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शादी से पहले बनाए गए संबंधों से किसी का चरित्र तय नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? 10 Points में समझिए

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकते. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर प्रेम संबंध शादी तक नहीं पहुंचता और सिर्फ रिश्ता टूट जाने से धोखा मान लेना सही नहीं है.

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Supreme Court on Consensual Pre-Marital Relationship: शादी से पहले बने शारीरिक संबंधों और चरित्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है, जिसकी देशभर में चर्चा हो रही है. शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकते. कोर्ट ने यह भी कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में ऐसे रिश्तों को केवल नैतिकता के पुराने पैमानों से नहीं आंका जा सकता.

यह टिप्पणी तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई. एक उम्मीदवार की नियुक्ति केवल इसलिए रद्द कर दी गई थी क्योंकि उसके खिलाफ पहले शादी का झांसा देकर संबंध बनाने से जुड़ा एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था. बाद में यह मामला लोक अदालत में समझौते के जरिए समाप्त हो गया था. सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड का फैसला पलटते हुए उम्मीदवार को राहत दी.



सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा? (10 बड़े पॉइंट)

1. सहमति से बने संबंध चरित्र का पैमाना नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र पर नकारात्मक टिप्पणी का आधार नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने माना कि ऐसे संबंध अपने आप में कोई अपराध नहीं हैं.

2. हर रिश्ता शादी में नहीं बदलता: कोर्ट ने कहा कि प्रेम संबंधों का अंत हमेशा शादी में हो, यह जरूरी नहीं है. यदि कोई रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता, तो केवल इसी आधार पर किसी एक पक्ष को धोखेबाज नहीं कहा जा सकता.

3. मामला तेलंगाना पुलिस भर्ती से जुड़ा था: जिस उम्मीदवार को राहत मिली, उसकी पुलिस कांस्टेबल पद पर नियुक्ति रद्द कर दी गई थी. भर्ती बोर्ड का मानना था कि उसके खिलाफ दर्ज पुराना मामला 'नैतिक पतन' को दर्शाता है.

4. पड़ोसी महिला के साथ था संबंध: कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, उम्मीदवार और शिकायतकर्ता महिला पड़ोसी थे. दोनों करीब चार साल तक रिश्ते में रहे थे और एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे.

5. लोक अदालत में हुआ था समझौता: मामले का निपटारा वर्ष 2015 में लोक अदालत के सामने समझौते के जरिए हो गया था. महिला ने बाद में मामले को आगे नहीं बढ़ाया और दोनों पक्षों ने समझौते को स्वीकार कर लिया था.

6. समझौता अपराध स्वीकार करना नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी मामले का लोक अदालत में समझौते से खत्म होना यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने अपराध कबूल कर लिया. केवल समझौते के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.

7. दबाव का कोई सबूत नहीं मिला: अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह लगे कि महिला पर समझौते के लिए दबाव बनाया गया था. इसलिए भर्ती बोर्ड को समझौते से गलत निष्कर्ष निकालने का अधिकार नहीं था.

8. चरित्र जांच का मतलब निजी नैतिकता नहीं: कोर्ट ने माना कि पुलिस जैसी सेवाओं में चरित्र सत्यापन जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अधिकारियों की निजी नैतिक सोच के आधार पर उम्मीदवारों का भविष्य तय किया जाए.

9. आरोप साबित होने तक व्यक्ति निर्दोष: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक अदालत में उसका अपराध साबित नहीं हो जाता.

10. उम्मीदवार को मिली बड़ी राहत: अंत में सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड का फैसला रद्द कर दिया और हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने को कहा गया था. अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उम्मीदवार को नौकरी से वंचित करना उचित नहीं था.



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