प्रतीक यादव को ससुर ने दी मुखाग्नि, बेटे के अलावा मृतक को कौन-कौन कर सकता है अग्नि समर्पित
14 मई गुरुवार को प्रतीक यादव का ससुर द्वारा अंतिम संस्कार किया गया. इसके बाद उनकी मुखाग्रि को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं कि आखिर ससुर को क्यों मुखाग्रि देनी पड़ी और इसी से संबंधित कई सवाल खड़े हो गए हैं कि बेटे के अलावा मृतक को कौन-कौन मुखाग्रि दे सकता है?
13 मई को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के सौतेले भाई प्रतीक यादव के निधन की खबर सामने आई. इसके अगले दिन, 14 मई (गुरुवार) को लखनऊ में उनका अंतिम संस्कार किया गया. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक बात ने लोगों का ध्यान खास तौर पर खींचा. उनकी मुखाग्नि परिवार के किसी बेटे या भाई ने नहीं, बल्कि उनके ससुर अरविंद सिंह बिष्ट ने दी, जो अपर्णा यादव के पिता हैं बता दें कि प्रतीक यादव की 2011 में शादी हुई थी जिसके बाद उनकी दो बेटियां हैं.
इसी को लेकर सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में कई तरह के सवाल उठने लगे कि आखिर मुखाग्नि देने की परंपरा में ससुर की भूमिका कितनी सही मानी जाती है? क्या शास्त्रों के अनुसार केवल पुत्र ही यह अधिकार रखता है, या फिर परिस्थितियों में अन्य परिजन भी यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं? आइए जानते हैं...
श्री सच्चा प्रेम बाबा आश्रम अरैल प्रयागराज के आचार्य श्री सत्यव्रत मिश्रा ने बताया कि 'गोत्र और सपिंडता के नियम (मनु स्मृति) और हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मुखाग्नि और पिंडदान का पहला अधिकार केवल उसी व्यक्ति को होता है जो मृतक के कुल, गोत्र या 'सपिंड' (रक्त-संबंधी) परिवार का हिस्सा हो. विवाह के बाद कन्या का गोत्र बदल जाता है, जिससे दामाद और ससुर का वंशानुगत गोत्र पूरी तरह अलग हो जाता है.'
स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी विवाहात् सप्तमे पदे.पत्यौ गोत्रेण कर्तव्या तस्याः पिण्डोदकक्रिया॥(स्मृति ग्रन्थ)अर्थ- विवाह के समय सातवें फेरे (सप्तपदी) के बाद नारी अपने पिता के गोत्र से अलग होकर पति के गोत्र में विलीन हो जाती है. इसलिए, दामाद ससुर के कुल या गोत्र का सपिंड (रक्त-सम्बन्धी) नहीं रहता. भिन्न गोत्र होने के कारण ससुर का अपने दामाद पर कोई वंशानुगत अधिकार नहीं बनता.
मृतक को कौन-कौन दे सकता है मुखाग्नि?
श्री सच्चा प्रेम बाबा आश्रम अरैल प्रयागराज के महंत आचार्य श्री सत्यव्रत मिश्रा के मुताबिक, शास्त्रों में पुत्र द्वारा ही मुखाग्नि और पिंडदान देने का नियम है क्योंकि केवल वही आत्मा को नरक से मुक्ति दिलाने का अधिकारी है. पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः.तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा॥(मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 138) अर्थ: चूंकि पुत्र अपने माता-पिता को 'पुत' (पुम्) नामक नरक से बचाता है, इसलिए स्वयं ब्रह्मा जी ने उसे 'पुत्र' कहा है. दामाद केवल एक वैवाहिक संबंधी है, वह ससुर के वंश को आगे बढ़ाने या उनके पितृ ऋण को उतारने का शास्त्रीय उत्तराधिकारी नहीं हो सकता, और यही नियम ससुर पर भी लागू होता.
मुखाग्नि और अंत्येष्टि के अधिकारियों का क्रम (गरुड़ पुराण)गरुड़ पुराण (प्रेतकल्प, अध्याय 10) में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मुखाग्नि और दाह संस्कार कौन कर सकता है. शास्त्रानुसार इसका एक कड़ा पदानुक्रम है, जिसमें ससुर या दामाद का कोई उल्लेख नहीं है:पुत्राभावे च पौत्रस्तु तत्पुत्रो वा सहोदरः.सहोदराभावे शिष्यो वा ब्राह्मणश्च समाचरेत्॥(गरुड़ पुराण, प्रेतकल्प)अर्थ- पुत्र के न होने पर पौत्र (पोता), उसके अभाव में प्रपौत्र (पड़पोता), भाई, अथवा भाई का पुत्र (भतीजा) अंतिम संस्कार करे. यदि सपिंड कुल में कोई पुरुष न हो, तो शिष्य या कुल का कोई अन्य योग्य ब्राह्मण अंतिम संस्कार कर सकता है. इस पूरी अधिकार सूची में ससुर या दामाद को अंतिम संस्कार करने की पात्रता वर्जित रखी गई है क्योंकि वे एक-दूसरे के गोत्रज नहीं होते.




