आपकी बेटी कांच की गुड़िया है! क्या है ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा से जूझने वाली गिरिजा की कहानी?
जन्म से ही ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रहीं गिरिजा को समाज ने 'कांच की गुड़िया' कहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. मां के सहारे और अपने आत्मविश्वास से गिरिजा आज आत्मनिर्भर कारीगर और उद्यमी हैं.
29 साल की गिरिजा की जिंदगी किसी आम कहानी से बहुत अलग है. जब वह पैदा हुईं, तो डॉक्टरों ने उनकी मां से कहा, 'आपकी बेटी 'कांच की गुड़िया' है.' यह शब्द किसी भी मां के लिए बेहद दर्दनाक हो सकते थे. कांच की गुड़िया मतलब ऐसी जो थोड़ा सा झटका लगने पर भी टूट जाए. लेकिन गिरिजा की मां ने इस सच को नकारा नहीं, बल्कि उसे स्वीकार किया और डर को प्यार में बदल दिया. उन्होंने कभी हार नहीं मानी, बल्कि बेटी को मजबूत बनाने का रास्ता चुना. BBC हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक, आज गिरिजा ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा (Osteogenesis Imperfecta या OI) नाम की इस दुर्लभ बीमारी के साथ जी रही हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में बेचारगी की जगह हिम्मत और आत्मविश्वास है.
ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें शरीर में कोलेजन बनाने वाला जीन ठीक से काम नहीं करता. इससे हड्डियां बहुत कमजोर और नाजुक हो जाती हैं. छोटी-छोटी बातों से भी फ्रैक्चर हो सकता है कभी गिरना, कभी बिस्तर पर पलटना, या कभी बिना वजह भी. गिरिजा की हड्डियां इतनी नाजुक हैं कि वह न तो ठीक से चल पाती हैं और न ही सामान्य तरीके से बैठ पाती हैं. कई बार बिना किसी कारण के भी उनके शरीर में फ्रैक्चर हो जाते हैं, जिससे दर्द असहनीय होता है. लेकिन गिरिजा ने कभी इस दर्द को शिकायत में नहीं बदला.
'कांच की गुड़िया' शब्द के पीछे छुपा दर्द
उन्होंने इसे अपनी ताकत बनाया. जन्म के समय ही समाज ने गिरिजा को ठुकराने की कोशिश की. पड़ोसी और रिश्तेदारों ने मां से कहा, 'इस बच्ची को फेंक दो, यह कभी काम की नहीं होगी.' कुछ ने तो इसे पाप तक कह दिया. लेकिन मां ने बेटी को गोद में कसकर पकड़ा और उन बातों को अनसुना कर दिया. उन्होंने फैसला किया कि गिरिजा को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाना है. बचपन से ही मां ने गिरिजा को कला की दुनिया में ले जाया क्योंकि गिरिजा के हाथ ठीक थे, वे चीजें बनाने में माहिर हो सकती थी. मां ने खुद कभी आर्ट नहीं सीख पाईं, लेकिन बेटी को वह मौका दिया जो उन्हें नहीं मिला.
छोटे हाथ, बड़ा हुनर
स्कूल और कॉलेज ने भी गिरिजा को दाखिला देने से मना कर दिया. वे कहते थे कि अगर कोई फ्रैक्चर हुआ तो जिम्मेदारी कौन लेगा? यह सुनकर गिरिजा को लगा कि शायद पढ़ाई उनके बस की नहीं. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. खुद से ही पांच भाषाएं सीख ली- हिंदी के अलावा अंग्रेजी और कुछ अन्य. यह उनकी जिद और लगन का सबूत था. गिरिजा को मेकअप करना बहुत पसंद है. वे अपने हाथों से खूबसूरत चीजें बनाती हैं- क्रोशिया से बनी चीजें, क्ले से बने ईयररिंग्स, कुंदन ज्वेलरी और अन्य हैंडक्राफ्ट. उनके हाथ छोटे हैं, लेकिन उनमें जादू है. 2020 में जब उनका सबसे अच्छा दोस्त और सपोर्टर चला गया, तो गिरिजा ने खुद को संभाला और एक ब्रांड शुरू किया 'मैजिक इन लिटिल हैंड्स' (Magic in Little Hands). यह ब्रांड उनकी बनाई हुई हैंडमेड ज्वेलरी और क्रोशिया प्रोडक्ट्स बेचता है. आज वे इसी से कमाती हैं, अपना इलाज चलाती हैं और खुद को इंडिपेंडेंट रखती हैं. हर पीस में उनकी कहानी छिपी है दर्द, संघर्ष और उम्मीद.
समाज ने ठुकराया, मां ने थामा हाथ
मां आज भी गिरिजा के साथ हैं. वे बेटी के आगे ढाल नहीं बनीं, बल्कि पीछे से सहारा बनी. हर फ्रैक्चर के बाद मां ने गिरिजा को हिम्मत दी, दर्द सहने की ताकत दी. गिरिजा कहती हैं कि मां की वजह से उन्हें लगा कि वे टूट सकती हैं, लेकिन उनका मन कभी नहीं टूटेगा. मां-बेटी की यह दोस्ती बहुत गहरी है. वे एक-दूसरे के साथ हंसती हैं, बातें करती हैं और जीवन की छोटी-छोटी खुशियां ढूंढती हैं. बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने जब गिरिजा और उनकी मां से बात की, तो सामने आई एक ऐसी कहानी जो सहानुभूति नहीं मांगती. यह हिम्मत सिखाती है गिरिजा का नाम 'पहाड़ से जन्मी' का मतलब रखता है. वे सच में पहाड़ की तरह मजबूत हैं. समाज ने उन्हें कमजोर समझा, स्कूलों ने ठुकराया, शरीर ने दर्द दिया, लेकिन गिरिजा ने कभी खुद को कम नहीं आंका. उनका मंत्र है- खुद पर भरोसा मत छोड़ना. आत्मविश्वास से आप अपना भाग्य खुद लिख सकते हैं.'
समाज को क्या संदेश देती ही गिरिजा
यह कहानी बताती है कि बीमारी शरीर को सीमित कर सकती है, लेकिन आत्मा को नहीं. दर्द हो सकता है, लेकिन शिकवा नहीं होना चाहिए. गिरिजा और उनकी मां ने दिखाया कि प्यार और हिम्मत से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है. उनकी जिंदगी हमें सिखाती है कि असली ताकत बाहर नहीं, अंदर होती है. जब हम टूटने की बजाय संभलना चुनते हैं, तो दुनिया की कोई भी 'कांच की गुड़िया' वाली सोच हमें रोक नहीं सकती. गिरिजा आज भी बनाती रहती हैं नई डिजाइन, नई उम्मीदें. उनकी छोटी-छोटी उंगलियां बड़े सपने बुनती हैं और उनकी मां चुपचाप देखती हैं, मुस्कुराती हैं। क्योंकि वे जानती हैं उनकी बेटी कांच की नहीं, बल्कि हीरे जैसी है, जो चमकती है, टूटती नहीं।





