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कहानी TMC की, प्रणब दा-मुंशी से टशन, कांग्रेस से मोहभंग, ऐसे ममता ने खड़ी की पार्टी, बंगाल में अब कहां खड़ा भविष्य?

कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने TMC बनाई और 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर बंगाल की राजनीति बदल दी. जानिए संघर्ष से सत्ता तक की पूरी कहानी.

कहानी TMC की, प्रणब दा-मुंशी से टशन, कांग्रेस से मोहभंग, ऐसे ममता ने खड़ी की पार्टी, बंगाल में अब कहां खड़ा भविष्य?
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ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं मानी जाती. बेहद साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने छात्र राजनीति से अपनी पहचान बनाई. शुरुआती दौर में वह कांग्रेस की युवा नेता के रूप में उभरीं और सड़क पर संघर्ष करने वाली नेता की छवि बनाई. उनकी राजनीति शुरू से ही आक्रामक और आंदोलनकारी रही, जिसने उन्हें पारंपरिक कांग्रेस नेताओं से अलग पहचान दी.

1984 की जीत: जब पहली बार सभी ने नोटिस किया

1984 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर करते हुए दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया. उस समय यह जीत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं मानी गई, बल्कि इसे बंगाल में कांग्रेस की नई पीढ़ी के उभार के रूप में देखा गया. इस जीत के बाद दिल्ली में भी ममता का कद तेजी से बढ़ा. इसी के बाद उन्हें जॉयंट किलर कहा गया.

राजीव गांधी का भरोसा और कांग्रेस के भीतर बढ़ती बेचैनी

देश के पूर्व पीएम राजीव गांधी, ममता बनर्जी को बंगाल में कांग्रेस का भविष्य मानते थे. उन्हें युवा और जुझारू नेता के तौर पर आगे बढ़ाया. लेकिन ममता के इस उभार से बंगाल कांग्रेस के उस समय के दिग्गज नेता तिलमिला उठे. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लगने लगा कि ममता बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हैं और हाईकमान तक उनकी सीधी पहुंच बन गई है.

बंगाल कांग्रेस के पुराने नेताओं बनाम ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल कांग्रेस उस दौर में कई गुटों में बंटी हुई थी. ममता बनर्जी सड़क पर उतरकर CPI(M) के खिलाफ संघर्ष करती थीं. जबकि कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा नरम राजनीति करता था और कम्युनिस्टों के असर में था. ममता को लगता था कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता वामपंथियों से खुलकर लड़ना ही नहीं चाहते. यही राजनीतिक सोच का अंतर आगे चलकर बड़े टकराव में बदल गया.

हाजरा हमला: सड़क की लड़ाई ने बदली राजनीति

1990 में कोलकाता के हाजरा मोड़ पर ममता बनर्जी पर हमला हुआ. इस हमले में उनके सिर पर गंभीर चोट आई. आरोप CPI(M) कार्यकर्ताओं पर लगे. इस घटना ने ममता की छवि एक फाइटर नेता के रूप में और मजबूत कर दी. लेकिन ममता को यह शिकायत रही कि कांग्रेस नेतृत्व ने उनके समर्थन में उतनी मजबूती नहीं दिखाई, जितनी उन्हें उम्मीद थी.

राजीव गांधी की हत्या के बाद कैसे बदल गया सत्ता संतुलन

1991 में राजीव गांधी की हत्या ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई. राजीव गांधी उनके सबसे बड़े राष्ट्रीय समर्थक माने जाते थे. उनके निधन के बाद कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदल गया. ममता की दिल्ली तक सीधी पहुंच कमजोर होने लगी और बंगाल कांग्रेस के पुराने नेताओं का प्रभाव बढ़ गया.

दिल्ली दरबार में किन नेताओं ने ममता को किया कमजोर?

राजीव गांधी के बाद P. V. Narasimha Rao के नेतृत्व में कांग्रेस की राजनीति बदली. इसी दौर में बंगाल कांग्रेस में प्रियरंजन दास मुंशी सोमेन मित्रा, प्रणब मुखर्जी और कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव संगठन में बढ़ा. ममता समर्थकों का आरोप था कि इन नेताओं ने दिल्ली हाईकमान के सामने उनकी छवि “अनियंत्रित” और “एकल निर्णय लेने वाली” नेता के रूप में पेश की. ममता को धीरे-धीरे संगठनात्मक फैसलों से दूर रखा जाने लगा.

‘लेफ्ट से नरमी’ का आरोप क्यों लगाती थीं ममता

ममता बनर्जी का मानना था कि कांग्रेस अगर बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ मजबूत विपक्ष नहीं बनेगी, तो जनता उसे विकल्प नहीं मानेगी. लेकिन कांग्रेस का एक वर्ग CPI(M) के खिलाफ उतनी आक्रामक लाइन नहीं अपनाना चाहता था. यही वजह थी कि ममता लगातार पार्टी के भीतर असहज महसूस करने लगीं.

