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क्‍या BMC चुनाव में स्‍याही से होगा खेला? कहानी महाराष्ट्र निकाय चुनाव में बवाल मचाने वाली Indelible Ink की

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में इस्तेमाल की गई इंडेलिबल इंक (अमिट स्याही) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदान के बाद उंगली पर लगाई जाने वाली यह स्याही आसानी से मिट रही है, जिससे दोबारा वोटिंग की आशंका पैदा होती है. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में स्याही को सैनिटाइजर और नेल पॉलिश रिमूवर से हटाते हुए दिखाया गया. हालांकि चुनाव आयोग ने कहा कि स्याही भले मिट जाए, लेकिन सिस्टम में अन्य जांच व्यवस्थाएं मौजूद हैं और 2011 से स्थानीय चुनावों में मार्कर पेन का इस्तेमाल नियमों के तहत हो रहा है.

क्‍या BMC चुनाव में स्‍याही से होगा खेला? कहानी महाराष्ट्र निकाय चुनाव में बवाल मचाने वाली Indelible Ink की
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( Image Source:  ANI )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Published on: 16 Jan 2026 9:59 AM

भारत में चुनाव आते ही उंगली पर लगा बैंगनी निशान लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान बन जाता है. यह निशान बताता है कि मतदाता अपना वोट डाल चुका है और दोबारा मतदान नहीं कर सकता. लेकिन महाराष्ट्र में हुए नगर निगम चुनावों के दौरान यही इंडेलिबल इंक (अमिट स्याही) विवाद के केंद्र में आ गई. विपक्षी दलों का आरोप है कि जो स्याही “अमिट” कही जाती है, वह आसानी से मिट जा रही है - और यहीं से चुनावी गड़बड़ी की आशंका खड़ी हो गई.

इंडेलिबल इंक वह स्याही होती है, जो मतदान के बाद मतदाता की उंगली पर लगाई जाती है ताकि कोई व्यक्ति एक से ज्यादा बार वोट न डाल सके. इसे इस तरह बनाया गया है कि यह कई दिनों तक त्वचा और नाखून पर बनी रहे और आसानी से न मिटे.

भारत में कब शुरू हुई इस स्याही की कहानी?

indian express भारत में इंडेलिबल इंक का इस्तेमाल पहली बार 1962 के आम चुनाव में हुआ था. चुनाव आयोग ने तब फैसला लिया कि डुप्लीकेट वोटिंग रोकने के लिए मतदाताओं की उंगली पर स्याही लगाई जाएगी. यह प्रयोग सफल रहा और तब से यह व्यवस्था हर चुनाव का हिस्सा बन गई.

किस चीज से बनती है यह स्याही?

इस स्याही में मुख्य रूप से सिल्वर नाइट्रेट होता है. यह रसायन त्वचा और रोशनी के संपर्क में आकर गहरा निशान छोड़ देता है. यह निशान तब तक रहता है जब तक त्वचा की ऊपरी परत खुद न झड़ जाए. स्याही में एक खास डाई भी होती है ताकि निशान साफ दिखाई दे.

कौन बनाता है चुनावी स्याही?

इंडेलिबल इंक का फॉर्मूला नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (NPL) ने 1950 के दशक में तैयार किया था. आज यह स्याही मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड बनाती है, जो कर्नाटक सरकार की कंपनी है. चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की मंजूरी से यह कंपनी भारत ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान, नेपाल, केन्या, नाइजीरिया और मंगोलिया जैसे देशों को भी यह स्याही सप्लाई कर चुकी है.

कैसे लगाई जाती है स्याही?

आमतौर पर यह स्याही बाएं हाथ की तर्जनी उंगली पर, नाखून और त्वचा के जोड़ पर लगाई जाती है ताकि इसे हटाना मुश्किल हो. पहले ब्रश या बोतल से लगाई जाती थी, अब कई जगह मार्कर पेन का इस्तेमाल किया जाता है. महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में भी मार्कर पेन से स्याही लगाई गई.

कितने दिन तक रहनी चाहिए स्याही?

चुनाव अधिकारियों के मुताबिक त्वचा पर निशान 3-4 दिन त रह सकते हैं जबकि नाखून पर 2-4 हफ्ते तक. हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि स्याही सही तरीके से लगाई गई या नहीं.

महाराष्ट्र में क्यों मचा बवाल?

नगर निगम चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि स्याही सैनिटाइजर या नेल पॉलिश रिमूवर से आसानी से मिट रही है. इस पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने आरोप लगाया कि सरकार और चुनाव प्रशासन ने मतदान में गड़बड़ी रोकने वाली सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर दिया है.

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे समेत चुनाव अधिकारियों ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भले ही स्याही मिट जाए, लेकिन अन्य चुनावी जांच प्रणालियां मौजूद हैं, एक व्यक्ति दोबारा वोट नहीं डाल सकता. स्थानीय निकाय चुनावों में 2011 से मार्कर पेन के इस्तेमाल की अनुमति है.

लोकतंत्र की स्याही पर सवाल

यह विवाद सिर्फ स्याही का नहीं, बल्कि चुनावी भरोसे और पारदर्शिता का है. जिस निशान को लोकतंत्र की पहचान माना जाता है, उस पर उठे सवालों ने महाराष्ट्र के चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है. अब असली परीक्षा यह है कि चुनाव आयोग और प्रशासन विश्वास की इस स्याही को लेकर उठे संदेहों का कितना मजबूत जवाब दे पाते हैं.

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