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Kisse Netaon Ke : 'न गांधी परिवार का सहारा, न जननेता', फिर भी असम के 13 साल CM, बिमल प्रसाद की अनकही कहानी

असम की राजनीति में कई बड़े नाम आए और चले गए, लेकिन बिमल प्रसाद चालिहा का नाम एक अलग ही तरह की कहानी कहता है. वे न तो गांधी परिवार के खास माने जाते थे, न ही उन्हें एक बड़े जननेता के रूप में देखा जाता था. फिर भी, उन्होंने 13 साल तक लगातार असम के मुख्यमंत्री पद पर बने रहकर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जो आज भी चर्चा का विषय है.

Kisse Netaon Ke : न गांधी परिवार का सहारा, न जननेता, फिर भी असम के 13 साल CM, बिमल प्रसाद की अनकही कहानी
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असम की राजनीति में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो शोर-शराबे से नहीं, बल्कि खामोशी से लिखी जाती हैं. बिमला प्रसाद चालिहा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. न वे बड़े जननेता थे, न ही दिल्ली की सत्ता के ताकतवर गलियारों में उनका दबदबा था, फिर भी वे 13 वर्षों तक असम के मुख्यमंत्री बने रहे. ऐसे दौर में जब असम में भाषा विवाद, घुसपैठियों का संकट और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था. यह कहानी सत्ता की चकाचौंध की नहीं, बल्कि उस नेता की है, जिसने बिना करिश्मे के, केवल प्रशासनिक पकड़, संतुलन और धैर्य के दम पर पूरे राज्य को संभाला. यही वजह है कि चालिहा की राजनीति को समझना, असम के उस दौर को समझने जैसा है जब फैसले भाषणों से नहीं, बल्कि फाइलों में लिए जाते थे.

राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक द मिराज आफ डॉन में बतौर सीएम बिमल प्रसाद चाहिला और उनके कामकाज का संक्षित में जिक्र है. वहीं वीबी सिंह पुस्तक 'असम : अ स्टडी इन पॉलि​टिकल डेवलपमें' और वी. वेंकट राव की बुक 'पॉलिटिक्स आफ नॉर्थ ईस्ट इंडिया' चाहिए के बारे में कुछ​ डिटेल में लिखा है. इन किताबों में पूर्व सीएम चालिहा के कार्यकाल (1957–1970) के दौर में उनकी भूमिका को कांग्रेस के कंसोलिडेशन और प्रशासनिक स्थिरता के रूप में समझाया गया है. जानें, इन पुस्तकों में और क्या है.


1. कौन थे बिमला प्रसाद चालिहा और क्यों दूसरों से अलग थे?

असम की राजनीति में बिमला प्रसाद चालिहा का नाम उन नेताओं में आता है, जो भीड़ से नहीं, बल्कि निर्णयों से पहचाने जाते हैं. 25 अक्टूबर 1912 को जन्मे चालिहा पेशे से वकील थे और राजनीति में उनका प्रवेश कांग्रेस संगठन के जरिए हुआ. वे न तो बड़े जनआंदोलन के नेता थे और न ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित चेहरा, लेकिन उनकी पहचान एक संतुलित और अनुशासित प्रशासक की थी. उनके व्यक्तित्व में शोर नहीं था, लेकिन स्थिरता थी; महत्वाकांक्षा नहीं दिखती थी, लेकिन जिम्मेदारी साफ नजर आती थी. यही वजह थी कि वे भीड़ की राजनीति में भले पीछे रहे, लेकिन सत्ता की राजनीति में भरोसेमंद बने रहे.

2. बिना करिश्मा और हाईकमान कनेक्शन के CM कैसे बने?

दरअसल, 1950 से 60 का दशक असम के लिए अस्थिरता का दौर था. कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, प्रशासनिक ढीलापन और सामाजिक तनाव ने राज्य को कमजोर कर रखा था. ऐसे समय में पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो टकराव कम करे और शासन संभाले. बिमला प्रसाद चालिहा उसी जरूरत का जवाब बनकर उभरे. वे न तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के करीबी माने जाते थे और न ही इंदिरा गांधी इनर सर्कल का हिस्सा थे, लेकिन उनकी प्रशासनिक छवि इतनी मजबूत थी कि उन्हें “सेफ च्वाइस” माना गया. यही कारण था कि वे मुख्यमंत्री बने और लंबे समय तक टिके भी रहे.

3. असम की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या?

साल 1957 में बिमला प्रसाद चालिहा ने सत्ता संभाली, तब असम कई स्तरों पर संघर्ष कर रहा था. भाषा का सवाल सबसे संवेदनशील था. असमिया बनाम बंगाली विवाद ने समाज को विभाजित कर रखा था. इसके साथ ही पूर्वी पाकिस्तान, जो बाद में बांग्लादेश बना, से लगातार प्रवासन हो रहा था, जिससे जमीन, रोजगार और पहचान पर दबाव सरकार पर बढ़ रहा था. आर्थिक रूप से राज्य पिछड़ा था, उद्योग सीमित थे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक समस्या हर साल संकट खड़ा करती थी. इन सभी चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना ही उनके नेतृत्व की असली परीक्षा थी.

