किस्से नेताओं के: मजबूरी में मिली 93 दिन के लिए CM की कुर्सी - जोगेंद्र नाथ हजारिका की सत्ता की इनसाइड स्टोरी
Kisse Netaon Ke : असम की राजनीति के अस्थिर दौर में Jogendra Nath Hazarika को सिर्फ 93 दिनों के लिए मुख्यमंत्री पद मिला. यह कहानी सत्ता, गठबंधन और राजनीतिक मजबूरी की इनसाइड स्टोरी है, जहां नेतृत्व से ज्यादा हालात तय कर रहे थे कि कुर्सी कितनी देर टिकेगी. यह रिपोर्ट उसी दौर की सच्चाई और सत्ता संघर्ष को कहानीनुमा अंदाज में पेश करती है.
देश की आजादी के 78 साल में असम की राजनीति में कई चेहरे आए और गए, लेकिन कुछ नाम ऐसे रहे जिनके हिस्से सत्ता तो आई, पर स्थिरता नहीं मिली. ऐसी ही एक कहानी है Jogendra Nath Hazarika की, जिनकी मुख्यमंत्री कुर्सी सिर्फ 93 दिनों तक ही टिक सकी, लेकिन उस छोटे से सफर ने असम की राजनीति में कई बड़े सवाल छोड़ दिए.
यह वह दौर था जब सत्ता किसी मजबूत जनादेश से ज्यादा राजनीतिक मजबूरी और समझौतों पर टिकी थी. गोलाप बोरबोरा के बाद पैदा हुए खालीपन ने जब नेतृत्व की तलाश तेज की, तो हजारिका एक “सेफ विकल्प” के रूप में सामने आए. लेकिन कुर्सी मिलते ही उनके सामने चुनौतियों का ऐसा पहाड़ खड़ा हो गया, जिसमें फैसले कम और संघर्ष ज्यादा थे. यह कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि उस पूरे राजनीतिक दौर की है जहां सरकारें बनती कम और टूटती ज्यादा थीं और सत्ता स्थिरता से ज्यादा एक अस्थायी जिम्मेदारी बन चुकी थी.
उसी असम के पूर्व सीएम Jogendra Nath Hazarika का जिक्र डिटेल में किसी किताब में नहीं है. हां, असम की राजनीति, गठबंधन अस्थिरता और आपातकाल के बाद के दौर पर लिखे गए ऐतिहासिक व अकादमिक पुस्तकों में संदर्भ के रूप में जिक्र है. राजीव भट्टाचार्य की पुस्तक द मिराज ऑफ डॉन और और संजीब बरुआ की पुस्तक इन द नैम ऑफ नेशन और H.K. Barpujari की बुक A Comprehensive History of Assam में भी उनका जिक्र है.
1. असम की राजनीति उस दौर में इतनी अस्थिर क्यों थी?
जोगेंद्र नाथ हजारिका को कैसे बने, सीएम यह जानने से पहले, उन हालातों को जानना जरूरी है, जिसकी वजह से उन्हें सीएम का पद मिला. 1970 और 80 का दशक असम की राजनीति के लिए स्थिर सरकारों का नहीं, बल्कि लगातार टूटते गठबंधनों, बदलते राजनीतिक समीकरणों और जनांदोलनों के दबाव का समय था. वह दौर था, जब सत्ता किसी एक पार्टी के हाथ में टिकती नहीं थी, बल्कि हर कुछ महीनों में सरकारें बदलने का खतरा बना रहता था. राजनीतिक दलों के भीतर भी एकजुटता कमजोर थी और जो सीएम बनता था, उस पर बाहरी दबाव लगातार बढ़ रहा था.
इसी अस्थिर माहौल में मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी मजबूत सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि एक “अस्थायी जिम्मेदारी” बन चुकी थी. इसी पृष्ठभूमि में सबसे पहले नाम आता है Golap Borbora का, जिनकी सरकार को जनता पार्टी की लहर के बाद एक नई शुरुआत माना गया था, लेकिन यह शुरुआत ज्यादा देर तक टिक नहीं सकी.
2. Golap Borbora सीएम पद पर क्यों नहीं टिक पाए?
Golap Borbora की सरकार के असफल होने की सबसे बड़ी वजह बाहरी विरोध नहीं बल्कि आंतरिक टूट थी. केंद्र में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी हार गईं थीं और जनता पार्टी की सरकार थी, जो कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में सत्ता हासिल की थी, लेकिन वो खुद कई गुटों में बंटी हुई थी.
असम में विधायकों के बीच एकता की कमी थी, निर्णयों पर सहमति नहीं बन पाती थी और सरकार के भीतर ही सत्ता संघर्ष शुरू हो गया था. केंद्र में भी जनता पार्टी की स्थिति स्थिर नहीं थी, जिसका सीधा असर राज्यों की सरकारों पर पड़ रहा था.
असम जैसे राज्य में, जहां जातीय आंदोलन और सामाजिक असंतोष पहले से मौजूद था, वहां यह राजनीतिक अस्थिरता और भी खतरनाक साबित हुई. धीरे-धीरे सरकार का राजनीतिक आधार कमजोर होता गया और अंततः वह टिक नहीं पाई.
3. Golap Borbora के बाद असम में राजनीतिक खालीपन क्यों बन गया?
गोलाप बोरबोरा के इस्तीफे या सत्ता से हटने के बाद असम की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई जहां कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं था. कोई भी दल इतना मजबूत नहीं था कि स्थायी सरकार बना सके. यह वह स्थिति थी जब राजनीतिक दलों के पास बहुमत तो था, लेकिन विश्वास नहीं था. यही “विश्वास का संकट” असम की राजनीति का सबसे बड़ा संकट बन गया. इसी खालीपन ने आगे चलकर नए नेतृत्व की जरूरत पैदा की.
