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कभी मोदी ने कहा था DNA में खराबी, अब सोनिया गांधी ने बता दिया 'गद्दार', राजनीति के 'पलटूराम' फिर भी BJP से लेकर कांग्रेस तक के लिए क्यों जरूरी नीतीश?

मोदी के DNA बयान से सोनिया गांधी की कथित गद्दार टिप्पणी तक, जानिए नीतीश कुमार की सियासी पलटी, वोट गणित और BJP-कांग्रेस के लिए उनकी अहमियत की पूरी कहानी.

कभी मोदी ने कहा था DNA में खराबी, अब सोनिया गांधी ने बता दिया गद्दार, राजनीति के पलटूराम फिर भी BJP से लेकर कांग्रेस तक के लिए क्यों जरूरी नीतीश?
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देश की राजनीति में जनता दल यूनाइटेड प्रमुख नीतीश कुमार का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिनके साथ गठबंधन कई बार बदले, लेकिन राजनीति में उनकी अहमियत बनी रही. कभी बीजेपी के साथ तो कभी आरजेडी और कांग्रेस के साथ नजर आए नीतीश को अलग-अलग दौर में 'पलटूराम' जैसे तंज भी सुनने पड़े. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में उनके 'डीएनए' पर सवाल उठाया था, जबकि 29 सितंबर 2026 की कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टों में सोनिया गांधी की ओर से उन्हें 'गद्दार' कहे जाने की बात सामने आई है.

दिलचस्प यह है कि जिन दलों के नेताओं ने कभी नीतीश पर तीखे हमले किए, उन्हीं के लिए बिहार की राजनीति में नीतीश का साथ कई बार महत्वपूर्ण रहा है. यही वजह है कि नीतीश की राजनीति को समझने के लिए उनके गठबंधन बदलने के साथ-साथ उनके सामाजिक आधार और चुनावी असर को भी समझना जरूरी है. हालात ये हैं कि आज भी नीतीश कुमार इंडिया में शामिल होना स्वीकार कर लें तो कांग्रेस खुले दिल से स्वागत करती हुई दिखाई देगी.

पीएम ने नीतीश कुमार के DNA को लेकर क्या कहा था?

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच राजनीतिक टकराव का सबसे चर्चित अध्याय साल 2015 में सामने आया था. 25 जुलाई 2015 को मुजफ्फरपुर की रैली में नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार पर हमला बोला था. मोदी ने 2010 की उस घटना का जिक्र किया, जब पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान नीतीश ने बीजेपी नेताओं के लिए आयोजित डिनर रद्द कर दिया था. इसी संदर्भ में मोदी ने कहा था कि नीतीश के DNA में कुछ समस्या है, क्योंकि लोकतंत्र का DNA ऐसा नहीं होता.

मोदी ने नीतीश पर राजनीतिक विरोधियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं करने का आरोप लगाया था. उस समय नीतीश नरेंद्र मोदी के बीजेपी में प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे के रूप में उभरने के बाद 2013 में NDA से अलग हो चुके थे और 2015 में आरजेडी-कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव मैदान में थे.

मोदी के इस बयान पर नीतीश कुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा था कि उनका DNA बिहार के लोगों जैसा ही है. नीतीश ने मोदी से अपने बयान को वापस लेने की मांग की थी और इस मुद्दे को बिहार के सम्मान से जोड़ दिया था. इसके बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में 'DNA' और बिहार की अस्मिता का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया.

सोनिया गांधी ने नीतीश कुमार को 'गद्दार' क्यों कहा?

नीतीश कुमार का नाम करीब 11 साल बाद 29 सितंबर 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC की बैठक में फिर चर्चा में आया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में INDIA गठबंधन से नीतीश कुमार के अलग होने पर चर्चा हुई. रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि अगर नीतीश कुमार INDIA गठबंधन में बने रहते तो राजनीतिक परिस्थितियां अलग हो सकती थीं.

इसी चर्चा के दौरान कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि सोनिया गांधी ने नीतीश कुमार को 'गद्दार' कहा और यह भी कहा कि अच्छा हुआ कि वह समय रहते NDA में चले गए.

हालांकि, सोनिया गांधी के 'गद्दार' कहने की बात किसी सार्वजनिक आधिकारिक CWC रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है, बल्कि बैठक में मौजूद सूत्रों के हवाले से मीडिया में रिपोर्ट की गई है. कुछ रिपोर्टों में सोनिया गांधी की टिप्पणी को इस रूप में बताया गया कि उन्होंने कहा, 'शुक्र है नीतीश कुमार समय रहते चले गए.'

दिग्विजय सिंह, नीतीश को लेकर क्या कहा था?

