असम की किन 4 चीजों को मिला GI टैग? कैसे कारीगरों और बुनकरों को मिलेगा इससे लाभ, प्वॉइंट्स में जानें सबकुछ
असम की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हस्तशिल्प को बड़ी पहचान मिली है. भारत सरकार के GI रजिस्ट्री ने राज्य के चार ट्रेडिशनल चीजों को जीआई टैग दिया है. इनमें असम बिहू पेपा, देउरी हैंडलूम प्रोडक्ट्स, कार्बी आंगलोंग हैंडलूम प्रोडक्ट्स और असम बांस शिल्प शामिल हैं.
असम की किन 4 चीजों को मिला GI टैग
असम की पारंपरिक कला और संस्कृति को बड़ी पहचान मिली है. राज्य की 4 खास चीजों असम बिहू पेपा, देउरी हैंडलूम प्रोडक्ट्स, कार्बी आंगलोंग हैंडलूम प्रोडक्ट्स और असम बांस शिल्प को GI टैग दिया गया है. यह टैग उन प्रोडक्ट्स को मिलता है जो किसी खास इलाके की पहचान और परंपरा से जुड़े होते हैं.
GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पहचान और मजबूत होगी. इससे कारीगरों और बुनकरों को अपने सामान की बेहतर कीमत मिल सकेगी, नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और देश-विदेश के बाजारों में इनकी मांग बढ़ सकती है. इससे हजारों लोगों को रोजगार और कमाई के नए अवसर मिलने की उम्मीद है.
किन-किन चीजों को मिला GI टैग?
कार्बी आंगलोंग क्षेत्र अपने पारंपरिक हाथ से बुने कपड़ों के लिए जाना जाता है. यहां के बुनकर पीढ़ियों से विशेष डिजाइनों और पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की मौलिकता को कानूनी सुरक्षा मिलेगी.
2. असम बिहू पेपा
बिहू असम का सबसे प्रसिद्ध लोक उत्सव है और पेपा इस उत्सव में बजाया जाने वाला पारंपरिक वाद्य यंत्र है. यह आमतौर पर भैंस के सींग से बनाया जाता है और असम की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
3. असम बैंबू क्राफ्ट्स
असम के कारीगर बांस से विभिन्न उपयोगी और सजावटी वस्तुएं तैयार करते हैं. राज्य में बांस शिल्प की परंपरा काफी पुरानी है और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. जीआई टैग मिलने से इस कला को नई पहचान और बाजार मिलने की उम्मीद है.
4. देउरी हैंडलूम प्रोडक्ट्स
देउरी समुदाय की बुनाई कला अपनी अनोखी डिजाइन और पारंपरिक पैटर्न के लिए प्रसिद्ध है. इन कपड़ों में स्थानीय संस्कृति और जनजातीय विरासत की झलक दिखाई देती है. अब जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की पहचान और अधिक मजबूत होगी.
GI टैग से क्या होगा कारीगरों को फायदा?
जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है. इससे नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है और असली उत्पाद बनाने वाले कारीगरों को बेहतर कीमत मिल सकती है. साथ ही राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में इनकी मांग बढ़ने की संभावना भी रहती है.




