब भी बड़ा राजनीतिक सवाल बनी हुई है. पटना में एम्स है पर सामान्य इलाज के लिए भी लोगों आज भी दिल्ली की ओर रुख करते हैं. क्या निशांत कुमार स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त बदहाली का इलाज कर पाएंगे.

बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय हमेशा चर्चा में क्यों?

बिहार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसलिए सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है क्योंकि यह सीधे आम जनता की जिंदगी से जुड़ा विभाग है और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है. 2019 में मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार (AES) से 150 से ज्यादा बच्चों की मौत ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था. कोरोना काल में अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और ICU की कमी को लेकर भी सरकार की भारी आलोचना हुई. कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों के हजारों पद खाली हैं. CAG रिपोर्टों और विपक्ष ने PHC, CHC और जिला अस्पतालों में भारी कमी का मुद्दा उठाया. कई बार अस्पतालों में चूहों द्वारा मरीजों को काटने, स्ट्रेचर और एंबुलेंस संकट जैसी घटनाएं भी सामने आईं. यही वजह है कि बिहार में स्वास्थ्य विभाग सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है.

मंगल पांडे से लेकर तेजप्रताप तक मंत्रालय सुर्खियों में क्यों?

साल 2015 में महागठबंधन सरकार बनने के बाद तेजप्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था. अपने कार्यकाल में वह कई बार विवादों में रहे. मार्च 2016 में विधान परिषद में दवा घोटाले को लेकर उनकी बीजेपी नेताओं से तीखी बहस हुई थी. उन्होंने तत्कालीन NDA सरकार पर दवा घोटाले का आरोप लगाया था, जिसके बाद सदन में हंगामा हो गया.

साल 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद बीजेपी नेता मंगल पांडे स्वास्थ्य मंत्री बने. उनके कार्यकाल में सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब सरकारी डॉक्टरों और एंबुलेंस को उनके सरकारी आवास पर तैनात करने का आरोप लगा. विपक्ष ने इसे सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग बताया. मंगल पांडे ने सफाई दी कि लोग इलाज के लिए उनके घर पहुंच रहे थे, इसलिए डॉक्टर तैनात किए गए थे.

इसके अलावा, 2025 में जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर ने मंगल पांडे पर एंबुलेंस खरीद और मेडिकल कॉलेज से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. वहीं NMCH में मरीज को चूहा काटने की घटना के बाद भी विपक्ष ने स्वास्थ्य विभाग पर बड़ा हमला बोला.

मैथिली ठाकुर ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर क्यों उठाए थे सवाल?

बीजेपी विधायक मैथिली ठाकुर ने फरवरी 2026 में बिहार विधानसभा में अपनी ही सरकार के स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र अलीनगर समेत कई इलाकों के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, दवाएं और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे से पूछा कि जब अस्पतालों में न डॉक्टर हैं और न मशीनें, तो गरीब मरीज आखिर इलाज कहां कराएं.

बहस के दौरान मैथिली ठाकुर मंत्री के जवाबों से नाराज दिखीं और उन्होंने कहा, “मैं आपके जवाबों से खुश नहीं हूं.” उनका कहना था कि विभाग सिर्फ कागजी आंकड़े दे रहा है, जबकि जमीनी हकीकत बेहद खराब है. सत्ता पक्ष के विधायक द्वारा अपनी ही सरकार के स्वास्थ्य मंत्री पर सवाल उठाने को विपक्ष ने भी बड़ा मुद्दा बनाया. यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं.

निशांत कुमार क्यों आये निशाने पर?

साल 2026 में निशांत कुमार को बिहार का स्वास्थ्य मंत्री बनाए जाने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई. निशांत कुमार लंबे समय तक राजनीति से दूर रहे और पेशे से इंजीनियर बताए जाते हैं. लेकिन सीधे बिहार के सबसे चुनौतीपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी मिलने पर विपक्ष ने इसे परिवारवाद करार दिया. सोशल मीडिया पर उनके बॉडी पोश्चर और शारीरिक बनावट को लेकर भी तंज कसे जा रहे हैं. कई पोस्ट में यह तक कहा गया कि “जो खुद अस्वस्थ दिखते हैं, वो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था क्या सुधारेंगे.”

