जो गोडसे-सावरकर के आगे झुकते हैं, उन्हें गांधी के सामने नहीं जाना चाहिए... जंतर-मंतर पर पुलिस की घेराबंदी देख भड़कीं अहाना कौन?
जंतर-मंतर पर SIR विरोधी प्रदर्शन के दौरान पुलिस की घेराबंदी पर अहाना भड़क गईं. उन्होंने गोडसे-सावरकर और गांधी को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए सरकार पर सवाल उठाए.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर गांधी जयंती के दिन एसआईआर (SIR) के विरोध में आयोजित प्रदर्शन के दौरान पुलिस की सख्ती और सुरक्षा घेराबंदी को देखकर अहाना नाम की एक युवती ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने खुद को दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और राजेंद्र नगर की निवासी बताया. अहाना के मुताबिक, वह एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन का समर्थन करने और उसे समझने के लिए जंतर मंतर पहुंची थीं, लेकिन प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थीं. उनका आरोप है कि इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें परेशान किया.
पुलिस की सख्ती देखकर क्यों भड़कीं अहाना?
अहाना ने कहा कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा रही हैं और राजेंद्र नगर में रहती हैं. उनके मुताबिक, राजेंद्र नगर में पुलिस के रवैये को लेकर छात्रों में डर का माहौल रहता है. उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर पुलिस मनमाने तरीके से कार्रवाई कर रही थी.
उन्होंने कहा कि वह एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन का समर्थन करती हैं और यह समझने के लिए वहां पहुंची थीं कि विरोध किस मुद्दे पर हो रहा है. अहाना का दावा है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों से स्पष्ट रूप से कहा था कि वह प्रदर्शन का हिस्सा नहीं हैं, इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें परेशान किया.
जब प्रदर्शनकारी नहीं थीं तो हिरासत जैसा व्यवहार क्यों?
अहाना ने कहा कि उनका प्रदर्शन से कोई सीधा संबंध नहीं था. उन्होंने बताया कि वह यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं और भविष्य में नौकरशाह बनना चाहती हैं. उनके मुताबिक, पुलिस का व्यवहार देखकर उनके मन में यह सवाल उठा कि देश की राजधानी में ऐसा माहौल देखकर कोई युवा प्रशासनिक सेवा में जाने की इच्छा क्यों रखेगा.
उन्होंने कहा कि पुलिस के तौर-तरीकों को देखकर उन्हें शर्म महसूस होती है. उनका कहना था कि यदि छात्रों के साथ इसी तरह का व्यवहार होगा तो युवाओं में व्यवस्था के प्रति विश्वास कैसे पैदा होगा?
गांधी जयंती पर ही गांधी के नाम पर इतना गुस्सा क्यों?
अहाना ने गांधी जयंती के दिन पुलिस की कार्रवाई और सरकार की गांधी से जुड़ी सार्वजनिक गतिविधियों पर भी सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेता गांधी को केवल तब याद करते हैं, जब अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भारत आता है. उन्होंने राजघाट पर गांधी को श्रद्धांजलि देने की राजनीतिक परंपरा को लेकर भी सवाल उठाए और इसे दिखावा बताया. यह अहाना की राजनीतिक टिप्पणी और आरोप है.
‘गोडसे और सावरकर के आगे झुकते हैं तो गांधी के सामने क्यों?
अहाना से जब पूछा गया कि गांधी जयंती के मौके पर दिल्ली में हो रही पुलिस कार्रवाई को वह किस तरह देखती हैं, तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा पर तीखा हमला बोला.
उन्होंने कहा कि बीजेपी, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह राजघाट पर गांधी की प्रतिमा के सामने इसलिए नहीं जाते कि वे गांधी के प्रति सम्मान रखते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों की मौजूदगी में ऐसा करते हैं.
अहाना ने आगे कहा कि जो लोग नाथूराम गोडसे और वीर सावरकर के आगे सिर झुकाते हैं, उन्हें गांधी के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए. उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसे लोगों को गांधी का चेहरा दिखाने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए.
पुलिस कार्रवाई को उन्होंने ‘फासिज्म’ क्यों कहा?
अहाना ने जंतर-मंतर पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि वहां जो हो रहा है, वह पूरी तरह ‘फासिज्म’ है.
उनका आरोप था कि प्रदर्शनकारियों और छात्रों को डराने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि यदि युवाओं को इस तरह डराया जाएगा तो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए कौन आएगा.
उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को राजनीतिक बताते हुए महिलाओं की सुरक्षा के तर्क पर भी सवाल उठाया. यह भी उनका आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि इस बयान से नहीं होती.
क्या जुलाई में भी अहाना को पुलिस ने घर में नजरबंद किया था?
अहाना ने दावा किया कि जुलाई में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस ने उन्हें 24 घंटे तक घर में नजरबंद रखा था. उनके मुताबिक, उस समय उनका सीजेपी प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं था.
उन्होंने बताया कि अप्रैल में उन्होंने एक कथित उत्पीड़न के मामले में पुलिस से शिकायत की थी, लेकिन उनके अनुसार उस समय एफआईआर दर्ज नहीं की गई. अहाना का दावा है कि जुलाई में सीजेपी प्रदर्शन से एक दिन पहले करीब 20 पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे और उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया.
उनके इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित पुलिस रिकॉर्ड और आधिकारिक पक्ष आवश्यक है.
महिला पुलिसकर्मी की नेमप्लेट पर भी क्यों उठाया सवाल?
प्रदर्शन के दौरान एक महिला पुलिसकर्मी की नेमप्लेट गिरने और बाद में नहीं मिलने की घटना का भी अहाना ने जिक्र किया. उन्होंने इसी आधार पर दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जिस पुलिसकर्मी की वर्दी पर नेमप्लेट नहीं है, उसकी पहचान कैसे सुनिश्चित होगी. उन्होंने पुलिस पर झूठ बोलने का आरोप भी लगाया. हालांकि इस आरोप की पुष्टि के लिए दिल्ली पुलिस का पक्ष सामने आना आवश्यक है.
‘Gen-Z को आगे और बुरा दौर देखना पड़ेगा?’
अहाना ने खुद को जेन जी पीढ़ी का हिस्सा बताते हुए कहा कि उन्हें पुलिस से इसी तरह के व्यवहार की उम्मीद थी. उन्होंने आशंका जताई कि आने वाले समय में हालात और खराब हो सकते हैं. उन्होंने दिल्ली पुलिस और अधिकारियों के खिलाफ भी बेहद आपत्तिजनक और तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लेकर उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस उनके इशारे पर काम करती है. यह आरोप भी अहाना की राजनीतिक टिप्पणी है, जिसे तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए स्वतंत्र प्रमाण की आवश्यकता होगी.
जंतर-मंतर पर एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान अहाना की टिप्पणी ने आंदोलन के राजनीतिक और वैचारिक स्वर को और तीखा कर दिया. एक तरफ प्रदर्शनकारी मतदाता सूची और एसआईआर को लेकर सवाल उठा रहे थे, तो दूसरी तरफ पुलिस की घेराबंदी और हिरासत की कार्रवाई को लेकर सरकार पर निशाना साधा जा रहा था.
गांधी जयंती के दिन हुए इस घटनाक्रम में गांधी, गोडसे, पुलिस कार्रवाई और कथित राजनीतिक दमन का मुद्दा एक साथ सामने आया. अहाना ने अपने वक्तव्य के जरिए इसी विरोधाभास को केंद्र में रखा और सरकार की गांधी संबंधी राजनीति पर सीधा हमला बोला.