CWC की बैठक में दिग्विजय सिंह की कथित टिप्पणी इस पूरे मामले को और दिलचस्प बनाती है. रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि विपक्ष को नीतीश कुमार को INDIA गठबंधन से अलग नहीं होने देना चाहिए था. उनका कहना था कि अगर नीतीश गठबंधन में बने रहते तो राजनीतिक परिस्थितियां अलग हो सकती थीं. यानी कांग्रेस के भीतर नीतीश को लेकर चर्चा सिर्फ उनके गठबंधन बदलने की आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस बात पर भी हुई कि उनके साथ रहने से विपक्ष की राजनीतिक स्थिति पर क्या असर पड़ सकता था.

इसका संदर्भ 2023 में भी दिखाई देता है. उस समय नीतीश कुमार बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे. 23 जून 2023 को पटना में विपक्षी दलों की पहली बड़ी संयुक्त बैठक हुई, जिसमें कई प्रमुख विपक्षी दल शामिल हुए. आगे चलकर इसी प्रक्रिया ने INDIA गठबंधन का रूप लिया. इस दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के साथ नीतीश की नजदीकी बढ़ी थी. लेकिन जनवरी 2024 में उन्होंने एक बार फिर महागठबंधन छोड़कर बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA में वापसी कर ली.

कब-कब बीजेपी और कांग्रेस के निशाने पर रहे नीतीश?

नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ लंबा राजनीतिक रिश्ता रहा है. 2013 में उन्होंने नरेंद्र मोदी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने के बाद NDA से अलग होने का फैसला किया. 2015 में उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया और बिहार में सरकार बनाई. लेकिन जुलाई 2017 में आरजेडी से रिश्ता तोड़कर वह फिर बीजेपी के साथ चले गए. उनके इस फैसले पर कांग्रेस और आरजेडी ने जमकर हमला बोला. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने उस समय नीतीश के विश्वास मत को 'विश्वासघात मत' तक कहा था.

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में JDU और बीजेपी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और NDA की सरकार बनी. लेकिन अगस्त 2022 में नीतीश ने एक बार फिर बीजेपी से नाता तोड़ लिया. इसके बाद उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई. इसी दौर में वह विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिशों में सक्रिय हुए और INDIA गठबंधन की शुरुआती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन जनवरी 2024 में नीतीश ने फिर पाला बदला और आरजेडी-कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA में वापस चले गए. इस फैसले के बाद कांग्रेस और आरजेडी ने उन पर जनादेश के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया.

BJP से लेकर कांग्रेस तक के लिए क्यों जरूरी हैं नीतीश?

नीतीश कुमार की राजनीतिक उपयोगिता को सिर्फ उनकी पार्टी की सीटों से समझना मुश्किल है. बिहार में उनका सामाजिक आधार लंबे समय से उनकी राजनीति की बड़ी ताकत रहा है. खास तौर पर अति पिछड़ा वर्ग यानी EBC को JDU के महत्वपूर्ण समर्थन आधारों में गिना जाता है. बिहार के 2023 में जारी जातीय सर्वे के मुताबिक राज्य की आबादी में EBC की हिस्सेदारी करीब 36 फीसदी थी. इसके अलावा कुर्मी और अन्य पिछड़े सामाजिक समूहों में भी नीतीश का प्रभाव माना जाता है.

नीतीश की राजनीति में महिला मतदाता भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं. शराबबंदी, स्वयं सहायता समूहों और महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को उनकी सरकार की राजनीति का प्रमुख हिस्सा माना गया है. बिहार में महिला मतदान का ऊंचा प्रतिशत भी चुनावी राजनीति में इस वर्ग की अहमियत को दिखाता है.

यही कारण है कि बीजेपी के लिए नीतीश के साथ गठबंधन बिहार के सामाजिक समीकरणों को साधने का एक माध्यम रहा है.

दूसरी तरफ कांग्रेस और आरजेडी के लिए भी नीतीश का महत्व अलग वजह से रहा है. नीतीश जब बीजेपी के साथ नहीं होते हैं तो उनके पास NDA विरोधी गठबंधन को मजबूत करने की क्षमता होती है. 2023 में विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में उनकी भूमिका इसका उदाहरण रही.

बिहार में आरजेडी के यादव-मुस्लिम आधार और नीतीश के सामाजिक आधार के बीच गठबंधन ने कई चुनावों में एक अलग राजनीतिक समीकरण बनाया है.यही वजह है कि नीतीश कुमार को लेकर राजनीतिक बयान भले ही कितने तीखे रहे हों, लेकिन बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका को नजरअंदाज करना दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के लिए आसान नहीं रहा.

2015 का 'DNA' विवाद, 2017 में बीजेपी के साथ वापसी, 2022 में बीजेपी से अलग होना, 2023 में विपक्षी एकता की कोशिश और 2024 में फिर NDA में लौटना उनके राजनीतिक सफर के बड़े पड़ाव हैं. 2026 की CWC बैठक में उनके नाम पर हुई चर्चा भी यही बताती है कि गठबंधन बदलने के बावजूद बिहार के राजनीतिक समीकरणों में नीतीश कुमार का नाम लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है.

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