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Veeramani POCSO Case: पहले क्लोजर रिपोर्ट, फिर गिरफ्तारी और अब महिला SIT; विजय ने DMK पर बोला हमला-Updates

तमिलनाडु के ग्रेनाइट कारोबारी आर. वीरमणि से जुड़े POCSO केस की जांच अब और तेज हो गई है. पुलिस ने पहले केस को बंद करने की कोशिश की थी, लेकिन विशेष अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की और आगे जांच के आदेश दिए. इसी बीच मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने इस मामले को लेकर पिछली DMK सरकार पर सवाल उठाए हैं.

CM Vijay
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तमिलनाडु में ग्रेनाइट कारोबारी और GEM Granites से जुड़े आर. वीरमणि के खिलाफ नाबालिग से कथित यौन शोषण का मामला इन दिनों चर्चा में है. यह मामला सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इसमें एक बड़े कारोबारी का नाम आया है, बल्कि इसलिए भी कि पुलिस की शुरुआती जांच, केस को बंद करने की कोशिश, अदालत का हस्तक्षेप और बाद में हुई गिरफ्तारियों ने पूरे घटनाक्रम को कई सवालों के घेरे में ला दिया है.

सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मामला अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर है. वीरमणि और अन्य आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत को करना है.

मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?

