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SIR Protest: नारे लगे तो हिरासत, आगे बढ़े तो बैरिकेड! गांधी जयंती पर प्रोटेस्ट के खिलाफ ऐसा क्यों था पुलिस का पहरा, Ground Report

एसआईआर (SIR) के विरोध में गांधी जयंती पर दिल्ली में प्रदर्शन हुआ. जंतर-मंतर जाने से रोके गए प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बैरिकेड लगाए और सैकड़ों को हिरासत में लिया.

SIR Protest Delhi
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SIR Protest Delhi: महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के जयंती के दिन दिल्ली की सड़कों पर लोकतंत्र का एक ऐसा नजारा सामने आया, जिसने विरोध के अधिकार और प्रशासनिक प्रतिबंध के बीच की रेखा को फिर बहस के केंद्र में ला दिया. एसआईआर के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर की ओर बढ़े, लेकिन उन्हें वहां तक पहुंचने ही नहीं दिया गया. बैरिकेड लगे थे, रास्ते बंद थे और बड़ी संख्या में पुलिस तथा केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात थे. नतीजा यह हुआ कि जंतर-मंतर प्रदर्शन का केंद्र बनने के बजाय हिरासत का केंद्र बन गया.

आरजेडी, आम आदमी पार्टी, वामपंथी दलों और विभिन्न छात्र संगठनों से जुड़े नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया. संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, योगेंद्र यादव और छात्र संगठनों से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया. प्रदर्शनकारियों ने एसआईआर वापस लेने, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे या महाभियोग और चुनाव प्रक्रिया में बदलाव जैसी मांगें उठाईं.

जंतर-मंतर को किले में क्यों बदल दिया गया?

सुबह होते ही दिल्ली के मध्य क्षेत्र में सुरक्षा का घेरा कस दिया गया. अशोक रोड गोल चक्कर, संसद मार्ग, टॉल्सटॉय मार्ग और जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड खड़े कर दिए गए. प्रदर्शनकारियों को निर्धारित प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस ने जगह-जगह अवरोध खड़े किए.

प्रदर्शनकारियों के अनुसार, जिस जंतर-मंतर को लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध की पहचान माना जाता रहा है, उसी तक पहुंचने पर रोक लगा दी गई. पुलिस का तर्क था कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं थी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध आवश्यक थे. लेकिन सवाल सीधा है- क्या लोकतंत्र में असहमति की आवाज केवल इजाजत मिलने के बाद ही सुनी जाएगी? प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था महत्वपूर्ण है, लेकिन विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन भी लोकतांत्रिक शासन की कसौटी है.

Credit: State Mirror

गांधी जयंती पर सत्याग्रह का रास्ता क्यों रोका?

प्रदर्शनकारियों ने गांधी जयंती के मौके पर एसआईआर के खिलाफ आवाज उठाई. उनके हाथों में पोस्टर थे और सड़कों पर नारे गूंज रहे थे—'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो', 'एसआईआर वापस लो', 'तानाशाही नहीं चलेगी' और 'मोदी-शाह होश में आओ'.

योगेंद्र यादव ने हिरासत में लिए जाने के बाद सोशल मीडिया पर सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी जयंती के दिन दिल्ली में पुलिस कार्रवाई ने अंग्रेजी शासन की याद दिला दी.

यह उनका राजनीतिक आरोप है, लेकिन इसने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया- जिस गांधी की पहचान ही सत्याग्रह और सत्ता के सामने सवाल खड़े करने से बनी, उसी गांधी जयंती पर विरोध की आवाज को जगह क्यों नहीं मिली?

Credit: State Mirror

क्या बैरिकेड से खत्म हो जाएगा विरोध?

प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच सके, लेकिन उनकी आवाज रास्ते में नहीं रुकी. अशोक रोड और आसपास के इलाकों में नारेबाजी जारी रही. पुलिस ने आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और उन्हें अलग-अलग थानों की ओर ले जाया गया.