इंडियन यूथ कांग्रेस के बीवी श्रीनिवास ने निशांत का एक वीडियो क्लिप पोस्ट कर मजाक उड़ाया है. उनके वीडियो क्लिप पर यूजर्स निशांत को लेकर तरह तरह के तंज कर रहे हैं. एक यूजर को लेकर सवाल उठाया है कि क्या वो पोलियो मरीज हैं? तो एक ने कहा कि इसकी तो खुद ही हालत खराब है. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर ऐसे ऐसे कमेंट हैं, आप पढ़कर परेशान हो जाएंगे.

हालांकि जेडीयू नेताओं का कहना है कि निशांत पढ़े-लिखे हैं और तकनीकी समझ रखते हैं. लेकिन उनके सामने चुनौतियां बेहद बड़ी हैं. बिहार में अभी भी डॉक्टरों की भारी कमी, अस्पतालों में बेड संकट, मेडिकल उपकरणों की कमी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा है. अगर निशांत कुमार स्वास्थ्य ढांचे में सुधार, डॉक्टर नियुक्ति और मेडिकल कॉलेज विस्तार को तेज करते हैं, तभी वे आलोचनाओं का जवाब दे पाएंगे. फिलहाल उनके नाम पर राजनीति ज्यादा और काम का इंतजार ज्यादा दिख रहा है.

बिहार में चिकित्सा सुविधाओं की हालत कैसी है?

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था देश के सबसे कमजोर स्वास्थ्य ढांचों में गिनी जाती रही है. राज्य में आबादी के मुकाबले डॉक्टर, अस्पताल और बेड की संख्या काफी कम है. कई रिपोर्टों में बताया गया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में 50 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं. CAG रिपोर्ट के मुताबिक कई PHC और CHC में बेड और डॉक्टरों की भारी कमी है. मरीजों को गंभीर इलाज के लिए पटना, दिल्ली या दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है.

हालांकि, सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में AIIMS पटना के विस्तार, IGIMS अपग्रेडेशन और नए मेडिकल कॉलेजों की शुरुआत की है. लेकिन जमीन पर आज भी एंबुलेंस संकट, जांच मशीनों की कमी और अस्पतालों में भीड़ बड़ी समस्या है. यही कारण है कि बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था चुनावी और राजनीतिक बहस का स्थायी मुद्दा बनी रहती है.

बिहार में कितने मेडिकल कॉलेज, सरकार की योजनाएं क्या?

बिहार में अभी सरकारी और निजी मिलाकर 20 से ज्यादा मेडिकल कॉलेज संचालित हो रहे हैं. इनमें AIIMS Patna, PMCH, NMCH, DMCH, ANMMCH गया और IGIMS जैसे बड़े संस्थान शामिल हैं. इसके अलावा छपरा, पूर्णिया, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, बक्सर और झंझारपुर समेत कई जिलों में नए मेडिकल कॉलेज निर्माणाधीन हैं.

राज्य सरकार “हर जिले में मेडिकल कॉलेज” मॉडल पर काम कर रही है. PMCH पुनर्विकास परियोजना को दुनिया के सबसे बड़े अस्पताल प्रोजेक्ट्स में शामिल बताया जाता है. आयुष्मान भारत, मुख्यमंत्री डिजिटल हेल्थ योजना और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर जैसी योजनाओं के जरिए ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने का दावा किया जा रहा है. सरकार ने MBBS सीटें बढ़ाने और नर्सिंग कॉलेज खोलने की भी योजना बनाई है. हालांकि विपक्ष का आरोप है कि भवन तो बन रहे हैं, लेकिन डॉक्टर और संसाधनों की कमी अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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