  • पुलिस के मुताबिक, अक्टूबर 2025 में एक शिकायत के साथ पेन ड्राइव दी गई थी. इसमें एक वीडियो था, जिसमें एक नाबालिग लड़की के कथित यौन शोषण का दृश्य होने की बात सामने आई. जांच के दौरान पुलिस ने वीडियो में दिख रहे बुजुर्ग व्यक्ति की पहचान कारोबारी आर. वीरमणि के रूप में की. इसके बाद POCSO कानून के तहत मामला दर्ज किया गया.
  • पुलिस की जांच के मुताबिक, कथित घटना चेन्नई के तेयनमपेट स्थित एक मकान में हुई थी और यह मामला 2019 की घटना से जुड़ा बताया गया.
  • मामले में सबसे अहम मोड़ फरवरी 2026 में आया. पुलिस ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि वीडियो में दिखाई देने वाली कथित पीड़िता की पहचान और उसका पता नहीं चल पा रहा था.
  • इसी आधार पर आगे की कार्रवाई रोकने की रिपोर्ट दाखिल की गई थी, लेकिन विशेष POCSOr अदालत ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने मामले की आगे जांच का रास्ता खुला रखा. अगस्त 2026 में अदालत के इस रुख के बाद जांच दोबारा तेज हुई. यहीं से केस ने नया मोड़ लिया.
  • अगस्त के अंत में पुलिस ने आर. वीरमणि के साथ उनकी सहयोगी शांति और उनके पति महेंद्र सिम्हन को गिरफ्तार किया. पुलिस ने आरोप लगाया कि दोनों ने कथित अपराध में मदद की और मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी उनके पास थी.
  • आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में पुलिस ने दोनों सहयोगियों से पूछताछ के लिए उन्हें CCB की हिरासत में भी लिया.
  • जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित तौर पर कितनी लड़कियां प्रभावित हुईं, घटनाएं किस अवधि में हुईं और इसमें और कौन लोग शामिल हो सकते हैं. जांच में एक महत्वपूर्ण सफलता तब मिली जब पुलिस ने उस लड़की का पता लगा लिया, जो कथित तौर पर शुरुआती वीडियो में दिखाई दे रही थी.
  • पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, लड़की ने खुद की पहचान की और वीडियो में मौजूद व्यक्ति की पहचान वीरमणि के तौर पर की. उसका बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया गया. इसके बाद जांच एजेंसियों ने यह भी जांच शुरू की कि क्या इसी तरह के आरोपों से जुड़ी अन्य लड़कियां भी सामने आ सकती हैं.
  • इसके बाद मामले में कुछ और महिलाओं/लड़कियों के बयान सामने आने की रिपोर्टें भी आईं. हालांकि, इन बयानों और आरोपों की जांच अभी जारी है और इनके आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
  • मामला सिर्फ वीरमणि और उनके कथित सहयोगियों तक सीमित नहीं रहा है. जांच का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित है कि शुरुआती जांच में केस को बंद करने की कोशिश क्यों हुई और उस समय पुलिस ने किन तथ्यों के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी.
  • Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, अब जांच में पहले केस को संभालने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी देखी जा रही है. कुछ पुलिस अधिकारियों से पूछताछ किए जाने और मामले से जुड़े परिसरों की तलाशी लिए जाने की भी जानकारी सामने आई है. यानी अब जांच के दो पहलू हैं- पहला, कथित अपराध और उससे जुड़े लोग; दूसरा, शुरुआती जांच किस तरह आगे बढ़ी और केस बंद करने की कोशिश क्यों हुई.
  • 25 सितंबर को चेन्नई की विशेष POCSO अदालत ने आर. वीरमणि की न्यायिक हिरासत 9 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दी. उन्हें फिलहाल पुझल जेल में रखा गया है. इसी दिन तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) महेश कुमार अग्रवाल ने मामले की जांच के लिए चार वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारियों की विशेष जांच टीम यानी SIT बनाई.
  • टीम की कमान एडिशनल कमिश्नर ऑफ पुलिस पी.सी. थेनमोझी को दी गई है. टीम में डी.सी.पी. वी.वी. गीतांजलि समेत अन्य वरिष्ठ महिला अधिकारी शामिल हैं. SIT को मामले और उससे जुड़े पहलुओं की प्रभावी तरीके से जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है. इसमें पहले की जांच को किस तरह संभाला गया, सबूतों से जुड़े सवाल और अन्य संबंधित पहलुओं की पड़ताल भी शामिल है.
  • यहीं से मामला राजनीतिक विवाद में भी बदल गया है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और TVK नेता सी. जोसेफ विजय ने 25 सितंबर को मदुरांतकम में चुनाव प्रचार के दौरान इस केस का जिक्र करते हुए पिछली DMK सरकार पर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि मामला पिछली सरकार के कार्यकाल में सामने आया था, लेकिन उस समय उचित कार्रवाई नहीं हुई. विजय ने DMK प्रमुख एम.के. स्टालिन से इस मामले पर जवाब देने को कहा.
  • विजय ने इसे आगामी मदुरांतकम उपचुनाव के प्रचार से भी जोड़ा और DMK तथा उसके सहयोगियों पर राजनीतिक निशाना साधा. उनके बयान में कथित समझौते और मामले को दबाने जैसे आरोप भी शामिल थे. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय स्थापित तथ्य के रूप में नहीं की जा सकती. इसलिए इस पूरे हिस्से को समझते समय जांच से सामने आए तथ्य और राजनीतिक दलों के आरोप, दोनों को अलग रखना जरूरी है.