4. चाहिला ने कौन से कठिन फैसले लिए?

पूर्व सीएम बिमल प्रसाद चालिहा के कार्यकाल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने लोकप्रियता से ज्यादा स्थिरता को प्राथमिकता दी. 1960 के दशक में उन्होंने असमिया भाषा को प्रशासन में मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए, जिसे सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के रूप में देखा गया, लेकिन इससे बंगाली भाषी समुदाय में असंतोष भी बढ़ा. कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए और उनकी सरकार पर “एक भाषा को थोपने” के आरोप लगे. इसी तरह प्रवासन के मुद्दे पर उन्होंने संतुलित नीति अपनाने की कोशिश की. न तो पूरी तरह सख्ती और न ही पूरी छूट. लेकिन यह संतुलन बनाना आसान नहीं था और यही मुद्दा आगे चलकर बड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि बना. यह वह दौर था, जब उन्हें हर फैसला सोच-समझकर लेना पड़ता था, क्योंकि एक गलत कदम पूरे राज्य को अस्थिर कर सकता था.


5. उनके समय में असम में क्या ठोस काम हुए?

अगर सीधे तौर पर पूछा जाए कि बिमला प्रसाद चालिहा ने कौन सा बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया, तो जवाब होगा, कोई एक “ब्रांडेड मेगा प्रोजेक्ट” नहीं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने विकास नहीं किया. उनके दौर में डिब्रुगढ यूनिवर्सिटी 1965 और असम अग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी 1969 जैसे बड़े संस्थान स्थापित कराए, जिन्होंने असम की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दी. गुवाहाटी रिफाइनरी जैसे औद्योगिक प्रोजेक्ट को राज्य स्तर पर सहयोग मिला, जिससे असम राष्ट्रीय ऊर्जा ढांचे से जुड़ गया. इसके अलावा, उन्होंने प्रशासनिक सुधार, ग्रामीण सड़कों का विस्तार, जिला स्तर पर शासन मजबूत करने और बाढ़ प्रबंधन की नीति की शुरुआत जैसे काम किए. उनके विकास मॉडल की खासियत थी - 'धीमी लेकिन टिकाऊ नींव.'

6. छवि को लेकर विवाद और नैरेटिव क्या रही?

बिमला प्रसाद चालिहा की छवि हमेशा दो हिस्सों में बंटी रही. एक वर्ग उन्हें ईमानदार, सख्त और दूरदर्शी प्रशासक मानता था, जिसने असम को स्थिरता दी. वहीं दूसरा वर्ग उन्हें जनता से दूर, कम संवाद करने वाला और टॉप-डाउन प्रशासन चलाने वाला नेता मानता था. भाषा नीति और प्रवासन के मुद्दों ने उनकी छवि को और विवादित बनाया. असमिया सांस्कृतिक समूह उन्हें अपनी पहचान का रक्षक मानते थे, जबकि कुछ अल्पसंख्यक और प्रवासी समुदायों में असुरक्षा की भावना भी रही. यही कारण है कि उनका कार्यकाल उपलब्धियों और विवादों का मिश्रण माना जाता है.

7. 13 साल तक सत्ता में कैसे टिके रहे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना करिश्मा और मजबूत राजनीतिक नेटवर्क के बिमला प्रसाद चालिहा इतने लंबे समय तक सत्ता में कैसे बने रहे. इसका जवाब उनकी कार्यशैली में छिपा है. वे टकराव से बचते थे, केंद्र के साथ संतुलन बनाए रखते थे और प्रशासन पर मजबूत पकड़ रखते थे. उनके खिलाफ असंतोष जरूर था, लेकिन उनके विकल्प के रूप में कोई मजबूत चेहरा सामने नहीं आया. यही उनकी राजनीतिक स्थिरता की कुंजी बनी. उनकी विरासत को अगर एक लाइन में समझें तो वे “silent builder” थे.

ऐसे नेता जिन्होंने असम को तेज रफ्तार विकास नहीं दिया, लेकिन एक मजबूत आधार जरूर दिया. उन्होंने संस्थान बनाए, प्रशासन को व्यवस्थित किया और राज्य को एक दिशा दी, जिस पर आगे की राजनीति और विकास खड़ा हुआ. उनकी कहानी यह बताती है कि राजनीति में हर सफलता शोर से नहीं आती, कुछ सफलताएं चुपचाप सिस्टम को मजबूत करके भी हासिल की जाती हैं.

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