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25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास 2026, जानिए धार्मिक महत्व; नियम और इन 4 महीनों में क्या नहीं करना चाहिए

चातुर्मास 2026 की शुरुआत 25 जुलाई से होगी. जानिए देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक के धार्मिक महत्व, नियम, वर्षावास और प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी जानकारी.

25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास 2026, जानिए धार्मिक महत्व; नियम और इन 4 महीनों में क्या नहीं करना चाहिए
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State Mirror Astro
By: State Mirror Astro3 Mins Read

Updated on: 14 Jun 2026 6:00 AM IST

हिंदू धर्म में चातुर्मास को साधना, भक्ति और आत्मसंयम का विशेष काल माना गया है. पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है. धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं.

इस अवधि में श्रद्धालु पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत आदि करके आध्यात्मिक साधना में समय बिताते हैं. वर्ष 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई से आरंभ होकर 20 नवंबर तक रहेगा.

चातुर्मास कब से कब तक रहेगा

  • प्रारंभ : 25 जुलाई 2026, देवशयनी एकादशी
  • समापन : 20 नवंबर 2026, देवउठनी एकादशी

इन चार महीनों की अवधि को ही चातुर्मास कहा जाता है. इसमें श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास शामिल होते हैं.

क्या है चातुर्मास

‘चातुर्मास’ शब्द का अर्थ है चार महीनों का समय. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए वचन के कारण पाताल लोक में निवास करते हैं और योगनिद्रा में चले जाते हैं. इस दौरान सृष्टि का संचालन विशेष नियमों के अनुसार होता है. जब भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी पर जागते हैं, तब पुनः सभी शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं.

चातुर्मास का धार्मिक महत्व

चातुर्मास को भक्ति और साधना का सबसे उत्तम समय माना गया है. मान्यता है कि इस अवधि में किए गए जप, तप, व्रत और दान का विशेष पुण्य प्राप्त होता है. यही कारण है कि श्रद्धालु इन दिनों में सात्विक जीवन अपनाकर भगवान की आराधना में अधिक समय बिताते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, जनेऊ और नए कार्यों की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते. पूरा समय पूजा-पाठ और आत्मिक उन्नति के लिए समर्पित माना जाता है.

साधु-संत क्यों करते हैं वर्षावास

चातुर्मास का समय वर्षा ऋतु में आता है. प्राचीन परंपरा के अनुसार इस दौरान साधु-संत और ऋषि-मुनि यात्राएं छोड़कर एक ही स्थान पर रहकर साधना करते हैं. इसे वर्षावास या चौमासा कहा जाता है. इसका उद्देश्य साधना के साथ-साथ वर्षा के मौसम में छोटे जीव-जंतुओं की रक्षा करना भी माना गया है.

चातुर्मास में आने वाले प्रमुख व्रत और त्योहार

इन चार महीनों में कई महत्वपूर्ण पर्व और व्रत मनाए जाते हैं. इनमें हरियाली तीज, नाग पंचमी, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधाष्टमी, पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, दशहरा और करवा चौथ प्रमुख हैं. इन सभी पर्वों का संबंध श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक साधना से माना जाता है.

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