खरगे ने मनुस्मृति पर ऐसा क्या बोल दिया, जिससे संसद में मच गया बवाल:आखिर इसमें क्या लिखा है और क्यों हर बार छिड़ जाता है विवाद?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के संसद में मनुस्मृति का जिक्र करने के बाद एक बार फिर यह ग्रंथ चर्चा में आ गया है. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मनुस्मृति में क्या लिखा है, इसे लेकर विवाद क्यों होता है और इतिहास में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसका विरोध क्यों किया था.
मल्लिकार्जुन खरगे
संसद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा मनुस्मृति का जिक्र किए जाने के बाद देशभर में इस ग्रंथ को लेकर बहस तेज हो गई है. खरगे ने राज्यसभा में बोलते हुए कहा, "मनुस्मृति में लिखा है: जो शूद्र वेद सुने, उसके कानों में शीशा डाल देना चाहिए, वेद का उच्चारण करने पर जीभ काट दी जाए तथा वेद मंत्र धारण करने पर उसका शरीर काट देना चाहिए."
आरजेडी की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने भी X पर कुछ श्लोकों का उल्लेख करते हुए इसे लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि खरगे ने घृणित किताब का जिक्र जैसे ही किया, सारे भाजपाई बिलबिलाने लगे. खरगे जी मनुस्मृति का पोस्टमार्टम कर रहे हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि आखिर मनुस्मृति है क्या? इसमें ऐसा क्या लिखा है, जिसकी वजह से यह बार-बार विवादों के केंद्र में आ जाती है?
क्या है मनुस्मृति?
मनुस्मृति को प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों (स्मृति ग्रंथों) में से एक माना जाता है. परंपरागत मान्यता के अनुसार इसे महर्षि मनु से जोड़ा जाता है. विद्वानों का मानना है कि इसका संकलन अलग-अलग कालखंडों में हुआ. इसमें समाज, धर्म, परिवार, शासन, दंड व्यवस्था और सामाजिक आचरण से जुड़े नियमों का वर्णन मिलता है. इसके विभिन्न संस्करण मौजूद हैं, जिनमें श्लोकों की संख्या अलग-अलग बताई जाती है.
मनुस्मृति के 12 अध्याय: किस अध्याय में क्या लिखा है?
इतिहासकार नरहर कुरुंदकर के अनुसार, मनुस्मृति का प्रारंभिक संकलन ईसा पूर्व लगभग दूसरी-तीसरी शताब्दी के दौरान शुरू हुआ माना जाता है। इसकी सामान्य रूपरेखा 12 अध्यायों में विभाजित है, जिनमें समाज, धर्म, शासन, न्याय और जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों का उल्लेख मिलता है।
- पहला अध्याय: सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति का निर्माण, चार युग, चार वर्ण, उनके कार्य और ब्राह्मणों की भूमिका का वर्णन
- दूसरा अध्याय: ब्रह्मचर्य, शिक्षा, आचार-विचार और गुरु की सेवा से जुड़े नियम
- तीसरा अध्याय: विवाह के प्रकार, विवाह संस्कार, पारिवारिक परंपराएं और श्राद्ध कर्म का वर्णन
- चौथा अध्याय: गृहस्थ जीवन के कर्तव्य, खान-पान के नियम और विभिन्न प्रकार के पाप-पुण्य तथा नरकों का उल्लेख
- पांचवां अध्याय: महिलाओं के कर्तव्य, शुद्ध-अशुद्ध की अवधारणा और घरेलू जीवन से जुड़े नियम
- छठा अध्याय: संन्यास, तपस्या और संत के जीवन से संबंधित सिद्धांत
- सातवां अध्याय: राजा के कर्तव्य, शासन व्यवस्था और प्रशासन के सिद्धांत
- आठवां अध्याय: अपराध, न्याय व्यवस्था, दंड, साक्ष्य, वचन और राजनीतिक मामलों से जुड़े नियम
- नौवां अध्याय: पैतृक संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकारों का वर्णन
- दसवां अध्याय: वर्ण व्यवस्था और विभिन्न वर्णों के आपसी संबंधों पर चर्चा
- ग्यारहवां अध्याय: पाप, प्रायश्चित और धार्मिक प्रायश्चित की व्यवस्था
- बारहवां अध्याय: तीन गुण (सत्त्व, रजस, तमस), कर्म, पुनर्जन्म और वेदों की महत्ता का वर्णन
किन बातों को लेकर होता है विवाद?
मनुस्मृति को लेकर सबसे ज्यादा विवाद उसके उन श्लोकों पर होता है जिनमें महिलाओं, शूद्रों और वर्ण व्यवस्था को लेकर नियम बताए गए हैं. आलोचकों का कहना है कि कुछ श्लोक महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और वर्ण व्यवस्था के आधार पर अलग-अलग अधिकार और दंड की बात करते हैं. इन्हीं कारणों से सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दल और कई सामाजिक संगठन समय-समय पर इसका विरोध करते रहे हैं.
वहीं, समर्थकों का कहना है कि मनुस्मृति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए. उनका तर्क है कि अलग-अलग संस्करणों में अंतर है और पूरे ग्रंथ को कुछ विवादित श्लोकों के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए.
क्या यह कभी कानून की किताब थी?
कई इतिहासकारों का कहना है कि प्राचीन भारत में मनुस्मृति पूरे देश में लागू कोई एकमात्र कानून नहीं थी. हालांकि, ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने हिंदू कानून को समझने के लिए मनुस्मृति का सहारा लिया. इसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद यह ज्यादा प्रसिद्ध हुई और अदालतों में भी इसका संदर्भ इस्तेमाल होने लगा. इसी दौर में इसकी सामाजिक और राजनीतिक चर्चा भी बढ़ी.
डॉ. आंबेडकर ने क्यों जलाई थी मनुस्मृति?
25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के महाड में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की प्रतियां जलाकर इसका विरोध किया था. आंबेडकर का मानना था कि वर्ण व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव को वैचारिक आधार देने में इस ग्रंथ की भूमिका रही. उन्होंने अपनी कई पुस्तकों में जाति व्यवस्था की आलोचना करते हुए मनुस्मृति का भी उल्लेख किया. दलित आंदोलन के इतिहास में यह घटना एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है.
समर्थक क्या कहते हैं?
मनुस्मृति का समर्थन करने वाले विद्वानों और धार्मिक संगठनों का कहना है कि यह अपने समय का सामाजिक और विधिक दस्तावेज था. उनका दावा है कि इसमें शासन, न्याय, प्रशासन और सामाजिक अनुशासन से जुड़ी कई उपयोगी बातें भी हैं. कुछ समर्थकों का यह भी कहना है कि जिन श्लोकों को लेकर विवाद होता है, उनकी व्याख्या और प्रामाणिकता पर भी विद्वानों में मतभेद हैं.
आज भी क्यों होता है विवाद?
आज जब भी सामाजिक न्याय, आरक्षण, जाति व्यवस्था, महिलाओं के अधिकार या समानता पर बहस होती है, तब मनुस्मृति का नाम फिर सामने आ जाता है. एक पक्ष इसे सामाजिक भेदभाव का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़े जाने योग्य ग्रंथ बताता है. यही कारण है कि संसद से लेकर राजनीतिक मंचों और सामाजिक बहसों तक, मनुस्मृति समय-समय पर चर्चा का विषय बनी रहती है.