4. जोगेंद्र नाथ हजारिका को मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया?
इसी राजनीतिक संकट और नेतृत्व के अभाव के बीच सामने आते हैं Jogendra Nath Hazarika. उनका चयन किसी बड़े जनादेश या लोकप्रिय लहर का परिणाम नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह “समझौते की राजनीति” थी. उस समय राजनीतिक दलों और गुटों को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो कम विवादित हो, सभी गुटों को स्वीकार्य हो और संक्रमण काल को संभाल सके. इन्हीं कारणों से उन्हें एक “सेफ पॉलिटिकल चॉइस” माना गया, लेकिन यही सेफ विकल्प आगे चलकर सबसे कमजोर साबित हुआ.
5. क्या उन्हें असली सत्ता मिली थी या वे सिर्फ प्रतीक थे?
Jogendra Nath Hazarika के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह साफ हो गया कि वास्तविक सत्ता का संतुलन उनके हाथ में पूरी तरह नहीं था. सरकार चलाने के लिए तीन स्तरों पर समर्थन जरूरी था. विधायक, पार्टी गुट और प्रशासनिक मशीनरी. लेकिन इन तीनों में एकजुटता नहीं थी. फैसले राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर थे और हर कदम पर सहमति जुटाना जरूरी था. इस स्थिति में मुख्यमंत्री की भूमिका ज्यादा प्रशासनिक कम और “समन्वयक” ज्यादा बन गई थी.
6. 93 दिनों में सरकार गिरने की असली वजह क्या थी?
उनके 93 दिनों का कार्यकाल किसी एक घटना से नहीं गिरा, बल्कि धीरे-धीरे टूटते राजनीतिक विश्वास का परिणाम था. गठबंधन के भीतर मतभेद बढ़ते गए. विधायकों के समर्थन में अनिश्चितता बनी रही और हर महत्वपूर्ण निर्णय विवाद का कारण बनता गया.असम उस समय केवल राजनीतिक अस्थिरता ही नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलनों और क्षेत्रीय तनावों से भी गुजर रहा था. ऐसे माहौल में सरकार का टिकना पहले से ही मुश्किल था. धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि सरकार खुद अपने अस्तित्व को बचाने में व्यस्त हो गई और शासन पीछे छूट गया.
7. क्या परदे के पीछे कोई राजनीतिक खेल चल रहा था?
“परदे के पीछे कौन खेल रहा था” यह सवाल हमेशा उठता है, लेकिन वास्तविकता इससे ज्यादा जटिल थी. उस दौर में सत्ता किसी एक व्यक्ति या समूह के नियंत्रण में नहीं थी. केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक तनाव, जनता पार्टी के भीतर गुटबाजी, स्थानीय विधायकों के अलग-अलग समूह और असम आंदोलन का दबाव एक साथ था. ये सभी मिलकर सत्ता का समीकरण बदल रहे थे. इसलिए इसे किसी एक साजिश के रूप में देखना सही नहीं होगा, बल्कि यह कई ताकतों के टकराव का परिणाम था.
8. जोगेंद्र नाथ हजारिका को क्या काम करने का मौका मिला?
यह कहना कि उन्हें “कुछ करने का मौका ही नहीं मिला” पूरी तरह सही भी नहीं और पूरी तरह गलत भी नहीं. Jogendra Nath Hazarika के सामने चुनौती यह थी कि पहले सरकार को टिकाया जाए. उनका पूरा कार्यकाल इसी कोशिश में निकल गया कि प्रशासन पूरी तरह न टूटे, कानून व्यवस्था नियंत्रण में रहे और राजनीतिक संकट गहराए नहीं. बड़े सुधार या नीतिगत बदलाव के लिए न समय था और न राजनीतिक स्थिरता.
9. क्या उनका कार्यकाल केयरटेकर सरकार की तरह था?
जोगेंद्र नाथ हजारिका का 93 दिन का कार्यकाल असफलता से ज्यादा “संक्रमण काल” का उदाहरण माना जाता है. यह वह समय था जब असम की राजनीति एक ढांचे से दूसरे ढांचे में जा रही थी. Jogendra Nath Hazarika की भूमिका एक ऐसे नेता की थी जिसे स्थिरता लाने की जिम्मेदारी दी गई, लेकिन परिस्थितियाँ इतनी कमजोर थीं कि स्थिरता खुद एक चुनौती बन गई.
10. Jogendra Nath Hazarika की कहानी क्या बताती है?
Jogendra Nath Hazarika की कहानी असम की उस राजनीति को दर्शाती हैं जहां सत्ता व्यक्ति से ज्यादा परिस्थितियों के हाथ में थी. यह दौर दिखाता है कि, 'मजबूत नेता भी कमजोर व्यवस्था में टिक नहीं सकते, गठबंधन की राजनीति में स्थिरता सबसे बड़ी चुनौती होती है और सत्ता केवल कुर्सी नहीं, बल्कि भरोसे का संतुलन होती है.
11. 93 दिन की कुर्सी का असली सबक क्या?
जोगेंद्र नाथ हजारिका का 93 दिनों का कार्यकाल असम की राजनीति का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अध्याय है. यह कहानी बताती है कि राजनीति में केवल मुख्यमंत्री बन जाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके लिए मजबूत समर्थन, स्पष्ट रणनीति और स्थिर राजनीतिक जमीन जरूरी होती है. क्योंकि जब राजनीतिक आधार कमजोर हो और सत्ता समीकरण लगातार बदल रहे हों, तो सबसे स्वीकार्य चेहरा भी इतिहास के सबसे छोटे अध्याय में बदल सकता है.




