Begin typing your search...

'चड्ढा चड्ढी नहीं होगा कभी', ममता के लिए दिल खोल देने वाली सायोनी घोष ही हो जाएंगी बागी? शुभेंदु को कह चुकी हैं मीर जाफर-10 बड़ी बातें

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. कभी ममता बनर्जी की सबसे करीबी मानी जाने वाली सांसद सायोनी घोष अब टीएमसी के बागी गुट के साथ खड़ी नजर आ रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि जो नेता कभी दल-बदल पर दूसरों को घेरती थीं, आज खुद पार्टी के खिलाफ खेमे में दिखाई दे रही हैं.

Sayoni Ghosh Rebellion
X

Sayoni Ghosh 

Saayoni Ghosh Rebellion: तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद सायोनी घोष ने क्या ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि ऐसा कहा जा रहा है कि टीएमसी के जो 20 सांसद बागी हुए हैं, उनमें सायोनी घोष का भी नाम शामिल है. हालांकि, अभी तक इस पर घोष की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में सायोनी घोष 'मेरे दिल में है काबा और आंखों में मदीना' गाना गाकर खूब वायरल हुई थीं. उन्हें ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद नेता माना जाता था. अब उनके बागी गुट में जाने की अटकलें हैं, जिसकी वजह से उनका चुनाव से पहले का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में सायोनी घोष ने कहा कि ममता बनर्जी ने उनको राजनीति में सबकुछ दिया है. वह हमेशा उनके साथ होंगी. वहीं, राघव चड्ढा को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि वो सायोनी घोष हैं, चड्ढा नहीं. इसीलिए वो चड्ढा चड्ढी नहीं होगा कभी. उस वक्त यह बयान राजनीतिक वफादारी का प्रतीक माना गया था... लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और सायोनी खुद पार्टी के भीतर सबसे बड़े असंतोष का हिस्सा बताई जा रही हैं.

सायोनी घोष ने क्या-क्या कहा था और अब क्या बदल गया?

1. वफादारी का दावा अब सवालों के घेरे में

सायोनी घोष ने सार्वजनिक मंचों से कई बार कहा था कि ममता बनर्जी ने उन्हें राजनीति में पहचान दी है. वह खुद को टीएमसी नेतृत्व की सबसे भरोसेमंद सैनिक बताती थीं, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने उनके पुराने बयानों और वर्तमान राजनीतिक रुख के बीच बड़ा विरोधाभास पैदा कर दिया है.

2. ‘मैं चड्ढा नहीं हूं...’ वाला बयान फिर वायरल

सायोनी ने एक चुनावी सभा में कहा था कि वह किसी भी हाल में पाला नहीं बदलेंगी. उन्होंने दूसरे दलों में जाने वाले नेताओं पर कटाक्ष करते हुए खुद को अलग बताया था. अब वही वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर लोग उनके रुख पर सवाल उठा रहे हैं.

3. भाजपा नेताओं पर सबसे तीखे हमले करती थीं

सायोनी घोष भाजपा और खासकर शुभेंदु अधिकारी की सबसे मुखर आलोचकों में रही हैं. उन्होंने कई बार शुभेंदु को ‘मीर जाफर’ और ‘सी-ग्रेड नेता’ तक कहा था. इसलिए उनका मौजूदा रुख और भी ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है.

4. पार्टी से नाराजगी कब शुरू हुई?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सायोनी को लगता था कि विवादों के समय पार्टी नेतृत्व ने उनका पूरा साथ नहीं दिया. खासकर चुनावी अभियान के दौरान हुए विवादों में वह खुद को अकेला महसूस करने लगी थीं. यही असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक दूरी में बदल गया.

5. विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद बढ़ा संकट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ा झटका लगने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा. कई नेता नेतृत्व की रणनीति और संगठनात्मक फैसलों से नाराज बताए जा रहे हैं.

6. बागी सांसदों से नाम जुड़ने से बढ़ी हलचल

सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत तब मिला, जब अलग बैठने की मांग करने वाले सांसदों के समूह से सायोनी का नाम जुड़ने की चर्चा शुरू हुई. इससे यह संदेश गया कि मामला केवल नाराजगी तक सीमित नहीं है.

7. ममता ने सायोनी पर लगाया था बड़ा दांव

ममता बनर्जी ने सायोनी को जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से चुनाव लड़ाया था. यह सीट टीएमसी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विरासतों में मानी जाती है. ऐसे में सायोनी का अलग रुख पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

8. युवा राजनीति का बड़ा चेहरा थीं

सायोनी केवल सांसद ही नहीं थीं, बल्कि पार्टी की युवा राजनीति का प्रमुख चेहरा भी थीं. उन्हें संगठन में लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई थीं। इसलिए उनका असंतोष सामान्य राजनीतिक घटना नहीं माना जा रहा.

9. क्या टीएमसी में बड़ा विभाजन संभव है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि असंतुष्ट नेताओं की संख्या बढ़ती है तो टीएमसी के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है. फिलहाल पार्टी की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिशें जारी हैं.

10. सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा किस बात की?

लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा सायोनी के पुराने और नए रुख के अंतर पर है. यही कारण है कि उनके पुराने भाषण, इंटरव्यू और बयान फिर से वायरल हो रहे हैं और राजनीतिक बहस का केंद्र बन गए हैं.

सायोनी घोष का यह राजनीतिक मोड़ सिर्फ एक नेता की नाराजगी की कहानी नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति, टीएमसी के भीतर उभरते असंतोष और चुनावी हार के बाद पैदा हुए नए समीकरणों की भी कहानी है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह असंतोष केवल दबाव की राजनीति है या फिर बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत.

Politicsममता बनर्जीशुभेंदु अधिकारी
अगला लेख