इत्र के कारोबारी से वोट बैंक की राजनीति तक : Assam में कहां खड़े हैं Badruddin Ajmal, घटा या बढ़ा सियासी असर?
इत्र के कारोबार से राजनीति में आए बदरुद्दीन अजमल कभी असम की राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाते थे. लेकिन बदलते समीकरणों में अब उनका असर घटा है या अभी भी वो किंगमेकर हैं. समझिए पूरा विश्लेषण.
असम की राजनीति में बदरुद्दीन अजमल एक ऐसा नाम हैं, जिनका असर सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने लंबे समय तक राज्य के वोट बैंक की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है. इत्र के कारोबारी से राजनीति में आए अजमल ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के जरिए खासकर मुस्लिम समुदाय के बीच मजबूत पकड़ बनाई और कई चुनावों में किंगमेकर की भूमिका निभाई. हालांकि, बदलते सियासी समीकरण, बीजेपी के उभार और वोट बैंक में आ रहे बदलावों ने उनकी स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है. ऐसे में बड़ा सवाल यही है, क्या अजमल अब भी असम की राजनीति में निर्णायक खिलाड़ी हैं या उनका प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है?
कैसे शुरू हुआ उनका सियासी सफर?
बदरुद्दीन अजमल (Badruddin Ajmal) असम की राजनीति का एक बड़ा नाम हैं, जिनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत इत्र (परफ्यूम) के कारोबार से की और धीरे-धीरे देश-विदेश में “अजमल परफ्यूम” ब्रांड को पहचान दिलाई. लेकिन 2000 के दशक में उन्होंने राजनीति में एंट्री ली और जल्द ही अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज बनकर उभरे.
AIUDF के जरिए कैसे बनाया मजबूत वोट बैंक?
2005 में उन्होंने All India United Democratic Front (AIUDF) की स्थापना की. इस पार्टी का मुख्य फोकस असम के मुस्लिम और खासकर बंगाली-भाषी मुसलमानों के मुद्दे रहे. कुछ ही सालों में AIUDF असम की दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बन गई. धुबरी, बरपेटा और करीमगंज जैसे इलाकों में अजमल का प्रभाव काफी मजबूत रहा, जहां उनका वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है.
क्या अजमल अभी भी असम की राजनीति में किंगमेकर हैं?
एक समय ऐसा था जब बिना बदरुद्दीन अजमल के समर्थन के सरकार बनाना मुश्किल माना जाता था. लेकिन पिछले कुछ चुनावों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हुआ है. असम में भारतीय जनता पार्टी के उभार और ध्रुवीकरण की राजनीति ने AIUDF के प्रभाव को सीमित कर दिया है. अब अजमल की भूमिका 'किंगमेकर' से ज्यादा क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेता तक सिमटती दिख रही है.
कांग्रेस के साथ गठबंधन ने फायदा दिया या नुकसान?
कांग्रेस के साथ अजमल का गठबंधन हमेशा चर्चा में रहा है. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-AIUDF गठबंधन बना, लेकिन इसका फायदा अपेक्षा के मुताबिक नहीं मिला. सियासी जानकारों का कहना है कि इस गठबंधन से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बढ़ा, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला. यही वजह है कि अब कांग्रेस भी अजमल से दूरी बनाकर चल रही है.
क्या मुस्लिम वोट बैंक में भी आई है दरार?
अजमल की सबसे बड़ी ताकत उनका मुस्लिम वोट बैंक रहा है.
लेकिन अब इसमें भी बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. युवा मतदाता और शिक्षित वर्ग अब सिर्फ पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर विकास और रोजगार के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके चलते AIUDF का पारंपरिक वोट बैंक थोड़ा बिखरता नजर आ रहा है.
2026 चुनाव में क्या भूमिका निभा सकते हैं अजमल?
2026 का चुनाव बदरुद्दीन अजमल के लिए करो या मरो जैसा हो सकता है. ऐसा इसलिए कि इस चुनाव में AIUDF अपने कोर वोट बैंक को फिर से एकजुट कर पाती है, तो अजमल एक बार फिर निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं. लेकिन अगर वोट और बंटा, तो उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता और घट सकती है.
क्या खत्म हो रहा है अजमल का सियासी प्रभाव?
ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी. अजमल अब भी असम के कई जिलों में मजबूत पकड़ रखते हैं और उनका कोर वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. हालांकि, बदलती राजनीति, नए मुद्दे और मजबूत विरोधी ताकतें उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुकी हैं.
कौन हैं बदरुद्दीन अजमल?
बदरुद्दीन अजमल असम के प्रमुख मुस्लिम नेता और AIUDF के संस्थापक हैं. उनका जन्म 1950 में हुआ और वे पेशे से इत्र कारोबारी रहे हैं. अजमल परफ्यूम के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. 2005 में राजनीति में आने के बाद उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज उठाई और जल्द ही असम की राजनीति में अहम चेहरा बन गए. वे कई बार धुबरी से सांसद रह चुके हैं. अजमल अपनी धार्मिक छवि, सादगी और जमीनी पकड़ के लिए जाने जाते हैं.जहां तक विधानसभा चुनाव की बात है, उन्होंने खुद कभी असम विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा. हालांकि, उनकी पार्टी के कई नेता विधानसभा चुनाव लड़ते रहे हैं और कुछ क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन भी किया है, लेकिन अजमल खुद सीधे तौर पर विधानसभा चुनावी मैदान में नहीं उतरे.
बदरुद्दीन अजमल 2009 लोकसभा चुनाव में पहली बार असम के धुबरी से सांसद चुने गए. 2014 और 2019 में भी दूसरी और तीसरी बार उसी लोकसभा सीट से चुनाव जीते. तीनों चुनावों में उन्होंने All India United Democratic Front (AIUDF) के टिकट पर जीत हासिल की. 2024 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और वे धुबरी सीट से जीत दर्ज नहीं कर सके.




