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भारत की पहली कॉस्मेटिक क्रीम Afghan Snow, 100 साल पहले जीता लाखों हिंदुस्तानी महिलाओं का दिल

एक सदी पहले लॉन्च हुई 'अफगान स्नो' भारत की पहली घरेलू कॉस्मेटिक क्रीम थी. ई.एस. पाटनवाला की मेहनत और गांधीजी के समर्थन से यह स्वदेशी ब्रांड हर घर तक पहुंचा.

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( Image Source:  Create By AI )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय

Updated on: 12 Feb 2026 3:16 PM IST

आज के समय में दुनिया भर की कॉस्मेटिक क्रीम है जो स्किन की चमक और हेल्दी रखना का वादा करती है. लेकिन क्या कभी महिलाओं ने सोचा है आखिर भारत में पहली कॉस्मेक्टिक क्रीम कब आई और कहां से आई उसका नाम क्या था?. तो बता दें, एक सदी से भी ज्यादा समय पहले, 1919 में एक खास भारतीय स्वदेशी त्वचा देखभाल प्रोडक्ट लॉन्च हुआ था. इसका नाम था अफगान स्नो. यह क्रीम इतनी पॉपुलर हुई कि जल्दी ही देश के हर घर में पहुंच गई. उस दौर में जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन था और बाजार में ज्यादातर विदेशी सामान छाया हुआ था, तब अफगान स्नो ने 'मेड इन इंडिया' का गौरवपूर्ण झंडा बुलंद किया. यह इंडियन इंटरप्रन्योरशिप की एक शानदार मिसाल बन गई.

इस क्रीम के पीछे का व्यक्ति थे ईब्राहिम सुल्तानअली पाटनवाला, जिन्हें ई.एस. पाटनवाला के नाम से जाना जाता है. उनका जन्म गुजरात के कच्छ जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था. बचपन से ही वे मेहनती और अम्बिशयस थे. बेहतर अवसरों की तलाश में वे कम उम्र में ही मुंबई आ गए. पैसे बहुत कम थे, लेकिन इत्र और जड़ी-बूटियों की गहरी समझ थी. उन्होंने मुंबई के पायधुनी इलाके में एक छोटी सी दुकान शुरू की. वहीं पर वे खुद इत्र, परफ्यूम और क्रीम बनाते थे. शुरुआत में सिर्फ प्रयोग करते रहते थे. धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और कुछ वफादार कस्टमर बन गए. लोग उनकी बनी चीजें पसंद करने लगे.

अफगान स्नो का नाम कैसे पड़ा?

अफगान स्नो नाम पड़ने की भी कहानी बेहद इंट्रेस्टिंग है. 1919 में अफगानिस्तान के राजा अमानुल्लाह खान भारत आए. बंबई में उन्होंने कई यंग एंटरप्रेन्योर से मुलाकात की. उनमें से एक थे पाटनवाला. पाटनवाला ने राजा को अपनी बनाई अलग-अलग चीजों की एक टोकरी भेंट की. उसमें एक सफेद क्रीम का जार भी था, जिसका अभी कोई नाम नहीं था. राजा ने उस क्रीम को देखा, सूंघा और छुआ. वे बहुत प्रभावित हुए और बोले, 'यह तो अफगानिस्तान की बर्फ जैसी लग रही है. इतनी सफेद, मुलायम और शुद्ध. पाटनवाला ने तुरंत मौका देखा और पूछा, 'क्या मैं इस क्रीम का नाम अफगान स्नो रख सकता हूं? राजा ने खुशी-खुशी हामी भरी. बस यूं ही यह नाम पड़ा और 1919 में अफगान स्नो लॉन्च हो गई. यह भारत की पहली घरेलू ब्यूटी क्रीम थी.