इस प्रदर्शन में युवाओं और छात्र संगठनों की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी. एआईएसए, एसएफआई, एनएसयूआई, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा और अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं ने एसआईआर को लेकर सवाल उठाए. यानी पुलिस ने प्रदर्शन स्थल तक पहुंच रोक दी, लेकिन मुद्दे को सड़क से हटाना संभव नहीं हुआ.

Credit: State Mirror

आखिर SIR पर इतना गुस्सा क्यों?

प्रदर्शन का मूल मुद्दा SIR है. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया से बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. उनका कहना है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या बनाए रखने की प्रक्रिया को इतना जटिल नहीं बनाया जाना चाहिए कि सामान्य नागरिक ही अपने मताधिकार के लिए संघर्ष करता रह जाए.

साहित्यकार और पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता समेत कई वक्ताओं ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए. उनका दावा है कि एसआईआर के जरिए करोड़ों लोगों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है. इन आरोपों को लेकर निर्वाचन आयोग की अलग स्थिति है. आयोग एसआईआर को मतदाता सूची को सही करने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है.

लेकिन सवाल फिर वही है- जब मामला सीधे वोट के अधिकार से जुड़ा है तो पूरी प्रक्रिया को लेकर हर संदेह का पारदर्शी जवाब क्यों न दिया जाए? मतदाता सूची महज कागज का दस्तावेज नहीं है. उसमें दर्ज नाम नागरिक के चुनावी अधिकार का आधार है.

Credit: State Mirror

ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की मांग क्यों?

प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की. कुछ संगठनों ने उन्हें महाभियोग के जरिए हटाने की मांग भी उठाई. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं रह गई है.

यह आरोप राजनीतिक रूप से गंभीर हैं और इनके समर्थन या विरोध में अलग-अलग पक्ष मौजूद हैं. लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए असली सवाल यही है कि जनता के भीतर उठ रहे अविश्वास को दूर कैसे किया जाए. क्या केवल यह कहना पर्याप्त है कि चुनाव आयोग अपना काम कर रहा है, या फिर हर बड़े सवाल का सार्वजनिक और विस्तृत उत्तर देना भी जरूरी है?

Credit: State Mirror

क्या चुनाव आयुक्तों के बीच भी उठे थे सवाल?

प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों का मुद्दा भी उछाला गया. प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जुड़े पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि एसआईआर और उससे संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर अंदर भी सवाल उठे थे.

यदि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर मतभेद की स्थिति सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता की मांग बढ़ती है. यही वजह है कि प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं- अगर सब कुछ साफ है तो उन तमाम सवालों के दस्तावेजी जवाब सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?

जुलाई का CJP प्रदर्शन क्यों बना नजीर?

2 अक्टूबर की भारी सुरक्षा व्यवस्था को जुलाई के सीजेपी प्रदर्शन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है. 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था.

उस समय प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस कार्रवाई में पेलेट का इस्तेमाल हुआ और कई लोग घायल हुए. दिल्ली पुलिस की ओर से पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर अलग दावे सामने आए. बाद में पुलिस रिकॉर्ड से जुड़े विवरणों ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया.

इस मामले में जांच और न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर भी सवाल उठे. यही वजह है कि अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन पहले से अधिक सतर्क नजर आया.

Credit: State Mirror

क्या पिछली कार्रवाई ने पुलिस की रणनीति बदल दी?

इस बार रणनीति बिल्कुल अलग दिखाई दी. जंतर-मंतर तक पहुंचने वाले रास्तों को पहले ही नियंत्रित कर लिया गया. भारी संख्या में पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए.

सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, आरएएफ, आईटीबीपी और महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि प्रशासन किसी भी कीमत पर प्रदर्शनकारियों को निर्धारित क्षेत्र तक पहुंचने देने के पक्ष में नहीं था.