1993 पुलिस फायरिंग और ‘शहीद दिवस’ की राजनीति

21 जुलाई 1993 को युवा कांग्रेस के आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई. यह घटना ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का भावनात्मक मोड़ बनी. उन्होंने इसे वाम मोर्चा सरकार की दमनकारी राजनीति बताया. ममता को लगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे पर भी पूरी ताकत से लड़ाई नहीं लड़ रहा. बाद में यही दिन टीएमसी के “शहीद दिवस” के रूप में स्थापित हुआ.

खुद की अनदेखी और पार्टी से अलगाव

1990 के दशक के मध्य तक ममता की लोकप्रियता जनता के बीच लगातार बढ़ रही थी, लेकिन कांग्रेस संगठन में उनका विरोध भी उतना ही बढ़ रहा था. टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियों और प्रदेश नेतृत्व में उन्हें सीमित करने की कोशिश होने लगी. कई बार उनके समर्थकों को भी किनारे किया गया. ममता को लगने लगा कि पार्टी उन्हें नेतृत्व की भूमिका में स्वीकार नहीं करना चाहती.

1997-98: जब कांग्रेस छोड़ने का फैसला

1997 तक ममता बनर्जी का कांग्रेस नेतृत्व से टकराव खुलकर सामने आने लगा. उन्होंने मांग की कि बंगाल में पार्टी को पूरी तरह लेफ्ट विरोधी लाइन अपनानी चाहिए. लेकिन हाईकमान ने उनकी रणनीति को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. इसके बाद ममता इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि कांग्रेस के भीतर रहकर वह अपनी राजनीति नहीं कर पाएंगी.

टीएमसी का गठन: कांग्रेस की राजनीति में बड़ा विद्रोह

जनवरी 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. “तृणमूल” यानी जमीनी स्तर की राजनीति. यह सिर्फ नई पार्टी का जन्म नहीं था, बल्कि कांग्रेस के पुराने नेतृत्व और वामपंथ दोनों के खिलाफ राजनीतिक विद्रोह था. ममता ने खुद को बंगाल की जनता की सीधी आवाज के रूप में पेश करना शुरू किया.

शुरुआती संघर्ष: बागी नेता से जननेता बनने तक

टीएमसी बनने के बाद शुरुआत आसान नहीं थी. कांग्रेस ने उन्हें बागी कहा और CPI(M) ने उन्हें अस्थायी राजनीतिक प्रयोग बताया. लेकिन ममता ने लगातार सड़क संघर्ष जारी रखा. रेल रोको आंदोलन, धरना, पदयात्रा और गांव-गांव संपर्क अभियान के जरिए उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की.

सिंगूर-नंदीग्राम ने कैसे बदली पूरी राजनीति

2000 के दशक में बुद्धादेव भट्टाचार्य सरकार के दौरान सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन ममता के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक अवसर साबित हुए. किसानों की जमीन अधिग्रहण के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन खड़ा किया. इससे ग्रामीण बंगाल में उनकी पकड़ मजबूत हुई और लेफ्ट सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा.

34 साल के लेफ्ट शासन का अंत और ममता का उभार

2011 में ममता बनर्जी ने कम्युनिस्ट पार्टी (Marxist) के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर इतिहास रच दिया. यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस राजनीति की हार भी थी जिसने कभी ममता को कांग्रेस के भीतर सीमित करने की कोशिश की थी. जिन लोगों ने रोका, वही बने ममता की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत का कारण.

ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि उन्होंने अपने खिलाफ हुए विरोध को ही अपनी ताकत बना लिया. कांग्रेस के भीतर उपेक्षा, दिल्ली दरबार की राजनीति और बंगाल के वरिष्ठ नेताओं के विरोध ने उन्हें अलग रास्ता चुनने पर मजबूर किया. लेकिन यही संघर्ष आगे चलकर उन्हें बंगाल की सबसे ताकतवर नेता बना गया.

कहां हुई चूक, हाथ से निकल गई सत्ता

स्ट्रीट फाइटर ममता बनर्जी ने 2011 में सत्ता में आने के बाद खुद को बंगाल की सबसे बड़ी जननेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन समय के साथ कुछ राजनीतिक भूलें उनकी चुनौती बन गईं. टीएमसी पर कट मनी, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज और पार्टी कार्यकर्ताओं की दबंगई के आरोप बढ़े. कई मामलों में प्रशासन पर राजनीतिक नियंत्रण की छवि बनी. दूसरी ओर बीजेपी ने हिंदुत्व, संगठन विस्तार और आक्रामक बूथ रणनीति के जरिए तेजी से जमीन बनाई. बीजेपी ने खुद को “टीएमसी के खिलाफ एकमात्र विकल्प” के रूप में पेश किया. यही वजह रही कि बंगाल की राजनीति में पहली बार ममता बनर्जी को मजबूत और सीधी चुनौती का सामना करना पड़ा. इसमें बीजेपी ने उन्हें ऐसी पटखनी दी कि वो सत्ता से बाहर हो गईं.

ममता बनर्जी
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