एक क्रीम, कई काम

अफगान स्नो को एक ऑल-इन-वन क्रीम के रूप में बेचा जाता था. यह मॉइस्चराइजर का काम करती थी, मेकअप बेस के तौर पर इस्तेमाल होती थी और सूरज से त्वचा की रक्षा भी करती थी. उस समय की भारतीय औरतों के लिए यह बहुत सुविधाजनक और जरूरी चीज बन गई.

फैक्ट्री और स्वदेशी भावना

मांग बढ़ने पर पाटनवाला ने प्रोडक्शन बढ़ाया. उन्होंने मुंबई के बायकुला इलाके में बड़ा कारखाना लगाया, जो तब मुंबई का महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र था. आज भी वहां पाटनवाला मार्ग और पाटनवाला इंडस्ट्रियल एस्टेट नाम से जगहें मौजूद हैं, जो उनकी याद दिलाती हैं. बाद में महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में भी फैक्टरियां लगाई गईं. उस समय की तुलना में उनकी फैक्ट्री काफी मॉडर्न थी. उन्होंने विदेशी मशीनों पर ज्यादा निर्भर नहीं रहकर स्थानीय तकनीक को बढ़ावा दिया. इससे हजारों भारतीयों को रोजगार मिला. ब्रिटिश राज में जब विदेशी सामान को बेहतर माना जाता था, तब पाटनवाला ने अपनी क्रीम की बोतलों पर बड़े गर्व से 'मेड इन इंडिया' लिखवाया.

स्वदेशी आंदोलन में गांधी जी का समर्थन

स्वदेशी आंदोलन के दौरान 'अफगान स्नो' को कुछ लोग विदेशी समझकर बहिष्कार करने लगे, क्योंकि नाम अफगान था और शुरुआत में बोतलें जर्मनी से और लेबल जापान से आते थे. पाटनवाला ने महात्मा गांधी से मदद मांगी. गांधीजी ने खुद जांच की और पाया कि यह पूरी तरह भारतीय उत्पाद है. खास बात यह थी कि क्रीम पूरी तरह शाकाहारी थी इसमें कोई पशु वसा नहीं थी. गांधीजी ने अपने अखबारों में इसका समर्थन किया और लोगों से कहा कि इसे इस्तेमाल करें. इससे अफगान स्नो स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बन गई और लोगों का भरोसा और बढ़ गया.

बॉलीवुड और समाज में लोकप्रियता

पाटनवाला बड़े-बड़े भोज और पार्टियां ऑर्गनाइज करते थे, जहां नरगिस, राज कपूर जैसी मशहूर हस्तियां आती थी. 1952 में बॉम्बे में भारत की पहली मिस इंडिया पेजेंट को 'अफगान स्नो' ने स्पॉन्सर किया था. मिस इंडिया विनर एस्थर विक्टोरिया अब्राहम और एक्ट्रेस नूतन जैसे सितारे इसके विज्ञापनों में नजर आए. उस समय की छोटी कांच की बोतल और खूबसूरत लेबल को बहुत प्रीमियम माना जाता था. 20वीं सदी के मध्य तक यह लगभग हर भारतीय घर में जरूरी चीज हो गई थी.

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गिरावट के कारण

1980 और 1990 के दशक में अफगान स्नो की लोकप्रियता कम होने लगी. हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसे पॉन्ड्स, फेयर एंड लवली और लैक्मे जैसे बड़े ब्रांड आए. उन्होंने टीवी पर जोरदार विज्ञापन दिए, नए फॉर्मूले लॉन्च किए और मार्केटिंग में बहुत पैसा लगाया. अफगान स्नो ने पुरानी छवि और पारंपरिक तरीके से काम चलाया, ज्यादा आक्रामक प्रचार नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि नए ब्रांडों ने बाजार पर कब्जा कर लिया. आज 'अफगान स्नो' पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ई.एस. पाटनवाला प्राइवेट लिमिटेड अभी भी इसे बनाती है, लेकिन उपलब्धता बहुत कम है. कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या चुनिंदा दुकानों में मिल जाती है.

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