केस की टाइमलाइन एक नजर में

  • 2019: पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच (CCB) की जांच के अनुसार, यह मुख्य अपराध साल 2019 का है. आरोप है कि चेन्नई के तेयनमपेट में एक किराए के मकान में 84 वर्षीय उद्योगपति आर. वीरमणि ने अपनी सहयोगी शांति और उसके पति महेंद्र सिम्हन की मदद से नाबालिग बच्चियों (जिनकी उम्र 12 से 16 वर्ष के बीच थी) को बुलाकर उनका यौन शोषण किया. शांति पर लड़कियों को बहला-फुसलाकर लाने (ग्रूमिंग करने) का आरोप है.
  • 6 अक्टूबर 2025: चेन्नई के अन्ना नगर की एक बाल अधिकार कार्यकर्ता (NGO) ने पुलिस की 'अनैतिक व्यापार निवारण इकाई' (ITPU) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई.
  • 7 अक्टूबर 2025: शिकायत के साथ एक पेन ड्राइव (USB Drive) सौंपी गई थी. इस पेन ड्राइव में एक वीडियो था, जिसमें वीरमणि को एक नाबालिग लड़की का यौन शोषण करते हुए देखा जा सकता था. इसके आधार पर सेंट्रल क्राइम ब्रांच (CCB) ने वीरमणि के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धाराओं के तहत पहली बार FIR दर्ज की.
  • 18 फरवरी 2026: चेन्नई पुलिस की एंटी-वाइस स्क्वाड (AVS) के सहायक आयुक्त ने विशेष पॉक्सो अदालत में एक क्लोजर रिपोर्ट (Closure Report) दाखिल की. पुलिस ने दावा किया कि वे पीड़िता की पहचान नहीं कर पा रहे हैं और इस वजह से मामले को 'Further Action Dropped' (आगे की कार्रवाई बंद) श्रेणी में डाल दिया गया. (बाद में आरोप लगे कि इस जांच को दबाने के लिए ₹70 से ₹90 करोड़ का भारी वित्तीय लेन-देन हुआ था).
  • अगस्त 2026: चेन्नई की विशेष पॉक्सो अदालत (Special POCSO Court) ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया. कोर्ट ने पुलिस की खिंचाई की और मामले की दोबारा और गहराई से जांच (Further Investigation) करने का आदेश दिया.
  • 29 अगस्त 2026: कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने तेजी दिखाई। मुख्य आरोपी आर. वीरमणि, उसकी सहयोगी शांति और महेंद्र सिम्हन को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें चेन्नई की पुझल केंद्रीय जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जांच में SC/ST एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गईं.
  • मध्य सितंबर 2026: पुलिस ने आखिरकार उस मुख्य पीड़िता (जो 2019 में नाबालिग थी) को ढूंढ निकाला और न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने उसका बयान (धारा 164 के तहत) दर्ज कराया. इसके साथ ही 3 अन्य पीड़ित लड़कियों की भी पहचान हुई.
  • 22 सितंबर 2026: जेम ग्रेनाइट्स के एक पुराने कर्मचारी गणेशन को गिरफ्तार किया गया. उसके मोबाइल से भी एक वीडियो मिला. उस पर आरोप है कि जानकारी होने के बावजूद उसने पुलिस को रिपोर्ट नहीं की.
  • 23-24 सितंबर 2026: जांच का दायरा बढ़ते ही यह सामने आया कि पीड़ितों की संख्या 9 या उससे अधिक हो सकती है. कई अन्य महिलाओं ने सामने आकर बयान दिए कि जब वे नाबालिग थीं, तब उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था.
  • मुख्यमंत्री का आदेश: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने पुलिस को इस मामले की जांच में तेजी लाने, पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और यह जांचने के निर्देश दिए कि क्या पहले पुलिस अधिकारियों को रिश्वत देकर मामला दबाया गया था.
  • 25 सितंबर 2026: चेन्नई की पॉक्सो अदालत ने आर. वीरमणि की न्यायिक हिरासत को 9 अक्टूबर 2026 तक के लिए बढ़ा दिया है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए DGP ने इस पूरे मामले की जांच के लिए ऑल-विमेन स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (All-Woman SIT) यानी महिला पुलिस अफसरों की एक विशेष टीम का गठन कर दिया है. इस टीम की कमान एडिशनल कमिश्नर पी.सी. थेनमोझी को सौंपी गई है.

आगे क्या होगा?

अब जांच के सामने कई सवाल हैं- कथित अपराध की पूरी कड़ी क्या थी, कितने लोग इसमें शामिल थे, अन्य पीड़ितों के आरोपों की सच्चाई क्या है और शुरुआती जांच में केस को बंद करने की कोशिश किन परिस्थितियों में हुई. SIT के गठन के बाद जांच का दायरा और व्यापक होने की संभावना है. हालांकि, जब तक जांच पूरी नहीं होती और अदालत में आरोप साबित नहीं होते, तब तक आरोपों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा. यह मामला फिलहाल पुलिस जांच, अदालत की निगरानी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप-तीनों स्तरों पर आगे बढ़ रहा है.

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