ममता का 15 साल पुराना किला 30 दिनों में ढहने के कगार पर कैसे पहुंचा? Explainer
Mamata Banerjee Leadership Crisis: पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार को आए हुए 30 दिन हो चुके हैं और इसी के साथ 15 साल से बंगाल में राज करने वाली टीएमसी को हर दिन कोई न कोई बड़ा झटका मिल रहा है- इसी के साथ आइए डिटेल में समझते हैं टीएमसी के अंदरुनी कलह की स्टोरी.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महीने पहले तक जिस पार्टी का दबदबा था, आज वही पार्टी अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजरती दिखाई दे रही है. विधानसभा चुनाव में हार और भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीम TMC को एक के बाद एक झटके साबित हो रहे हैं. जैसा कि आपको मालूम हो कि 9 मई को बंगाल में नई सरकार का शपथ ग्रहण हुआ था. इसके बाद बीते 30 दिनों में के अंदर TMC में कैसे विद्रोह, पलायन और बगावत का सिलसिला शुरू हो गया है? इन्हीं सब सवालों को लेकर आइए जानते हैं...
बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि टीएमसी के लिए मनोवैज्ञानिक झटका भी साबित हुई. पार्टी को उम्मीद थी कि वह मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी, लेकिन हार के तुरंत बाद कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. कई नेताओं का मानना था कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और जनता की नाराजगी को समय रहते समझा नहीं गया. वहीं कुछ नेताओं ने संगठन के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और नेतृत्व शैली को लेकर भी असंतोष जताया.
नेताओं के इस्तीफों ने क्यों बढ़ाई चिंता?
हार के बाद सबसे पहले पार्टी के भीतर से इस्तीफों का सिलसिला शुरू हुआ. पूर्व सांसद शांतनु सेन ने पार्टी प्रवक्ता पद छोड़ दिया. इसके बाद लोकसभा सांसद Kakoli Ghosh Dastidar ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. इसके अलावा विभिन्न नगर निकायों से जुड़े 100 से अधिक पार्षदों के इस्तीफों की खबरों ने भी संगठन की स्थिति को लेकर सवाल खड़े कर दिए. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी चुनावी हार के बाद असंतोष स्वाभाविक होता है, लेकिन जब इस्तीफे लगातार बढ़ने लगें तो यह संगठनात्मक संकट का संकेत माना जाता है.
80 में से 60 विधायक बैठक में क्यों नहीं पहुंचे?
30 मई को ममता बनर्जी ने पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी. लेकिन इस बैठक में 80 में से करीब 60 विधायक शामिल नहीं हुए. राजनीति में किसी नेता की ताकत का अंदाजा अक्सर इस बात से लगाया जाता है कि उसके बुलावे पर कितने लोग पहुंचते हैं. इसलिए बड़ी संख्या में विधायकों की अनुपस्थिति को सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती दूरी के संकेत के तौर पर देखा गया. हालांकि पार्टी की ओर से इसके अलग कारण बताए गए, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे असंतोष और गुटबाजी से जोड़कर देखा गया.
विधानसभा में कैसे बदला पूरा समीकरण?
टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका तब माना गया जब बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग रुख अपनाया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 80 में से 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर Ritabrata Banerjee को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने का समर्थन दिया. बाद में उन्हें आधिकारिक मान्यता भी मिल गई. इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इससे विधानसभा में टीएमसी के भीतर दो अलग-अलग शक्ति केंद्र बनने की चर्चा शुरू हो गई.
संसद तक कैसे पहुंच गई बगावत?
विधानसभा तक सीमित दिख रहा असंतोष जल्द ही संसद तक पहुंच गया. लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि कम से कम 20 सांसद लोकसभा अध्यक्ष Om Birla को पत्र लिखकर एनडीए में शामिल होने की इच्छा जता चुके हैं. इसी दौरान राज्यसभा सांसद Sukhendu Shekhar Ray ने भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया. वहीं कुछ बागी नेताओं की बैठक केंद्रीय मंत्री Bhupender Yadav के आवास पर होने की खबरों ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया. अगर सांसदों का यह असंतोष आगे बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी दिखाई दे सकता है.
आखिर ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
टीएमसी का सबसे बड़ा संकट सिर्फ चुनाव हारना नहीं है. असली चुनौती संगठन को एकजुट बनाए रखना है. करीब डेढ़ दशक तक बंगाल की राजनीति में निर्विवाद प्रभाव रखने वाली ममता बनर्जी आज ऐसे दौर का सामना कर रही हैं, जहां उन्हें विपक्ष से ज्यादा अपनी पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों का जवाब देना पड़ रहा है. हालांकि अभी भी पार्टी का एक बड़ा वर्ग उन्हें टीएमसी का सबसे बड़ा चेहरा मानता है. कई नेता और विधायक सार्वजनिक रूप से उनके नेतृत्व पर भरोसा जता रहे हैं. लेकिन लगातार सामने आ रहे इस्तीफे, बगावत और असंतोष यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले महीनों में टीएमसी की राजनीति और भी दिलचस्प मोड़ ले सकती है.




