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Promise Day 2026: वादे जो कभी-कभी निभते नहीं, लेकिन हमें निभा ले जाते हैं

Promise Day पर अक्सर हम बड़े-बड़े वादे करते हैं- साथ निभाने के, कभी न बदलने के, हमेशा रहने के. लेकिन सच यह है कि हर वादा पूरा हो, ऐसा जरूरी नहीं होता.

Promise Day 2026: वादे जो कभी-कभी निभते नहीं, लेकिन हमें निभा ले जाते हैं
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( Image Source:  AI SORA )
हेमा पंत
By: हेमा पंत

Updated on: 11 Feb 2026 7:00 AM IST

वादे अजीब होते हैं. कभी मरहम बन जाते हैं, कभी वही घाव सबसे गहरा कर देते हैं. कोई एक भरोसे भरा वाक्य कह दे “मैं हूं ना” और इंसान महीनों, सालों तक उसी सहारे मुश्किल रास्ते पार कर लेता है. शायद इसी वजह से वादे हमें बांधे रखते हैं. वे उम्मीद देते हैं कि अंधेरा स्थायी नहीं है, कोई न कोई हाथ थामने आएगा. लेकिन सच की दुनिया थोड़ी सख्त है. यहां हर वादा निभे, ऐसा जरूरी नहीं होता.

मेरी कॉलोनी में एक अंकल रहते थे- शर्मा अंकल. रिटायरमेंट के बाद उनकी पूरी दुनिया उनकी पत्नी और चाय की छोटी-सी दुकान थी, जो उन्होंने घर के बाहर लगा ली थी. आंटी अक्सर बीमार रहती थीं. दवा, डॉक्टर, पैसों की चिंता- सब कुछ था, लेकिन हर सुबह अंकल मुस्कुराकर उनसे एक ही बात कहते, “तुम बस ठीक हो जाओ, इस बार पहाड़ घुमाने ले जाऊंगा. बर्फ दिखाऊंगा.”

आंटी उस वादे को ऐसे सुनती थीं जैसे टिकट कट चुका हो. कभी स्वेटर निकालकर रख देतीं, कभी कहतीं- “इतनी ठंड में मुझे मत घुमाना.” दोनों हंसते. बीमारी थोड़ी देर के लिए दरवाज़े के बाहर खड़ी रह जाती. पर जिंदगी ने कहानी का मोड़ नहीं बदला. आंटी ठीक नहीं हुईं.

जिस दिन वो गईं, मैंने पहली बार शर्मा अंकल को चुप देखा. दुकान बंद थी. कुर्सी खाली थी. पर शाम को, जब लोग लौट रहे थे, अंकल ने दुकान फिर खोली. किसी ने धीरे से पूछा, “अंकल, अब किसके लिए मेहनत?” उन्होंने बहुत सामान्य आवाज़ में कहा, “वादे के लिए.” हम समझ नहीं पाए.

कुछ महीनों बाद पता चला, अंकल पहाड़ गए थे. अकेले. आंटी की फोटो जेब में रखकर. बर्फ भी देखी, चाय भी पी, और होटल के कमरे में बैठकर रोए भी. लौटकर उन्होंने फोटो को दुकान की दीवार पर टांग दिया. उस दिन समझ आया- वादे हमेशा पूरे होने के लिए नहीं होते.

कुछ वादे हमें टूटने के बाद भी खड़ा रहने की वजह दे जाते हैं. अगर आंटी सच में ठीक हो जातीं, तो यह एक खुश कहानी होती. पर उनके न ठीक होने से यह जिंदगी की सच्ची कहानी बन गई. वादे कभी-कभी निभते नहीं, लेकिन हमें निभा ले जाते हैं. और शायद… जीते रहने के लिए इतना ही काफी होता है.

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