लेकिन यही रणनीति एक दूसरा सवाल भी छोड़ गई- क्या लोकतांत्रिक विरोध को रोकने के लिए इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था जरूरी थी, या संवाद का रास्ता पहले आजमाया जा सकता था?

मनोज झा बोले- विरोध के लिए भी इजाजत?

राष्ट्रीय जनता दल सांसद मनोज झा ने प्रदर्शन को रोकने पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने सवाल उठाया कि गांधी के देश में विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति की आवश्यकता पर ही सवाल खड़ा होना चाहिए. उनका आरोप था कि पुलिसिया कार्रवाई से सरकार और चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल खत्म नहीं होंगे.

राजनीतिक दलों के ऐसे आरोप लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं. मगर इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन के सामने भी कठिन प्रश्न रख दिया है—कानून-व्यवस्था की आड़ में असहमति की सीमा आखिर कहां तक तय की जाएगी?

युवाओं की भागीदारी ने बढ़ाई बेचैनी?

प्रदर्शन में युवा और छात्र संगठनों की भागीदारी उल्लेखनीय रही. जेन जी से जुड़ी कई युवा प्रदर्शनकारी भी नारेबाजी करती दिखाई दीं.

प्रदर्शनकारियों का दावा है कि एसआईआर की प्रक्रिया का असर नए मतदाताओं पर भी पड़ सकता है. खासकर पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के पंजीकरण और दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए.

यहां राजनीतिक आरोपों से अलग एक तथ्यात्मक सवाल महत्वपूर्ण है- क्या पहली बार वोट देने वाले हर युवा के लिए पंजीकरण प्रक्रिया सरल, स्पष्ट और पारदर्शी है? क्योंकि लोकतंत्र में पहली बार मतदाता बनने वाला नागरिक किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नया सहभागी होता है.

EVM से बैलेट तक, प्रदर्शनकारियों की लंबी मांग

प्रदर्शनकारियों की मांग केवल एसआईआर तक सीमित नहीं रही. उन्होंने ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी उठाई. साथ ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को समाप्त करने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था बदलने की मांग की गई.

पुराने फॉर्म-6 के जरिए नए मतदाताओं के पंजीकरण की व्यवस्था बहाल करने की मांग भी सामने आई. यानी आंदोलन का स्वरूप केवल तत्काल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा. प्रदर्शनकारियों ने चुनावी व्यवस्था के ढांचे में व्यापक बदलाव की मांग रखी है. इन मांगों पर राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं के बीच मतभेद स्पष्ट हैं.

हिरासत से क्या थमेगी यह लड़ाई?

दिनभर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच यही रस्साकशी चलती रही. प्रदर्शनकारी आगे बढ़ना चाहते थे और पुलिस उन्हें रोकती रही. नारे लगते रहे और हिरासत का सिलसिला भी चलता रहा.

सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरों के बीच सवाल अब यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पहुंच पाए या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन को उसके स्थल तक पहुंचने से रोक देने भर से उसके मुद्दे समाप्त हो जाते हैं?

सरकार और चुनाव आयोग के सामने अब असली चुनौती यही है कि एसआईआर और मतदाता सूची को लेकर उठ रहे सवालों का राजनीतिक आरोपों से परे ठोस, सार्वजनिक और पारदर्शी जवाब दिया जाए.

क्योंकि बैरिकेड रास्ता रोक सकते हैं, पुलिस वाहन भीड़ को हटा सकते हैं और हिरासत प्रदर्शनकारियों को कुछ घंटों के लिए अलग कर सकती है, लेकिन मताधिकार को लेकर उठे सवालों का जवाब अंततः व्यवस्था को देना ही पड़ेगा. 2 अक्टूबर की दिल्ली इसी सवाल के साथ खत्म हुई- जंतर-मंतर का रास्ता बंद था, लेकिन लोकतंत्र के सवाल सड़क पर अब भी खुले हैं.

SIRएक्सप्लेनर
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